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क्या पार्लियामेंट की जरूरत नहीं रही

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*_ हिसाम सिद्धकी

इस बार उन्नीस जुलाई को शुरू हुए पार्लियामेंट के मानसून इजलास के दौरान जो कुछ नजर आया और तयशुदा मुद्दत से दो दिन पहले ही इजलास को गैर मुअय्यना मुद्दत (अनिश्चित काल) के लिए मुल्तवी करना पड़ा उसे देखकर बड़ी तादाद में लोगों के जेहन में यही सवाल उठ रहा है कि क्या मुल्क में अब पार्लियामेंट की भी जरूरत नहीं है और क्या पार्लियामेंट का जवाज (औचित्य) पूरी तरह खत्म हो गया है। पार्लियामेंट में ऐसे हालात क्यों पैदा हुए कि 19 जुलाई से ग्यारह अगस्त तक एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरा जब दोनों एवान (सदन) यानी राज्य सभा और लोक सभा हंगामों की नज्र न हो गए हों। भले ही इस दौरान अपोजीशन ने बहुत हंगामा किया हो सरकार ने भी हर सतह पर गैरजिम्मेदारी का सबूत दिया। दुनिया की कोई भी जम्हूरियत हो अपोजीशन का तो काम यही है कि वह अपने जायज मतालबात को सरकार के सामने पेश करे और उन्हें तस्लीम कराने की हर मुमकिन कोशिश करे। इसके बावजूद पार्लियामेंट चलाने की जिम्मेदारी सरकार की ही होती है। सरकार यह बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती कि अपोजीशन ने हंगामा करके पार्लियामेंट नहीं चलने दी।
पार्लियामेंट का इजलास खत्म होने के बाद दोनों फरीकैन यानी अपोजीशन और सरकार ने एक दूसरे को कुसूरवार ठहराते हुए जम्हूरियत का कत्ल करने का इल्जाम लगा दिया। राहुल गांधी की कयादत में बारह अगस्त को पन्द्रह पार्टियों के मेम्बरान पार्लियामेंट ने पार्लियामेंट से विजय चौक तक पैदल मार्च किया। राहुल गांधी ने कहा देश के इतिहास में पहली बार ऐसा देखने को मिला कि राज्य सभा में खातून मेम्बरान को मारा-पीटा गया हो। उन्होने कहा कि अपोजीशन और अवाम की आवाज दबाई गयी यह जम्हूरियत के लिए बहुत खतरनाक है। शिव सेना के संजय राउत ने कहा कि जम्हूरियत को कत्ल किया गया है। जवाब में बीजेपी सरकार ने पियूष गोयल, प्रहलाद जोशी, मुख्तार अब्बास नकवी और अनुराग ठाकुर समेत आठ वजीरों को अपने बचाव में मैदान में उतार दिया। इन सभी ने मीडिया से बात की और कहा कि अपोजीशन की वजह से मुल्क की जम्हूरियत शर्मसार हुई है।
पार्लियामेंट का इजलास भले ही एक भी दिन न चल पाया हो लेकिन इसपर सैकड़ों करोड़ रूपए खर्च हो गए। शोरशराबे के दौरान मोदी हुकूमत ने अपनी मर्जी मुताबिक डेढ दर्जन से ज्यादा बिल मंजूर करा लिए, इनमें सिर्फ एक बैकवर्ड तबके से मुताल्लिक बिल पर ही तफसीली चर्चा हुई और यह बिल इत्तेफाक राय से पास हो गया बाकी बिलों पर न कोई चर्चा न बहस। 2014 में जबसे मुल्क में मोदी सरकार आई है एक-एक कर तकरीबन तमाम संवैद्दानिक इदारों की अहमियत खत्म की जा चुकी है। अब अवाम और जम्हूरियत की सबसे बड़ी पंचायत पार्लियामेंट ही बची थी उसे भी खत्म करने की कोशिश की गई। मोदी सरकार ने बैकवर्ड बिल के अलावा नोटबंदी से लेकर किसानी कानूनों तक किसी भी बिल पर न तो अपोजीशन के साथ कोई तबादले ख्याल किया न पार्लियामेंट में बहस।
