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*भारत के अरबपति बादशाह और आपका टैक्स: क्रोनी कैपिटलिज्म का अदृश्य साम्राज्य*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          भारत में “विकास” शब्द अब केवल सड़क, पुल या बिजलीघर का पर्याय नहीं रह गया। यह अब उस गठजोड़ का प्रतीक बन चुका है जहाँ सत्ता और पूंजी एक-दूसरे के सहारे फलती-फूलती हैं। आम नागरिक के टैक्स से चलने वाले बैंक जब अरबपतियों को करोड़ों के ऋण देते हैं, और वही अरबपति सरकारी नीतियों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, तो लोकतंत्र और पूंजीवाद के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

          भारत आज दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन Oxfam India की 2024 रिपोर्ट के अनुसार, देश के केवल 1% सबसे अमीर लोग कुल संपत्ति के 73% हिस्से पर क़ब्ज़ा रखते हैं। यह असमानता किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि उस प्रणाली का नतीजा है जिसे अर्थशास्त्र में कहा जाता है — क्रोनी कैपिटलिज़्म” (Crony Capitalism)। यह वह व्यवस्था है जहाँ आर्थिक अवसर योग्यता से नहीं, बल्कि राजनीतिक संपर्कों से तय होते हैं।

क्रोनी कैपिटलिज्म क्या हैसत्ता और पूंजी का अदृश्य गठबंधन:

          क्रोनी कैपिटलिज्म का शाब्दिक अर्थ है — “मित्र पूँजीवाद”, यानी ऐसा पूंजीवाद जो प्रतिस्पर्धा और योग्यता पर नहीं, बल्कि संबंधों और सिफारिशों पर टिका हो। यह तब पैदा होता है जब सरकार कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों को कर छूट, ऋण, ठेके या नीतिगत संरक्षण देती है।
नतीजा यह होता है कि बाज़ार स्वतंत्र नहींबल्कि नियंत्रित हो जाता है — और असली प्रतिस्पर्धा मर जाती है।

        The Economist की “Crony-Capitalism Index” (2023) के अनुसार, भारत उन देशों में शामिल है जहाँ “राजनीतिक रूप से संरक्षित धन” GDP का 8% से अधिक है — यानी अरबपतियों की कमाई का बड़ा हिस्सा सरकारी नीति और ठेकों से जुड़ा है, न कि मुक्त बाज़ार से।

सोवियत संघ से वेनेजुएला तक: जब पूँजी ने सत्ता को निगल लिया:

          भारत की कहानी समझने के लिए पहले दुनिया के उन देशों को देखना जरूरी है, जहाँ सत्ता और पूंजी का यह विवाह विनाश में बदल गया।

रूस – ओलिगार्खों का साम्राज्य:

          सोवियत संघ के पतन के बाद रूस ने 1990 के दशक में “निजीकरण” के नाम पर अपनी सार्वजनिक संपत्ति औने-पौने दामों में बेची। परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में रोमन अब्रामोविच मिखाइल खोडोर्कोव्स्की और आर्काडी रोटेनबर्ग जैसे उद्योगपति देश की संपत्ति के मालिक बन बैठे। 2000 तक रूस की GDP का लगभग 20% हिस्सा सिर्फ 25 व्यक्तियों के नियंत्रण में आ गया। जब 2014 में पश्चिमी प्रतिबंध लगे, तो पूरा ढांचा चरमरा गया — क्योंकि यह अर्थव्यवस्था उत्पादन नहीं, “राजनीतिक कृपा” पर टिकी थी।

फिलीपींस – मार्कोस का पूँजी जाल:

          1965 में फर्डिनेंड मार्कोस सत्ता में आए और उन्होंने “विकास” के नाम पर अपने मित्रों को बैंकिंग, रियल एस्टेट और मीडिया के लाइसेंस बाँटे।1983–85 के बीच देश की GDP 10% गिरी, और बेरोजगारी 20% तक पहुँची। आखिरकार People Power Revolution (1986) ने मार्कोस को सत्ता से बेदखल किया, लेकिन अर्थव्यवस्था वर्षों तक चरमराई रही।

इंडोनेशिया – सुहार्तो का परिवार तंत्र:

          1967 से 1998 तक राष्ट्रपति सुहार्तो ने 32 वर्षों तक शासन किया। इस दौरान उन्होंने अपने परिवार और दोस्तों को बैंकिंग, तेल, और निर्माण क्षेत्रों पर एकाधिकार दिलाया। जब 1997 में एशियाई वित्तीय संकट आया, तो मुद्रा 80% गिर गई और 1 करोड़ लोग गरीबी में धकेल दिए गए। जनता सड़कों पर उतरीऔर सुहार्तो शासन ढह गया।

