मंजुल भारद्वाज
मोदी सरकार को जेएनयू से उच्च कोटि की नफ़रत है। ज़ाहिर है कि जेएनयू युवाओं का एक मुक्त मंच है जो धर्म और उसके पाखंड से लोहा लेता है। लोकतान्त्रिक मूल्यों को युवाओं में अंकुरित करने के लिए जेएनयू छात्रों में प्रेरक भूमिका निभाता आया है। लोकतंत्र के मूल्य प्रतिरोध का गढ़ है जेएनयू। इसके छात्र प्रधानमन्त्री तक अपना विरोध या असहमति ज़ाहिर करने का माद्दा रखते हैं। यही बात विकारी संघ और सरकार को चुभती है। इसलिए उसने बहुमत मिलते ही जेएनयू को बर्बाद करने का षड्यंत्र रच दिया। टुकड़े-टुकड़े गैंग का षड्यंत्र रचकर बदमान किया। राष्ट्रवाद का उन्माद पैदा किया। देशद्रोह का मुकदमा चलाया। छात्रों को जेल भेजा। पर जेएनयू के छात्र रुके नहीं। उन्होंने सरकार की ललकार को स्वीकार कर संघर्ष का रास्ता अखित्यार किया।
बहरहाल, विकारी संघ और वर्णवादी सरकार छात्रों के साथ खूनी खेल खेल रही है। अभी रामनवमी के दिन मांसाहर को विवाद का मुद्दा बना अपने गुंडों से छात्रों पर हमला करवा दिया। उसके साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में भी विकारी संघ ऐसे हिंसा से धार्मिक ध्रुवीकरण कर रही है, पर भारत का बुद्धिजीवी वर्ग इसे खाने-पीने,ओढ़ने-पहनने पर हमला समझ रहा है। उसे गहरा षड्यंत्र दिखाई नहीं दे रहा।
भारतीय बुद्धिजीवियों को अपनी मूर्छा तोड़ने की ज़रूरत है। इस समय देश पर सबसे बड़ा संकट है। भारत या तो भारत रहेगा या नहीं रहेगा- इतना भयावह संकट है। भारत का मतलब उन्मादी भीड़ को समझाने की ज़रूरत है लेकिन उससे पहले बुद्धिजीवियों को भारत का मतलब स्वयं समझने की ज़रुरत है। भारत का अर्थ है धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र! भारत के मूल धर्मनिरपेक्षता को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विदेशी विचार मानते हैं। विदेशी विचार मानकर दुत्कारते है। इस विदेशी नकल को वे कार्ल मार्क्स के विचार से जोड़ते हैं। उसके साथ वे सोनिया के विदेशी मूल को भी एक ढाल की तरह रखते हैं। हालांकि जनता ने सोनिया को चुनाव जिताकर आरएसएस की हवा निकाल दी थी पर मोदी के जुमले ‘विकास’ के उन्माद में आरएसएस ने विदेशी का राग अलापा है। स्वयं हिटलर को नायक मानने वाला संघ ‘विदेशी-विदेशी’ चिल्लाता रहता है पर त्रासदी यह है कि मीडिया विमर्श या जन विमर्श में अपने आपको प्रगतिशील मानने वाले बुद्धिजीवी आरएसएस के झूठ को तोड़ नहीं पाते। वे बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। वे धर्मनिरपेक्षता भारत के लिए क्यों ज़रुरी है, यह तो बताते हैं पर यह नहीं बता पाते कि धर्मनिरपेक्षता भारत का अपना विचार है। धर्मनिरपेक्षता भारत में सबसे पहले राज्य की नीति और शासन का आधार बना था। सम्राट अशोक ने धर्मनिरपेक्षता को कलिंग युद्ध के बाद पहली बार अपने शासन का आधार बनाया था।
मजे की बात है कि उस समय भारत में इस्लाम नहीं था। अक्सर आरएसएस धर्मनिरपेक्षता के बहाने मुस्लिम समुदाय पर हमला करते हैं और अपने आप को हिन्दू समझने वाले धर्मनिरपेक्षता को मुस्लिमों के साथ जोड़कर आरएसएस के भ्रमजाल में फंस जाते हैं। धर्मनिरपेक्षता को फ़ालतू समझने लगते हैं परन्तु वे भूल जाते हैं कि धर्मों का टकराव भारत में इस्लाम के पहले से है। अशोक के समय वैदिक धर्म या सनातन धर्म था, जैन धर्म था, बौद्ध धर्म था और इन धर्मों में टकराव था। अशोक ने स्वयं बौद्ध धर्म स्वीकारा पर शासन को ‘सर्वधर्म समभाव’ यानी ‘धर्मनिरपेक्ष’ होकर चलाया.
