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भारत की अदालतें भी ‘व्हाट्सएप न्यायशास्त्र’ की ओर बढ़ रही हैं

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(मनुस्मृति के हवाले से लिखे गए फैसले का खतरा और संवैधानिक राष्ट्र की परीक्षा)

 – तेजपाल सिंह ‘तेज’

          भारत न्याय और समानता के सिद्धांत पर खड़ा हुआ एक संवैधानिक राष्ट्र है। यहाँ न्यायपालिका का कर्तव्य स्पष्ट है—कानून के शासन (Rule of Law) के अनुरूप निर्णय देना, न कि किसी धार्मिक ग्रंथ, अफवाह, भीड़ या विचारधारा के दबाव में। लेकिन उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से आई ख़बर ने इस आधारभूत विश्वास को हिला दिया है। कहा जा रहा है कि एक न्यायाधीश ने मनुस्मृति के श्लोक का हवाला देते हुए निर्णय दिया और साथ ही उन अफवाहों को भी अपने फैसले का आधार बनाया जिन्हें पुलिस ने स्वयं फर्जी घोषित किया था

यह केवल एक मामला नहीं है — यह उस रास्ते की आहट है जहाँ न्यायिक प्रक्रिया तर्क और संविधान से हटकर भावनाओं, नफरत और सोशल मीडिया की ‘कथा’ पर आधारित होने लगे तो क्या हो सकता है।

1. मनुस्मृति और आधुनिक भारतीय न्याय: एक अंतर्विरोध:

          मनुस्मृति कोई विधिक दस्तावेज़ नहीं है। भारत के संविधान निर्माताओं—खासकर डॉ. भीमराव अंबेडकर—ने मनुस्मृति को सामाजिक असमानता और पितृसत्तात्मक व्यवस्था का स्रोत माना। डा. अंबेडकर ने स्वयं 25 दिसंबर 1927 को महाड़ सत्याग्रह के दौरान मनुस्मृति दहन किया था, क्योंकि वह मानते थे कि–मनुस्मृति जाति आधारित दमन को वैधानिक स्वरूप देने वाली ग्रंथ परंपरा का प्रतीक है।ऐसी स्थिति में किसी अदालत का मनुस्मृति से प्रेरित होकर निर्णय लिखना — न केवल संवैधानिक व्यवस्था पर प्रहार है बल्कि यह न्यायपालिका की विचारधारा-निरपेक्षता को भी संदिग्ध बनाता है।

2. ‘व्हाट्सएप फॉरवर्ड’ और निर्णय प्रक्रिया का संकट:

बहराइच की पुलिस ने स्पष्ट किया कि रामगोपाल मिश्रा के मामले में–

·        बिजली से झटका देने की बात झूठी,

·        नाखून निकालने की बात झूठी,

·        तलवार से वार करने की बात झूठी – लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल गोली लगने से मृत्यु की पुष्टि हुई थी। इसके बावजूद अदालत ने अपने निर्णय में लिखा कि–

·        मृतक के शरीर को “गोलियों से छलनी किया गया”

·        उसके पैरों को “इस तरह जलाया गया कि नाखून निकल आए”

          यहाँ प्रश्न उठता है—ये तथ्य कहाँ से आए?  जिन बातों को पुलिस ने अफवाह कहा, वे निर्णय में क्यों दिखीं? क्या यह ‘व्हाट्सएप न्याय’ का मामला है? क्या सोशल मीडिया की कल्पनाएँ अब न्यायिक आदेशों में प्रवेश कर रही हैं? यदि यह सत्य है, तो यह ट्रेंड लोकतंत्र के किसी भी संस्थान के लिए अत्यंत खतरनाक है।

3. एकतरफा नैरेटिव और चयनात्मक न्याय” का भयानक उदाहरण:

          मामला केवल निर्णय तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों में यह नज़रिया बढ़ता दिख रहा है कि–

·        मुसलमान आरोपी हो तो न्याय-प्रक्रिया तेज़कठोर और निर्दयी होती है।

·        लेकिन अगर आरोपी हिंदू हो तो प्रक्रिया धीमीढीली और अक्सर सुरक्षा-परक हो जाती है।

उदाहरण–

(क) अखलाक हत्याकांड (दादरी)–

10 वर्ष में भी दोषसिद्धि नहीं। पीड़िता–परिवार पलायन करने को मजबूर।

(ख) चंदन गुप्ता (कासगंज): मामला सांप्रदायिक टकराव में बदल दिया गया, परंतु जाँच और सजा की प्रक्रिया धीमी।

(ग) बुलडोजर राज – असममध्य प्रदेशयूपी: दैनिक भास्कर और कई स्वतंत्र रिपोर्ट में आरोप कि गैरकानूनी निर्माण हटाने का कानून धार्मिक आधार पर लागू किया जा रहा है,
रिहायशें बिना नोटिस तोड़ी जा रही हैं, और अधिकतर मामलों में पीड़ित मुसलमान हैं।

(घ) उत्तराखंड दंगे व कई लव जिहाद” आरोप– जांच बाद में झूठी निकलने के बावजूद दर्जनों मुस्लिम युवकों की जिंदगी बर्बाद। यह पैटर्न एक ही दिशा की ओर संकेत करता है—न्याय का तराजू झुक रहा है। और जब राज्य सत्ता, पुलिस, मीडिया, भीड़ और अदालतें एक ही नैरेटिव से संचालित होने लगें, तब अल्पसंख्यक का जीवन केवल कानूनी चुनौती नहीं रहता, बल्कि अस्तित्व का सवाल बन जाता है।

4. संविधान बनाम संस्कृति का संघर्षकिसका भारत जीतेगा?