वेनेज़ुएला – तेल की लत और सत्ता का जाल:

          ह्यूगो शावेज़ और निकोलस मादुरो के दौर में, सरकारी तेल कंपनी PDVSA राजनीतिक हथियार बन गई। तेल की कीमतों पर निर्भर अर्थव्यवस्था ने जैसे ही गिरावट देखी, 2013–18 के बीच GDP 75% घट गई, और देश की मुद्रा में 10 लाख प्रतिशत मुद्रास्फीति आई। आज दुनिया के सबसे अमीर तेल भंडार वाले देश के नागरिक बिजली और दवाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

भारत में क्रोनी पूँजीवाद की ऐतिहासिक जड़ें:

          भारत में सत्ता और पूँजी का रिश्ता नया नहीं है — यह ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से ही मौजूद रहा है।

औपनिवेशिक दौर – ईस्ट इंडिया कंपनी से टाटा तक :

          19वीं शताब्दी में जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत पर शासन कर रही थी, तब कुछ भारतीय व्यापारी ब्रिटिश सत्ता के करीबी बनकर “राजा बाजार” के ठेकेदार बने। स्वतंत्रता के बाद, जे.आर.डी. टाटाघनश्यामदास बिड़ला और वालचंद हिराचंद जैसे उद्योगपति राष्ट्र निर्माण में अहम थे, लेकिन उस समय भी सरकारी संरक्षण और लाइसेंस आधारित उद्योग प्रणाली बनी रही।

1960–80: “लाइसेंस-परमिट राज”:

          इस दौर में निजी उद्योगों को हर विस्तार के लिए सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था।
यह व्यवस्था “नियमन” के नाम पर भ्रष्टाचार का जाल बन गई।जो उद्योगपति सत्ता के करीबी थे, उन्हें लाइसेंस और सब्सिडी मिलती रही। 1970 के दशक में टाटा और बिड़ला समूहों की कुल पूँजी पर “MRTP Act” लागू हुआ,  लेकिन छोटे उद्योगों के बजाय इन्हीं समूहों को राहत दी गई।

1991 का उदारीकरण – नए पूँजीपतिनई राजनीति:

          पी.वी. नरसिंह राव और मनमोहन सिंह द्वारा 1991 में किए गए आर्थिक सुधारों ने निजी पूंजी के लिए दरवाजे खोले। इससे देश में तेजी आई, लेकिन 2000 के दशक तक यह “कॉर्पोरेट–राजनीतिक गठजोड़” में बदलने लगा। नीरा राडिया टेप्स (2010), 2G और कोयला घोटाले जैसे प्रकरणों ने दिखाया कि नीतियां अब बोली पर तय होती हैं।

अडानी मॉडल: विकास या निर्भरता का भ्रम:

          भारत के सबसे चर्चित उद्योगपति गौतम अडानी अब वैश्विक प्रतीक बन चुके हैं — न सिर्फ़ संपत्ति के, बल्कि उस संरचना के जहाँ सत्ता और पूँजी की दूरी खत्म हो चुकी है। Adani Group की कुल वैल्यू 2025 में लगभग ₹19 लाख करोड़ आंकी गईजबकि कर्ज़ ₹2.4 लाख करोड़ से अधिक है। RBI और SBI की रिपोर्ट के अनुसार—

·        SBI ने अडानी समूह को ₹33,800 करोड़,

·        PNB ने ₹12,000 करोड़,

·        और पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) ने ₹1,08,000 करोड़ तक का ऋण दिया।

          ये वही बैंक हैं जो आपके टैक्स से चलते हैं। यानी — जनता का पैसानिजी साम्राज्य की ईंटें बन रहा है।

          2018 में सरकार ने छह हवाई अड्डों के निजीकरण का फैसला किया। निविदा में अडानी समूह ने बिना किसी पूर्व अनुभव के  बोली जीती — और सभी छह पर अधिकार मिला। नीतियों में बदलाव हुआ, पात्रता मानदंड घटाए गए, और प्रतिस्पर्धा ख़त्म हुई। 2023 में  Financial Times और Hindenburg Research ने रिपोर्ट प्रकाशित की — जिसमें अडानी समूह पर शेयर हेराफेरी और टैक्स हैवन कंपनियों से निवेश छिपाने के आरोप लगे।
अडानी समूह ने इन आरोपों को नकारा, लेकिन उनके शेयर मूल्य में 100 अरब डॉलर से अधिक की गिरावट आई। फिर भी, सरकारी एजेंसियों और बैंकों का रवैया अपरिवर्तित रहा। क्योंकि सवाल अब उद्योग का नहीं, सत्तासंबंधों का था।

