डॉ. विकास मानव
निदेशक : चेतना विकास मिशन
_आज विज्ञान जहाँ एक ओर लाखों-करोड़ों मील दूर स्थित ग्रहों, तारों और नक्षत्रों के रहस्यों की खोज में लगा हुआ है, वहीँ दूसरी ओर वह कल्पना से परे जो 'सूक्ष्म' हो सकता है, उसके रहस्य को अनावृत करने में लगा हुआ है।_
उदाहरण के लिए हम जीव-जगत की 'मूल इकाई' को लें। वह इतनी सूक्ष्म है की एक अकेले मनुष्य के पूरे शरीर में लगभग आठ सौ अरब ऐसी इकाइयां हैं जो स्वचालित हैं। जीवन की इस 'मूल इकाई' को ही 'कोशिका' कहते हैं।कोशिका की परिधि पर एक झिल्ली बनी रहती है। जब इस झिल्ली को इलेक्ट्रॉनिक दूरबीन से देखा जाता है तो इसमें तीन परतें दिखाई देती हैं लेकिन बाहर से वह सपाट-सी दिखती हैं। हरेक कोशिका में एक केन्द्रक (न्यूक्लियस) होता है जिसके चारों ओर एक दोहरा खोल चढ़ा होता है और बाहरी खोल के साथ ‘साइटोप्लाज़्म’ होता है जो एक लसदार पदार्थ है और फिर प्लाज़्मा होता है।
न्यूक्लियस में ही डी एन ए रहता है। यही मनुष्य के गुण-सूत्रों और अन्य प्रकार की सूचनाओं का भंडार होता है। यह तथ्य जानने योग्य है कि कोशिकाओं की सुनियोजित व्यवस्था से ही हरेक अंग की रचना होती है। जीव और जगत में पनरुत्पत्ति (पुनर्जन्म) की सारी प्रक्रिया का जन्म कोशिका के विखंडन से होता है।
यदि इसे हम और अधिक सरल ढंग से जानना चाहें तो यह कह सकते हैं कि हरेक कोशिका विखंडित होकर एक से दो, दो से चार और चार से आठ –इसी क्रम से खुद अपनी उत्पत्ति करती है और सारी प्रक्रिया में आश्चर्यजनक बात यह है कि अंग विशेष की हर कोशिका अपनी बिलकुल सही प्रतिलिपि या अनुकृति होती है। अर्थात् इसका आकार-प्रकार-पदार्थ –सब एक-सा होता है।
यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो मनुष्य का जन्म एक अकेली कोशिका 'शुक्राणु' से प्रारम्भ होता है। वह शुक्राणु स्त्री के अंडाणु से मिल कर गर्भ में स्थापित हो जाता है। जब भ्रूण गर्भाशय में विकसित होता है तब प्रकृति अपने कठोर रचना-मानकों के अनुसार उसके अंगों का विकास करती है और अंगों के आकार और उनकी वृद्धि की सारी प्रक्रियाएं कोशिकाओं से जुडी होती हैं।
_कोशिका का हरेक विभाजन अंग की आवश्यकता अनुसार हर बार दो गुना होता चला जाता है।
_हर प्रक्रिया अकेली कोशिका से शुरू होती है। इस प्रकार कोशिका न सिर्फ जीवन का प्रारम्भ करने का साधन मात्र है बल्कि वह जीवन की वाहिका भी है अर्थात् *वह अमर है*. चमत्कार तो यह है कि हरेक कोशिका के अपने 'अभिलेखागार' होते हैं।_
इतना ही नहीं, इस अभिलेखागार में अंग विशेष के निर्माण के सारे आवश्यक 'मानकों के नक़्शे' उनके 'संकेत चिन्ह' और 'भविष्य की आवश्यकताओं का लेखा-जोखा' बारीकी के साथ मौजूद होता है।विज्ञान के सामने अभी कुछ ही समय पहले तक यह प्रश्न था– आखिर प्रकृति इतनी सूक्ष्म कोशिका को इतनी सारी सूचनाएं कैसे रटा देती है ? आखिर अंगों की जटिल बनावट, उनके विकास और पतन की सारी सूचनाओं के कूट कार्यक्रम को कोशिका कैसे पचा लेती है ?
लेकिन विज्ञान अब यह रहस्य जान चुका है कि कोशिका के अभिलेखागार में छिपे हुए सारे दस्तावेजों, नक्शों और सांचों की वास्तविक अनुकृति विखंडन के बाद जन्मी कोशिका को प्राप्त होती है। इन दस्तावेजों, नक्शों और सांचों में महत्वपूर्ण दस्तावेज वंशानुगत सूचनाओं के होते हैं।
पिता के गुण-दुर्गुण पुत्र को देने में यही कोशिका कार्य करती है। इतना ही नहीं, अमूर्त गुण-दुर्गुण, आचार-विचार, भाव-व्यवहार आदि के आलावा रूप-रंग, नाक-नक्श, बाल तथा आकार-प्रकार के पैतृक लक्षण भी कोशिकाओं के अभिलेखागार से प्राप्त करके इन्हें आकार-प्रकार प्रदान करती है।
कहने की आवश्यकता नहीं–हरेक कोशिका अपने-आप में एक अबूझ और रहस्यमयी पहेली है।
🌀चेतना विकास मिशन





