अग्नि आलोक
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अच्छी बात नहीं है लोकभाषा का विस्मरण

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जूली सचदेवा

“”हम दही के लिए दूध पझाते हैं। सब्जी या कोई दम बन जाने पर आँच बंद कर उसको थोड़ी देर समझने देते हैं। लैनू निकाल कर घी खराते हैं। साग बनाते बनाते उसका पानी थोड़ा सोंठाते हैं। भुजिया बनाते हुए झूर करते हैं। 

_आप भी करते हैं यह सब?”_

यह सुदीप्ति Sudipti  की पोस्ट है। इसे यहां साझा करने का एक विशेष उद्देश्य है।

     आज हम लोक से जुड़े उन शब्दों से धीरे-धीरे वंचित हो रहे हैं जिनमें अभिव्यक्ति की अनोखी सामर्थ्य ही नहीं है, वे पीढ़ियों से लोक के द्वारा द्वारा आजमाए, परखे जाते रहे हैं।

उमालना, तताना, भूँजना, भउरना, भुटना, कौलना/ कहुलना/कउरना, कल्हारना/तँतारना। चुरना, सिझना, खरना, बलकाना, भलकाना, खौलाना।ओलना, भिजाना, रीझना, थिमना, थिराना, सीझना, जरना। तलना, सेंकना, छानना/काढ़ना। गालना, फेंटना, तलना, बघारना, छौंकना, तड़का लगाना। …. ये कुछ क्रियाएँ हैं। ऐसे सैकड़ों प्रयोग लोक में हैं। क्या इन्हें अंग्रेजी या किसी संभ्रांत कही जाने वाली भाषा में व्यक्त किया जा सकता है?

यूट्यूब में पाककला संबंधी सैकड़ों, शायद हजारों वीडियो मिल जाएंगे। पुस्तकें और आलेख छपते रहते हैं लेकिन sautée, mash, grind, chop, roast जैसी शब्दावली पश्चिम से ली हुई, जिसे यहां आज नई पीढ़ी भी ठीक से नहीं जानती। 

_क्या कुछ सोचना बनता है?_

    (चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

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