आपका टैक्सउनका कर्ज़:

भारत का टैक्स सिस्टम इस गठजोड़ का मौन हिस्सा है। वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार,
देश के सीधे टैक्स राजस्व का 72% हिस्सा वेतन भोगी और छोटे व्यापारियों से आता है। जबकि बड़ी कंपनियों के लिए कर–छूट, सब्सिडी और टैक्स रिबेट का आँकड़ा ₹2.25 लाख करोड़ (RBI, 2024) से अधिक है। यह स्थिति उस असमानता को जन्म देती है जहाँ–

·        आम आदमी पेट्रोल पर 28% GST देता है,

·        लेकिन कॉर्पोरेट समूहों को अरबों की छूट मिलती है।

·        यानी — आपका टैक्सउनका लाभ।

सामाजिक प्रभाव: अमीरी की चोटीगरीबी का महासागर:

          Oxfam की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 100 सबसे अमीर व्यक्तियों की संपत्ति महामारी के दो वर्षों में ₹54 लाख करोड़ बढ़ी।  उसी समय, 60% भारतीयों की आय घटी।

इस असमानता का परिणाम सिर्फ़ आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक भी है —

·        बेरोज़गारी दर (CMIE, 2025) 7.2% पर बनी हुई है,

·        ग्रामीण मजदूरी में वास्तविक वृद्धि शून्य है,

·        और शिक्षा व स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च GDP का केवल 2.8% है।

यथा – जब संसाधन कुछ हाथों में सिमटते हैं, तो बाकी जनता के हिस्से सिर्फ़ “विकास के नारे” आते हैं।

लोकतंत्र और जवाबदेही का संकट:

          भारत का संविधान कहता है कि राज्य “जनता के हित में” कार्य करेगा। लेकिन आज की स्थिति में नीति निर्माण पर कॉर्पोरेट प्रभाव इतना बढ़ गया है कि संसद की भूमिका घटती जा रही है। कॉर्पोरेट राजनीतिक फंडिंग के लिए बनाए गए Electoral Bonds scheme

 (2018–2024) ने यह स्पष्ट कर दिया कि पारदर्शिता” अब अतीत की बात है।  सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया, लेकिन 12,000 करोड़ रुपये से अधिक की अघोषित फंडिंग पहले ही हो चुकी थी — जिसमें सबसे बड़ा लाभ उन्हीं समूहों को मिला जो सरकारी ठेके और कर्ज़ पा रहे थे। यानी अब लोकतंत्र केवल मतपत्र का नहीं, बैंक ड्राफ्ट का खेल बन गया है।

भारत के सामने विकल्प: सुधार या पुनरावृत्ति:

          भारत अभी रूस या वेनेजुएला नहीं बना है, लेकिन संकेत ख़तरनाक हैं। RBI की “Financial Stability Report” (2025) में बताया गया है कि यदि शीर्ष 10 कॉर्पोरेट समूहों के कर्ज़ का केवल 10% डिफॉल्ट होता हैतो बैंकिंग प्रणाली को ₹3.5 लाख करोड़ का नुकसान होगा —जो GDP का लगभग 1% है। इससे ब्याज दरें बढ़ेंगी, ईएमआई महँगी होगी, और सरकार को टैक्स बढ़ाकर घाटा भरना पड़ेगा। अर्थात — जोखिम उनकाकीमत आपकी।

सारांशत: विकास या भ्रम का साम्राज्य:

          भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि क्या वह सत्ता और पूँजी के बीच की दूरी बनाए रख पाता है या नहीं। विकास की असली कसौटी अरबपतियों की संपत्ति नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन–स्तर में सुधार है। क्रोनी कैपिटलिज़्म का सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि यह न केवल अर्थव्यवस्था को, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को भी कमजोर करता है। जब पूँजी नीति बनाती है, और जनता केवल दर्शक बन जाती है, तो लोकतंत्र “जनता का शासन” नहीं, बल्कि “कॉर्पोरेट प्रबंधन” बन जाता है। भारत के इतिहास में हमेशा ऐसे दौर आए हैं जब जनता ने सत्ता को आईना दिखाया — अब वही समय फिर लौटता दिख रहा है। क्योंकि सवाल सिर्फ़ अडानी या किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो टैक्स से साम्राज्य और मेहनत से असमानता पैदा करती है। इसलिए अगली बार जब आप टैक्स भरें, तो याद रखिए — यह पैसा सिर्फ़ सड़क या पुल बनाने में ही नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को बनाए रखने में भी जा रहा है जो यह तय करती है कि “कौन अमीर बनेगा, और कौन सवाल पूछने के लिए ग़रीब रह जाएगा।”

