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जरूरी बात : हे नागरिक, खुद को संभालिए वरना देर हो जाएगी

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संजय मिश्र

 कोरोना महामारी ने एक बार फिर हमें बर्बादी के रास्ते पर धकेल दिया है। एक ऐसा रास्ता जहां से आगे बढ़ना और पीछे लौटना दोनों ही मुश्किल है। इसलिए धैर्य, विवेक और आपसी सहयोग से इसका मुकाबला करने की जरूरत है। यह सोचने की भी जरूरत है कि आखिर कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयानक क्यों बन रही है। ऐसा क्या हुआ कि कोरोना की टूटती डोर एकाएक इतनी मजबूत हो गई। जिधर देखो, उधर ही संक्रमितों की संख्या बढती जा रही है। पिछले वर्ष की परिस्थितियों पर गौर करें तो पाएंगे कि कोरोना वायरस के बारे में पर्याप्त जानकारी न होने के बावजूद हमने उसका मुकाबला बेहतर ढंग से किया था। एक अपील पर व्यापारी से लेकर आम नागरिक तक ने खुद को घरों में बंद कर लिया था। सरकार एवं स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशा-निर्देशों का अनुपालन करने में तत्परता बरती गई। खुद के अनुशासन एवं सरकार द्वारा लगाई गईं पाबंदियों के कारण हमें कोरोना का प्रसार रोकने में कामयाबी मिली। लोग शारीरिक दूरी बनाने एवं मास्क पहनने की अनिवार्यता समझने लगे थे। लगने लगा था कि कोरोना अपने अंतिम दौर में पहुंच गया है। 2020 के अंतिम महीनों में पुराने दिनों के लौटने की उम्मीद जागने लगी थी। इसी उम्मीद में हम इस तरह लापरवाह हो गए कि जाता हुआ कोरोना फिर से लौट आया और वह भी पहले से ज्यादा ताकतवर बनकर।

यह सच्चाई है कि प्रदेश में कोरोना संक्रमण प्रतिदिन तेज गति से बढ़ रहा है। इसके सामने सरकार और प्रशासन की व्यवस्थाएं छोटी पड़ने लगी हैं। स्थिति यह हो गई है कि संक्रमित मरीजों के लिए अस्पतालों में आसानी से बिस्तर नहीं मिल रहे हैं। दवा, वेंटिलेटर और ऑक्सीजन की भारी कमी है। गंभीर संक्रमित मरीजों को भर्ती करने से अधिकतर अस्पताल मना कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास संसाधन नहीं हैं। हर तरफ हायतौबा मची है। सरकार व्यवस्था दुरुस्त करने में लगी है लेकिन उसे रोज की परिस्थितियों से लड़ना पड़ रहा है।दरअसल, कोरोना के प्रसार में आमजन के बेलौस आचरण के साथ प्रशासनिक मशीनरी की सुस्ती भी एक कारण है। 2021 के शुरूआत से लेकर मार्च माह तक सबने मान लिया था कि अब कोरोना कोई बड़ा खतरा नहीं है। कुछ लोग इसे सामान्य फ्लू बताने लगे थे। लोगों को धूमधड़ाके की छूट मिलने लगी। आना-जाना, खाना-पीना सब पहले जैसा होने लगा। बाजारों एवं समारोहों तक में लोग मास्क पहनने से परहेज करने लगे। थोड़ी राहत क्या मिली बेलौस हो गए। न मास्क पहनने की चिंता रही और न शारीरिक दूरी बनाने की। पुलिस-प्रशासन भी ऐसे शिथिल हो गया जैसे कोरोना चला गया हो।

हे नागरिक, अब भी वक्त है अपनी गलतियों से सबक लीजिए। मास्क व शारीरिक दूरी ही हमारे सुरक्षा कवच हैं। जरूरी न हो तो घर से न निकलें, मास्क पहनें और शारीरिक दूरी बनाएं। कोरोना महामारी पीक पर पहुंचने वाली है। आगे शायद चुनौती बड़ी होगी। अस्पतालों में बिस्तर, दवाएं, ऑक्सीजन आदि समय से मिल पाएंगे, कहना मुश्किल है। इसलिए बिना मास्क पहने घर से न निकलें। किसी से मिलें तो कम से कम तीन मीटर की दूरी से। यह दूरी ही नजदीकी बनाए रखेगी, वरना….।

Ramswaroop Mantri

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