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क्या काँग्रेस का अवसान निकट है….?

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-ओमप्रकाश मेहता

क्या देश का सबसे बुजुर्ग राजनीतिक दल कांग्रेस का अवसान निकट आ गया है? आज यह सवाल इसलिए सुर्खियों में है, क्योंकि इसका विघटन अब केन्द्र व राज्यों के बाद जिला और पंचायत स्तर तक शुरू हो गया है, आज से कुछ ही दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी भी कांग्रेस को लेकर ऐसी ही भविष्यवाणी कर चुके है। भारत को अंग्रेजी राज से मुक्त कराने वाले इस राजनीतिक दल की स्थापना आज से करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व एक विदेशी ए.ओ. ह्यूम ने की थी और भारत के शीर्ष नामी नेताओं लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, रामगोपाल चारी, जवाहरलाल नेहरू आदि ने इसी दल के झण्डे के नीचे आजादी की अलख जगाई थी और लम्बे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजी राज के पंजों से मुक्त कराया था और देश में स्वतंत्र सत्ता स्थापित की थी। आजादी के बाद इसी दल ने करीब चालीस साल इस देश पर राज किया और पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा जी के हाथों में सत्ता की बागडोर रही, लेकिन इंदिरा जी द्वारा 1975 लगाए गए आपातकाल के बाद इस दल का विघटन शुरू हो गया था, जो धीरे-धीरे आज इसकी समाप्ता तक पहुंच रहा है।
काँँग्रेस के विघटन का सबसे बड़ा कारण पूर्व जनसंघ-वर्तमान भाजपा या कोई और नहीं बल्कि यह पार्टी स्वयं है, जिसने देश की राजनीति में परिवारवाद को जन्म दिया, शुरू से यह दल नेहरू खानदान के कब्जे में रहा, सर्वप्रथम इस दल के जन्मदाताओं में से एक पं. मोतीलाल नेहरू उनके बाद उनके बेटे जवाहरलाल नेहरू फिर उनकी बेटी इंदिरा उनके बाद उनके बेटे राजीव, संजय और अब राजीव की विदेशी पत्नी सोनिया और उनके बेटे राहुल इस प्रकार इस दल को यदि ‘खानदानी दल’ कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा।
वास्तव में यदि देखा जाए तो देश के सबसे पुराने और सबसे अधिक समय तक देश पर राज करने वाले इस दल का विघटन इंदिरा जी द्वारा लगाए गए आपातकाल के बाद से ही शुरू हो गया था, आपातकाल के बाद ही प्रतिपक्षी दलों के जयप्रकाश जी जैसे नेताओं ने जनता पार्टी का गठन किया था, जिसने कुछ समय देश पर राज भी किया, इंदिरा के बाद राजीव प्रधानमंत्री बने, जिनकी हत्या के बा ही प्रतिपक्षी दलों को सत्ता का मौका मिला और इसके बाद राजीव की पत्नी सोनिया तथा बेटे राहुल कांग्रेस के सर्वेसर्वा बने और उन्हीं की अनुभव हीनता के कारण अब देश का सबसे पुराना यह राजनीतिक दल विघटन के आखरी दौर से गुजर रहा है, इस बीच गुजराती नेता नरेन्द्र भाई मोदी ने रही सही कसर पूरी कर दी और आज अब इस दल का विघटन उसके अंतिम दौर में चल रहा है और राज्यों के बुजुर्ग नेताओं सहित कांग्रेस के अनुभवी नेता कांग्रेस को छोड़ अन्य दलों विशेषकर भाजपा की ओर रूख कर रहे है। इस संदर्भ में यदि हम अपने मध्यप्रदेश की बात करें तो प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व सबसे मजबूत व अनुभवी नेता कमलनाथ तथा विवेक तनखा भी कांग्रेस का साथ छोड़ने का मन बना चुके है, यही नहीं चर्चा तो यह भी है कि मध्यप्रदेश के एक-तिहाई कांग्रेस विधायक भी कांग्रेस को छोड़कर सत्तारूढ़ भाजपा में शामिल होने की तैयारी कर रहे है। आगामी लोकसभा चुनाव तो अभी करीब साठ-सत्तर दिन दूर है, यह दल-बदल का ‘पुनीत’ कार्य ये विधायक राज्यसभा की रिक्त सीटों के चुनाव (अर्थात् इसी माह) के पहले ही करने वाले है।
देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के विघटन का मुख्य कारण भाजपा या नरेन्द्र मोदी नहीं बल्कि स्वयं सोनिया-राहुल है, जो अनुभव हीनता के कारण कांग्रेस की बागडोर ठीक से संभाल नहीं पा रहे है। इसलिए विकास खण्ड स्तर तक के नेता पार्टी से निराश है और वे इसे छोड़ने को मजबूर हो रहे है।
देश के बुजुर्गों को तो ठीक सभी वर्गों के नागरिकों को इस स्थिति को लेकर काफी अफसोस है।

Ramswaroop Mantri

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