राजकुमार भाटी, प्रियंका भारती, डॉ कंचन यादव, सारिका पासवान को टीवी डिबेट में न बुलाने का “उच्चस्तरीय” निर्देश!
इन दिनों कथित राष्ट्रीय टीवी चैनलों (जिन्हें मैं टीवीपुरम कहता आ रहा हूं) की ‘पहले से खुली पोल’ अब और भी खुल रही है. इन्हें संपादक, प्रबंधक और एंकर ही नहीं कथित स्वतंत्र पैनलिस्ट भी किस तरह एक जैसी सोच और एक ही सामाजिक पृष्ठभूमि के होने चाहिए! शर्मनाक!
उर्मिलेश-
पिछले कुछ दिनों से पिछड़े और वंचित सामाजिक पृष्ठभूमि वाले चार टीवी पैनेलिस्ट (जो दो अलग-अलग पार्टियों के प्रवक्ता हैं) बहुत ही रोचक और विचारोत्तेजक चर्चा का विषय बने हुए हैं. इनके नाम हैं: Priyanka Bharti, Dr Kanchana Yadav, Sarika Paswan और Raj Kumar Bhati. इनमें प्रियंका, कंचना और सारिका राष्ट्रीय जनता दल की प्रवक्ता हैं. राजकुमार भाटी समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता हैं. सारिका को छोड़कर मैं तीन पैनेलिस्ट और प्रवक्ताओं को थोडा-बहुत जानता भी हूं.
मैं टीवी चैनल बहुत कम देखता हूं. लेकिन प्रियंका, कंचना और राजकुमार भाटी जैसे प्रवक्ताओं के अलावा कुछ टीवी एंकरों: प्रीति चौधरी, राजदीप सरदेसाई, संदीप चौधरी, गरिमा सिंह और साहिल जोशी आदि को भी बड़े चैनलों के यूट्यूब पर यदा-कदा सुन लेता हूं.
यह बात मैं पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि Priyanka Bharti, Dr Kanchana, Sarika Paswan और Rajkumar Bhatii को प्रवक्ता बनाकर “इनके दलों ने अपने साथ न्याय” किया है.
हिंदी के टीवी चैनलों में (कुछ अपवादों को छोड़कर) बहस और विचार पहले भी ज्यादा स्तरीय नहीं होते थे..लेकिन 2017 के बाद इनकी बहसों का स्तर बहुत बुरी तरह गिरा. 2019 से हिंदी टीवी चैनलों के पैनल डिस्कशन अपशब्द, अज्ञान और सामंती हेकड़ी के कर्कश कोलाहल में तब्दील हो गये! इसमें सामंती मिजाज के वर्चस्ववादी तत्वों, सत्ता-वैभव की ठसक से भरे कथित प्रवक्ताओं और स्वतंत्र पैनेलिस्ट के तौर पर अवतरित होने वाले ‘विचारहीन विचारकों’ की बड़ी भूमिका रही. लेकिन इनसे भी बड़ी भूमिका ऐसे तत्वों को बुलाने वाले चैनलों की मानी जायेगी.
हमने तो पार्टी प्रवक्ता या पदाधिकारी के रूप में वी एन गाडगिल, एस जयपाल रेड्डी, अजित जोगी, अंबिका सोनी, गोविंदाचार्य, सुषमा स्वराज, प्रमोद महाजन और सीताराम येचुरी आदि को भी देखा था. पर बड़ी पार्टियों में आज की सबसे बड़ी पार्टी ने जिस तरह अपने ज्यादातर प्रवक्ताओं और टीवी पैनेलिस्टों की पौध उगाई है; वह किसी भी स्तर के लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं हो सकती!
ज्यादातर हिंदी टीवी चैनलों पर चौतरफा चलने वाले कर्कश कोलाहल के ऐसे दौर में RJD और SP ने क्रमश: प्रियंका भारती, कंचना यादव, सारिका पासवान और राजकुमार भाटी जैसों को अपना प्रवक्ता/ पैनेलिस्ट बनाकर ऐसा काम किया; जिसकी कुछ साल पहले तक कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. इसमें सिर्फ इनकी सबाल्टर्न पृष्ठभूमि ही महत्वपूर्ण नहीं है; इनका ज्ञानवान, तार्किक, साहसी और अपनी वैचारिकी को लेकर प्रतिबद्ध होना भी बहुत उल्लेखनीय है.