इस बार पार्लियामेंट में अपोजीशन के मतालबात क्या थे, सिर्फ तीन एक महंगाई और आसमान छूती कीमतों पर बहस, दूसरा तीनों किसानी कानून वापस लेने का मतालबा और तीसरा पेगासस जासूसी मामले पर बहस। इनमें कौन सी बात ऐसी है जो अवाम और मुल्क के मफाद में नहीं है। एक पेगासस जासूसी मामले के लिए तो कहा जा सकता है कि उसकी अहमियत सिर्फ बड़े और नामवर लोगों के लिए है। लेकिन महंगाई और बढती कीमतों और किसानों के आंदोलन का ताल्लुक तो देश के एक सौ चालीस करोड़ अवाम से है। हर अमीर गरीब पर इसका असर पड़ रहा है। किसान आठ महीनों से सड़क पर है। सरकार खुसूसन वजीर-ए-आजम नरेन्द्र मोदी कानों में रूई डाले बैठे हैं। अब अगर अपोजीशन ने उनके कानों से रूई निकालने की कोशिश की तो यह इल्जाम लगाया जा रहा है कि अपोजीशन ने तो जम्हूरियत को शर्मसार किया है। बढती महंगाई और आसमान छूती कीमतों की जद में देश का एक-एक आदमी है। दो सौ रूपए लीटर तक सरसों का तेल दालों चावल, आटा, अंडे गोश्त और सब्जियों की कीमतें आम आदमी की सलाहियत से बाहर हो चुकी है। अब यह भी कीमतें थमने का नाम नहीं ले रही हैं। तो क्या इसपर बहस नहीं होनी चाहिए।
हम यूं ही नहीं कह रहे है कि मोदी और उनकी सरकार ने पार्लियामेंट को भी बेकार और बेजवाज (औचित्यहीन) बना दिया है। पूरी दुनिया की जम्हूरियतों का तरीका है कि सरकार जब भी कोई कानून या बिल लाने की कोशिश करती है तो पहले उसके मसविदे (ड्राफ्ट) पर माहिरीन और अपोजीशन के लीडरान के साथ तबादले ख्याल करती है। फिर पार्लियामेंट में मसविदा लाकर उसपर बहस कराती है। अपोजीशन मेम्बरान के मुनासिब मश्विरों के मुताबिक बिल में कमी बेशी की जाती है। मोदी ने क्या किया? नोटबंदी, दफा-370 खत्म करने और किसानी कानून जैसे अहम फैसले हुए, किसी पर न तो माहिरीन से राय-मश्विरा किया गया न पार्लियामेंट में बहस। नोटबंदी जैसे अहम और हर शहरी पर असर डालने वाला फैसला तो मोदी ने मुल्क पर ऐसे लादा कि उसकी भनक उस वक्त के फाइनेंस मिनिस्टर अरूण जेटली तक को नहीं लगी। बाकी वजीरों की तो बात ही क्या? इसी तरह कश्मीर से दफा-370 हटाने का फैसला हुआ जो मोदी और अमित शाह ने मिलकर किया और चार व पांच अगस्त 2019 की रात में नोटिफिकेशन भी जारी करा दिया। नतीजा यह कि दो साल गुजर जाने के बावजूद जम्मू-कश्मीर के हालात मामूल पर नहीं हैं। तीनों किसानी बिल लोक सभा में लाए गए अपोजीशन और मोदी की अपनी पार्टी बीजेपी के किसी मेम्बर को उसकी कानों कान खबर नहीं लगी। अपोजीशन ने वाकआउट किया और बगैर किसी बहस के लोक सभा से उसे पास करा लिया गया। राज्य सभा मे तो और ज्यादा शर्मनाक फैसला हुआ जहां पूरा अपोजीशन वेल में खड़ा होकर नारेबाजी करता रहा लेकिन डिप्टी स्पीकर ने एलान कर दिया कि आवाज के वोट पर बिल पास कर दिया गया। अगर ऐसे ही बिल पास कराने और कानून बनाने हैं तो फिर पार्लियामेंट की जरूरत ही क्या है?

हिसाम सिद्धकी लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं और उर्दू अखबार जदीद मरकज के संपादक

Ramswaroop Mantri

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