सारांश संस्करण :

भारत की अर्थव्यवस्था आज तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके भीतर एक गहरी खाई भी उतनी ही तेज़ी से चौड़ी हो रही है — अमीरी और गरीबी की। Oxfam India की रिपोर्ट कहती है कि देश के सिर्फ़ 1% अमीर लोग 73% संपत्ति पर कब्जा रखते हैं। यह असमानता केवल बाजार की ताकत का नहीं, बल्कि क्रोनी कैपिटलिज्म  यानी “सत्ता और पूंजी के गठजोड़” का परिणाम है। दुनिया के इतिहास में यह खेल नया नहीं।

          रूस में पुतिन के दौर में, फिलीपींस में मार्कोस के राज में, इंडोनेशिया में सुहार्तो के समय और वेनेजुएला में मादुरो शासन में यही हुआ —जब सरकारें चंद उद्योगपतियों को राष्ट्रीय “चैंपियन” बनाती हैं, तो देश का विकास कुछ समय के लिए चमकता है, लेकिन फिर वही चमक भ्रष्टाचार, कर्ज़ और गिरती अर्थव्यवस्था में बदल जाती है। भारत में भी सत्ता और पूँजी का यह रिश्ता नया नहीं है। औपनिवेशिक युग से लेकर “लाइसेंस–परमिट राज” और 1991 के उदारीकरण तक, हमेशा वही उद्योगपति आगे बढ़े जो सत्ता के करीब थे। आज यह रिश्ता पहले से कहीं ज़्यादा गहराया है। अडानी समूह इसका प्रतीक बन चुका है। ₹19 लाख करोड़ की मार्केट वैल्यू और ₹2.4 लाख करोड़ से अधिक के बैंक कर्ज़ के साथ, अडानी ने 6 हवाई अड्डों, बिजली, बंदरगाह, मीडिया और रक्षा क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बना ली है — वो भी अक्सर नीतियों के संशोधन और सरकारी बैंक ऋणों के सहारे। SBI, PNB और पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन जैसे बैंकों ने जनता के टैक्स से अर्जित धन से अरबों रुपये के ऋण दिए हैं।

          यह वही पैसा है जो आम नागरिक पेट्रोल, जीएसटी और इनकम टैक्स में भरता है। वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 72% टैक्स आय वेतनभोगी और छोटे व्यापारियों से आती है,
जबकि बड़े उद्योगों को हर साल ₹2 लाख करोड़ से अधिक की कर छूट मिलती है। यानी आपका टैक्सउनका कर्ज़।परिणाम साफ़ हैं —

·        बेरोज़गारी 7% के आस-पास स्थिर है,

·        ग्रामीण आय नहीं बढ़ रही,

और शिक्षा व स्वास्थ्य पर सरकार GDP का केवल 2.8% खर्च कर रही है। लोकतंत्र की पारदर्शिता भी इस गठजोड़ की चपेट में है। “इलेक्टोरल बॉन्ड्स” योजना ने यह दिखा दिया कि कॉर्पोरेट–राजनीतिक फंडिंग अब अघोषित रूप से सत्ता की दिशा तय करती है। नीतियाँ अब संसद में नहीं, बोर्डरूम में बन रही हैं। भारत अभी रूस या वेनेजुएला नहीं बना है, किन RBI की रिपोर्ट चेतावनी देती है — अगर शीर्ष 10 कॉर्पोरेट समूहों के कर्ज़ का 10% भी डिफॉल्ट होता है,
तो बैंकिंग व्यवस्था को ₹3.5 लाख करोड़ का झटका लगेगा। उसकी कीमत चुकाएगा आम करदाता। इसलिए सवाल केवल अडानी या किसी एक उद्योगपति का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का  है जहाँ विकास का मतलब कुछ के लिए समृद्धि और बाकी के लिए सहनशीलता बन गया है।
भारत का लोकतंत्र तभी सुरक्षित रह सकता है जब नीति जनता की जरूरतों से तय हो, न कि पूंजी की चाह से।

Ramswaroop Mantri

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