इनके विमर्शकार रूप के बारे में अपने बहुत भरोसेमंद और सम्मानित मित्रों से अनेक बार सुना है. कई बार स्वयं देखा भी है! सचमुच ये बहुत प्रखर और तार्किक हैं. पिछले कुछ दिनों से सुन रहा हूं कि सत्ताधारी खेमे के प्रवक्ता और ‘विचारक’ इन चारों से बहुत परेशान हैं. वे इनमें ज्यादातर को बहस में न बुलाने का टीवी वालों को ‘निर्देशात्मक संदेश’ दे रहे हैं! ज्यादातर टीवी वाले एंकर-संपादक भी इन चारों को लेकर बहुत सहज नहीं बताये जाते हैं.
एक तो सबाल्टर्न, दूसरे इतने ज्ञानवान! ये चारों ‘अपाच्य’ तो लगेंगे ही! हमारे जैसे वर्ण-वर्चस्व वाले समाज के प्रतिष्ठानों में ये सब चीजें एक सीमा के बाद असहनीय हो जाती हैं! इसलिए सुना है, कुछ चैनलों पर इनमें कुछ युवा प्रवक्ताओं को अब बहुत कम बुलाया जा रहा है या नहीं बुलाया जा रहा है!
महज संयोग नहीं कि वैश्विक स्तर पर भारत के टीवी न्यूज चैनलों को किसी भी लोकतांत्रिक देश का मीडिया भी गंभीरतापूर्वक नहीं लेता. ऐसे चैनलों को वे मीडिया, खासकर पत्रकारिता का हिस्सा ही नहीं मानते!
विश्व की सबसे बड़ी और सबसे अमीर पार्टी राजद की दो लड़कियों से डर गई. बीजेपी ने कंचना यादव और प्रियंका भारती को सभी न्यूज़ चैनल्स की डिबेट से बैन करवा दिया. क्योंकि ये बीजेपी के प्रवक्ताओं (जिनमे एंकर और राजनीतिक विश्लेषक भी शामिल हैं.) पर भारी पड़ रही थी.
दरअसल बीजेपी के पास इंटेलेक्चुअल लोगों की कमी है. कल तक जो कांग्रेस , सपा , जनता दल यूनाइटेड या शिवसेना के प्रवक्ता थे. वो बीजेपी ज्वाइन करते ही अगले दिन से बीजेपी की ओर से डिबेट में बैठने लगते हैं. जबकि एक प्रवक्ता को पार्टी के इतिहास विचारधारा सिद्धांत और नीतियों की पूरी जानकारी होनी चाहिए.
बीजेपी और राइट विंग के लोग सुधांशु त्रिवेदी को जीनियस मानते है लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद जब विदेशों में सांसदों का डेलीगेशन भेजा गया तो सुधांशु त्रिवेदी को नहीं चुना गया. क्योंकि पार्टी को हकीकत पता है. इसलिए शशि थरूर और ओवैसी की ही याद आयी.
अब बात राजनीतिक विश्लेषकों की.. जिनके नाम के आगे प्रोफेसर लगा होता है. आज सबको पता है कि एक खास विचारधारा के लोग बड़ी आसानी से प्रोफेसर तो क्या कुलपति तक बन रहे है. लेकिन नॉलेज कहाँ से आएगी. इसलिए डिबेट में जैसे ही फैक्ट्स पर बात होती है ये टिक नहीं पाते .
एंकर ने भी जाने कब से पढ़ना लिखना छोड़ दिया है. क्योंकि डिबेट का विषय पैनेलिस्ट ऑडियंस सब कही और से तय हो रहा है. तो ज्यादा दिमाग क्या लगाना. ऐसे में Jnu से निकले लोगों से परेशानी तो होगी.
-अरविंद खरे
इन चार प्रवक्ताओं में से कम से कम 3 अव्वल दर्जे के बदतमीज हैं, इसकी भाषा ऐसी नहीं है कि उन्हें सार्वजनिक मंच पर बुलाया जाए। ये सामाजिक न्याय नहीं, लठैतवाद के प्रवक्ता हैं।
हालांकि खराब भाषा के आधार पर अगर इन्हें पैनल से बाहर किया गया है तो इसकी सख्त निंदा होनी चाहिए। टीवी चैनलों की भाषा पहले ही गिरी हुई है, जिसे गिरे हुए लोग काफी पसंद भी करते हैं।
ऐसे में ये बदतमीज प्रवक्ता टीबी चैनलों के हीरो हीरोइन माने जाने चाहिए। इन्हें इनकी गंदी भाषा के आधार पर गंदगी फैलाने के लिए पैनल में उचित जगह मिले, इसके लिए उर्मिलेश जी मुहिम चला रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार हैं, दूर की सोचते हैं।
-एम कुमार