          निर्णय में जब न्यायाधीश लिखते हैं कि –“दंड का कार्य शासक का सर्वोच्च धर्म है” तो यह लोकतांत्रिक गणराज्य नहीं, बल्कि प्राचीन सामंती-धार्मिक शासन की भाषा है। भारत में न्यायाधीश शासक नहीं, बल्कि संविधान के सेवक हैं। उनका धर्म—

·        संविधान,

·        विधिक सिद्धांत,

·        प्रेसिडेंट,

·        और साक्ष्य।

          न्यायपालिका यदि धर्मग्रंथ के हवाले से दंड सिद्ध करेगी, तो फिर क्यों न कुरानबाइबलगुरुग्रंथ साहिबतिपिटकवेदसबको कानूनी स्रोत माना जाएऔर यदि नहीं माना जा सकता, तो मनुस्मृति क्योंयही सबसे बड़ा सवाल है।

5. सोशल मीडिया-निर्मित ज़ॉम्बी जेनरेशन’ और नफरत की फैक्ट्री

रामगोपाल मिश्रा हों या चंदन गुप्ता — इन दोनों युवकों का इस्तेमाल हुआ। एक सिस्टम ने–

·        उन्हें रैलियों में भेजा,

·        नफरत से भर दिया,

·        दूसरे धर्म के प्रतीक अपमानित करने का साहस दिया,

·        और अंततः उनकी मौत को भी “नैरेटिव” बना दिया।

          इनकी मौतों का राजनीतिक उपयोग हुआ, लेकिन उनके परिवारों को क्या मिला?
— दर्द, गरीबी, असुरक्षा और विस्मरण। क्या कभी कोई अदालत उन संगठनों को कठघरे में खड़ा करेगी जो युवाओं को इस आग में झोंकते हैं?

6. भारत की अदालतों को क्या करना चाहिएकुछ स्पष्ट प्रश्न–

1) क्या न्यायिक निर्णय में धार्मिक ग्रंथ का हवाला देना स्वीकार्य है?
केवल तब जब वह सांस्कृतिक संदर्भ में हो,
लेकिन फैसला का आधार कभी नहीं।

2) क्या सोशल मीडिया के अप्रमाणिक दावों को अदालत की भाषा बनना चाहिए?
बिल्कुल नहीं।
यह न्यायिक प्रक्रिया की बुनियादी मर्यादा के खिलाफ है।

3)  क्या दो नागरिकों के लिए दो कानून संभव हैं?
संवैधानिक दृष्टि से नहीं —
लेकिन वास्तविकता में यह आरोप अब सामान्य हो चुका है।

4)  क्या दलित और पिछड़ा नेतृत्व इस पर बोलेगा?
          यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्योंकि यदि वे चुप रहते हैं, तो मनुस्मृति आधारित न्याय—
जो सबसे अधिक दलित, पिछड़े, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को चोट पहुंचाता है—सामान्यीकृत होता जाएगा।

7. न्यायपालिका के लिए यह चेतावनी की घंटी है:

          आज यदि एक जिला अदालत के फैसले में मनुस्मृति का श्लोक जगह पाता है, तो कल यह उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंच सकता है —यदि समाज और संवैधानिक संस्थाएं मौन रहीं। हर लोकतंत्र में संस्थाएँ धीरे-धीरे कमजोर होती हैं। सबसे पहले तथ्य कमजोर होते हैं, फिर हेडलाइन, फिर जांच, फिर न्याय, और अंत में नागरिक स्वयं। इसलिए इस मामले को केवल “एक फैसला” न समझें —यह भारतीय गणराज्य की आत्मा को परखने वाला क्षण है।

निष्कर्ष: क्या हम संविधान को बचा पाएंगे?

          भारत का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि उसके न्यायाधीश विधि के शासन को मानते हैं या मनुस्मृति की समाज विरोधी विचारधारा के शासन को। न्याय का आधार– संविधान, सबूत, और निष्पक्ष होना चाहिए — न कि  व्हाट्सएप, अफवाहें, धार्मिक ग्रंथ, या राजनीतिक ध्रुवीकरण। भारत ने मनुस्मृति को नहीं, संविधान को अपना न्याय ग्रंथ चुना है। अब प्रश्न यह है कि क्या उसकी अदालतें भी न्याय देते समय ऐसा ही करेंगी? (https://youtu.be/37eDtcwpsE0?si=HglSlWqqYQxidgQu)

Ramswaroop Mantri

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