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प्रेरणादायक फिल्म झुण्ड आखिर कर मुक्त क्यों नहीं 

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ज्वेल सिद्धकी

अच्छी चीज़ें आजकल बहुत कम देखने को मिलती हैं। बॉलीवुड फ़िल्में भी उनमें से एक हैं। ये देश ऐसा देश है जहाँ ‘ बाहुबली ‘ जैसी वाहियात, घटिया और बे सर-पैर की कहानी वाली फिल्में ज़बरदस्त हिट होती हैं और ‘ झुण्ड ‘ जैसी प्रेरणा और एक सन्देश देने वाली फ़िल्म अपनी लागत भी नहीं निकाल पातीं। किसी फिल्म का हिट या फ्लॉप होना उस समाज की पसंद नापसंद और उसकी समझ के बारे में भी काफ़ी कुछ बताता है। और अगर आप किसी समाज की पसंद नापसंद और उसकी समझ के स्तर को जानते हैं , तो आप उस समाज के बारे में काफ़ी कुछ बता सकते हैं। बाहुबली जैसी फ़िल्म का हिट होना और झुण्ड जैसी फिल्मों का फ़्लॉप हो जाना उस समाज के बारे में काफ़ी कुछ कह जाता है। जो दर्शक बाहुबली जैसी फ़िल्म की बे सर पैर की , अविश्वसनीय, अतार्किक और बेतुकी कहानी को स्वीकार कर ले , उस दर्शक की तार्किक क्षमता पर प्रश्नचिन्ह तो लगना ही चाहिए। बेशक , बहुत सारी फिल्मों का उद्देश्य सिर्फ़ मनोरंजन ही होता है , लेकिन मनोरंजन के नाम पर क्या आपको दिमाग़ एक तरफ़ रख देना चाहिए ? कम से कम हमारा बॉलीवुड तो ऐसी ही फिल्में बनाने का आदी है। 

बहरहाल , झुण्ड एक बेहतरीन फ़िल्म है जिसे हर किसी को देखना चाहिए। फ़िल्म सन्देश देती है कि अगर आप में लगन है और कुछ करने की चाह है तो आपको वैसा करने से कोई नहीं रोक सकता। फ़िल्म कई पहलुओं को छूती है। फिल्म में झोपड़पट्टी के जीवन को बहुत ही सजीवता से दिखाया गया है। झोपड़पट्टी के किरदार भी निर्माता निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले ने झोपड़पट्टी से ही लिए हैं , जिनके सहज और शानदार अभिनय के लिए उन्हें ऑस्कर मिलना चाहिए। हर किरदार बिल्कुल असली इसलिए लगता भी है कि वह झोपड़पट्टी में ही रहता है। अमिताभ बच्चन ने एक फुटबॉल कोच के रूप में शानदार अभिनय किया है। अच्छे कलाकार तो ख़ैर वो हैं ही। हालाँकि देश के मौजूदा धार्मिक , सामाजिक और रजनीतिक माहौल पर उनकी चुप्पी को लेकर मैं उनका घनघोर आलोचक भी हूँ , लेकिन उनकी अदाकारी का भी उतना ही बड़ा प्रशंसक हूँ। एक दर्शक के रूप में मैं उनकी इस सलाहियत और उनके टेलेंट की क़द्र करता हूँ। इस फिल्म में उनका अभिनय उनकी इस सलाहियत के मुताबिक़ ही शानदार है। फ़िल्म यह भी बताती है कि कोई जन्मजात अपराधी नहीं होता। उसकी परिस्थितियां , उसका परिवेश , उसका पालन पोषण भी उसको अपराधी बना देता है। अमिताभ बच्चन झोपड़पट्टी के आवारा लड़कों को फुटबॉल खेलने के लिए प्रेरित करते हैं। जिससे उनको एक मक़सद मिलता है और वो धीरे धीरे नशे की आदत और चोरी चकारी जैसी चीज़ों से भी दूर हो जाते हैं। फिल्म में फुटबाल जैसे खेल की उपेक्षा भी एक पहलू है। फ़िल्म हर लिहाज़ से उम्दा है। स्टोरी , स्क्रीनप्ले और डायलॉग तीनों ही बहुत ही रियल लाइफ जैसे हैं। 

हमारी सरकारें ‘ कश्मीर फाइल्स ‘ जैसे झूठ के पुलिंदे को टैक्स फ्री करती है , और झुण्ड जैसी प्रेरणा देने वाली फ़िल्म से पूरा टैक्स वसूलती है।

Ramswaroop Mantri

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