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क्या धर्म आंसुओं की घाटी का प्रतिबिम्ब है!?

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(कार्ल मार्क्स और धर्म)
~ प्रिया (पुडुचेरी
)

धर्म आँशुओं की घाटी का प्रतिबिम्ब है. मार्क्स-ऐंगेल्स का यह वाक्य, बार बार कही बात एक बार फिर दोहराने को विवश करता है कि कितना बड़ा कवि था यह दार्शनिक । यह भी कि दुनिया के जितने भी दार्शनिक हुये हैं (और पढ़ने में आये हैं) उनमे सबसे ज्यादा गहराई के साथ किसी ने धर्म को समझा और आत्मसात किया है तो उसका नाम है : कार्ल मार्क्स ।
वैसे तो कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में एंगेल्स के साथ मिलकर 29 वर्ष के मार्क्स लिख चुके थे कि “धार्मिक, दार्शनिक और सामान्यतः विचारधारात्मक दृष्टि से कम्युनिज्म के खिलाफ जो आरोप लगाये जाते हैं, वे इस लायक नहीं है कि उन पर गंभीरता से विचार किया जाये ।” मगर धर्म के बारे में मार्क्स की समझ को समझना जरूरी है । वे आंसुओं की घाटी की उपमा से धर्म का जो नक्श उभारते हैं वह धर्म के धिक्कार या तिरस्कार की नहीं है, उसकी उपज और आवश्यकता समझ कर जड़ तक पहुँचने की है ।
वे कहते हैं :”मनुष्य को स्वर्ग की भव्य काल्पनिक यथार्थता में अति मानव की तलाश थी, किन्तु उसे वहां अपने प्रतिबिम्ब के अलावा कुछ नहीं मिला ।”

आरम्भिक समाजों में विचार और दर्शन, शासन और उसका प्रतिरोध,जड़ता को कायम रखने और उन्हें तोड़ने के काम धर्म की भाषा में ही हुये हैं । इसलिये यह शोषण का एक रूप है तो साथ ही उसके विरोध की अभिव्यक्ति भी है ।
उनके “धर्म एक अफ़ीम है” शब्द को लेकर उछलकूद मचाने वालों में ज्यादातर अफ़ीम-तस्कर हैं । वे उस पूरे वाक्य को कभी नहीं पढ़ते जो इन 4 शब्दों के निष्कर्ष तक पहुंचाता है ।
(मजे की बात ये है कि इसमें कई मार्क्स को मानने वाले भले लोग भी हैं जो सन्दर्भ से काट कर इन 4 शब्दों की गदा भाँजते रहने और उससे खुद ही को चोटिल करने के पुण्य कार्य में लगे रहते हैं ।)

मार्क्स कहते हैं : “धार्मिक व्यथा एक साथ वास्तविक दुःखों की अभिव्यक्ति और उनका प्रतिवाद दोनों है । धर्म उत्पीड़ित प्राणी की आह है । धर्म आत्माहीन परिस्थितियों की आत्मा है । धर्म ह्रदयहीन विश्व का ह्रदय है । निर्दयी संसार का मर्म है तथा साथ ही निरुत्साही परिस्थितियों का उत्साह और उमंग भी है । इस तरह धर्म एक अफ़ीम है ।”
इसका साफ़ मतलब है कि मार्क्स अफ़ीम को नशे की डोज से अधिक दर्दनिवारक दवा – ट्रैंक्विलाइजर और पेनकिलर – के रूप में लिख रहे हैं । हताश निराश मनुष्य की आभासीय अनुभूति के जरिये के रूप में देख रहे हैं। वे अपने अनुयायियों से कहते हैं कि “धर्म पर हमला करके उसे शहीद मत बनाओ । उन परिस्थितियों पर हमला करो जिनके चलते उसकी जरूरत पड़ती है । “
खुद उनकी अलंकारिक भाषा में : “जनता के आभासीय अवास्तविक सुख के रूप में धर्म के उन्मूलन का अर्थ है – उसके वास्तविक सुख की मांग करना। उन हालात को खत्म करना जिनके लिए भ्रम जरूरी हो जाता है । आंसुओं की घाटी को सुखा दिया जायेगा तो उसकी परछाईं। उसका प्रतिबम्ब अपने आप हट जाएंगे और उसके बाद धर्म व्यक्ति और उसके भगवान – आत्मा और परमात्मा – के बीच का सम्बन्ध बन कर रह जाएगा । न कि अपना दुःख मिटाने के लिए ईश्वर को मनाने या घूस देने का उपक्रम ।”

_विस्तार से बचने के लिये ग्रीक नायक प्रमुथ्यु - प्रोमेथियस - जिसे मार्क्स ने सर्वाधिक प्रखर संत व शहीद कहा - का वह उत्तर जो उसने देवताओं के सेवक हर्मीज को दिया था :_

“तय मानो,
तुम्हारी दासता के लिये
मैं अपने विपदाग्रस्त भाग्य से
मुक्ति नहीं चाहूँगा
देवराज का चाकर बनने से बेहतर होगा
इस चट्टान का चाकर बनना।

कहते हैं यही प्रमुथ्यु (प्रोमीथियस) स्वर्ग से देवताओं की आग चुराकर लाया था ताकि पृथ्वी पर जीवन बच सके।
[चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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