भारत के संविधान निर्माताओं ने अशोक की ‘सर्वधर्म समभाव’ नीति को भारत के संविधान की आत्मा के रूप में स्वीकारा। अशोक स्तम्भ को अपने शासन की ‘राजमुद्रा’ बनाया और किसी भी धर्म के बहुलतावाद को ख़ारिज किया।
भारत के मूल तत्व ‘जन कल्याण’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ सम्राट अशोक की नीतियों से लिए गए तत्व हैं। यही सम्राट अशोक की भारत को दी गई विरासत है जिसकी बुनियाद पर खड़ा है आज का स्वतंत्र भारत!
भारतीय बुद्धिजीवियों को यह तथ्य जनता के बीच सशक्त रूप से रखने की जरूरत है। दूसरा मुद्दा है बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का। भारतीय के बुद्धिजीवी भी संघ के बहुसंख्यक भ्रम में फंसे हुए हैं। बुद्धिजीवी भी बहुसंख्यकवाद के शिकार हैं। बुद्धिजीवियों को बहुसंख्यकवाद के चक्रव्यूह को भेदने की ज़रूरत है।
थोड़ा विचार कीजिये कि इस देश में कौन बहुसंख्यक हैं? बताइए.., कौन हैं बहुसंख्यक? क्या हिन्दू बहुसंख्यक हैं? हिन्दू में ब्राह्मण बहुसंख्यक हैं या क्षत्रिय या वैश्य या शुद्र? इस देश में कोई बहुसंख्यक नहीं हैं। अगर धर्म के नाम पर बहुसंख्यक हैं तो जाति से अल्पसंख्यक हैं! जाति से बहुसंख्यक हैं, तो भाषा से अल्पसंख्यक हैं. यहां हर कोई अल्पसंख्यक है।
ये भारत है.., भारत… विविध अल्पसंख्यक प्रजातियों, धर्मों, परम्पराओं, संस्कृतियों और भाषाओं का एक देश है। आत्महीनता से ग्रस्त विकारी इन्हीं विविधताओं को नष्ट करना चाहते हैं। ऐसे विकारी वर्चस्ववाद से पीड़ित हैं। ये हर तरह के संख्याबल का विध्वंसक उपयोग करते हैं और एक दूसरे को आपस में लड़वाते हैं। इस देश में न बहुसंख्यक की चलेगी और न ही अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण चलेगा। यह देश संविधान से चलेगा। सबको संविधान सम्मत समान दृष्टि से देखने की ज़रूरत है। बुद्धिजीवियों को आरएसएस के इस भ्रम को सही और सटीक तथ्यों से तोड़ने की आवश्यकता है।
तीसरा मुद्दा है भारत के बुद्धिजीवी मोदी सरकार को अन्य सरकारों की तरह नीति पर चलने वाली सरकार मानने की गम्भीर भूल कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि पुलिस गुंडों पर कार्रवाई करेगी, कानून गुंडों को सजा देगा, अदालत न्याय करेंगी। वे भूल रहे हैं कि किसानों को अपनी गाड़ी से रौंदने वाले मंत्री के बेटे को जमानत मिल गई लेकिन एक फिजिकली चैलेंज्ड प्रोफेसर बिना किसी चार्जशीट जेल में बंद हैं। एक विशेष समुदाय की महिलाओं को रेप करने के लिए चंद गुंडे एक विशष रंग की पोषक पहनकर सरेआम भीड़ को भड़का रहे हैं। हर रोज़ विकारी संघ यह हिंसक घटनाएं करवा रहा है। जिन्हें संविधान के साथ खड़े होना है वे पुलिस और अदालत सरकार की चाकरी कर रही हैं. ऐसे समय में बुद्धिजीवियों को विकारी संघ के चिर-परिचित षड्यंत्र को अपने अग्रिम नियोजन से भेदने की अनिवार्यता को सक्रिय रूप से निभाने की आवश्यता है।
इस चुनौतीपूर्ण काल में बुद्धिजीवियों को ’70 साल में कुछ नहीं हुआ’ के जुमले को तर्कसम्मत ध्वस्त करते हुए संविधान सम्मत भारत के लिए सघन अभियान चलाने की पहल कर देश को बचाने के लिए भीड़ बनी जनता को संविधान सम्मत नागरिक बनने के उत्प्रेरित करें!





