
*रामस्वरूप मंत्री*
देश के बिगड़ते पर्यावरण के लिए खेतों में जलाए जाने वाली नरवाई को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। सरकार का भी मानना रहा है कि नरवाई जलाने से जो प्रदूषण फैलता है वह बीमारी को न्योता देता है । अनेक पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी इस बात की सिफारिश की है कि नरवाई जलाए जाने को रोका जाना चाहिए। लंबे अरसे से नरवाई जलाने पर रोक की मांग को देखते हुए सरकार ने कानून बना दिया है की नरवाई जलाना दंडनीय अपराध है । इसको लेकर मध्य प्रदेश के मालवा निमाड़ अंचल में और देश के कई राज्यों में किसानों को आर्थिक रूप से दंडित भी किया गया है ,लेकिन फिर भी नरवाई जलाने का सिलसिला थमा नहीं है । आज भी मध्य प्रदेश हो, राजस्थान हो या उत्तर प्रदेश यह देश का अन्य कोई हिस्सा जहां-जहां गेंहू का उत्पादन होता है वहां के खेतों में नरवाई जलाने का सिलसिला आज भी चल रहा है । आज भी यदि आप कहीं सड़क मार्ग से या रेल मार्ग से जाते हैं तो नरवाई का उठता धुंआ चारों और दिखाई दे जाती है। किसानों का कहना है कि उनके पास गेहूं कटाई के बाद खेत को फिर से बौनी लायक बनाने के लिए नरवाई जलाना एकमात्र रास्ता है, इसके अलावा खेत को फिर से बौनी लायक नहीं बनाया जा सकता है । इसीलिए चाहे कानून बना दे या दंडनीय अपराध, नरवाई जलाने का सिलसिला थमेगा नहीं ।
सरकार और पर्यावरण विद् यदि नरवाई को जलाने से रोकना चाहते हैं तो उन्हें कुछ ऐसे उपाय करना होंगे, जिससे किसान नरवाई को अन्य तरीके से नष्ट कर सके। नरवाई को आग के हवाले कर देने से केवल एक दिन में खेत खाली हो जाता है ,जबकि यदि उसे पलाऊ करके हटाया जाए तो समय भी ज्यादा लगता है और खर्च भी । किसानों के लिए यही सबसे बड़ी समस्या है । हालांकि कई विशेषज्ञों ने नरवाई के अन्य उपयोग सुझाये हैं लेकिन उसके प्रशिक्षण के लिए कोई व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की गई है।
किसानों के बीच नरवाई जलाना एक प्रथा सी बन गई है। किसान को मालूम रहता है कि वह नरवाई जलाकर वातावरण को प्रदूषित कर रहा है फिर भी वह अपने निजी सुविधा के लिये इसको नहीं छोड़ रहा है। अधिकांश किसान खेत में फसल के अवशेषों को नहीं जलाते और वह जुताई कर इन्हें भूमि में ही मिलाना पसंद करते हैं कुछ अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि मात्र 5 प्रतिशत किसान ही फसलों के अवशेष भूसे को जलाकर इसका प्रबंधन करते हैं ताकि अगली फसल की जुताई व बुआई में कोई अड़चन न आये। भूसा जलाकर उसका प्रबंधन करना सबसे सस्ता उपाय है।
खेत में भूसा रहने की स्थिति में जुताई कर उसे मिट्टी में मिलाना एक कठिनाई भरा महंगा कार्य है। कटाई के लिए कम्बाईन के उपयोग बढऩे के बाद यह समस्या और बढ़ती चली जा रही है। इस कारण किसान भूसे को जुताई कर मिट्टी में मिलाने से बचना चाहते हैं और नरवाई का सहारा लेते हैं। मध्यप्रदेश का किसान खरीफ की प्रमुख फसल की बुआई प्रथम वर्षा के तुरंत बाद ही करना चाहता है ताकि उसे सोयाबीन का उत्पादन अच्छा मिले। इसके लिये वह गर्मी में ही अपने खेत तैयार करना चाहता है। खेत में गेहूं के अधिक अवशेष होने की स्थिति में यह सम्भव नहीं हो पाता। इसके लिए वह सरल उपाय नरवाई का सहारा लेता है यह स्थिति उन क्षेत्रों में अधिक रहती है। जहां की मिट्टी अधिक चिकनी रहती है। इस प्रकार की भूमि में जल भराव तथा भूमि के ठोसपन की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसके कारण किसान नरवाई को एकमात्र विकल्प मानता है गेहूं की अधिक उपज लेने वाले क्षेत्रों एवं खेतों में भूसे का उत्पादन भी अधिक होता है ऐसी स्थिति में भूसे को जुताई द्वारा भूमि में समायोजित करना एक कठिन कार्य हो जाता है जो किसान को नरवाई के लिये प्रेरित करता है।
धार के उपसंचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास ने बताया कि जिले में गेहूं फसल की कटाई हॉर्वेस्टर से करने के बाद कुछ किसान भाई फसल अवशेष (नरवाई) में आग लगाकर खेत की सफाई करते हैं। नरवाई जलाने से वायु प्रदूषण के साथ-साथ मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीव केचुआ आदि मर जाते हैं और भूमि कठोर हो जाती है, जिससे खेत की तैयारी में अधिक ऊर्जा एवं समय लगता है । साथ ही मृदा का कार्बनिक पदार्थ भी नष्ट हो जाता है। जिससे खेत की उपजाऊ क्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जिससे दिनोंदिन उत्पादकता कम होती जा रही है। नरवाई जलाने से पशुओं का चारा (भूसा) भी जलकर नष्ट हो जाता है। जिससे नरवाई जलाना किसानों के लिए एक आत्मघाती कदम है।
सरकार का कहना है कि प्रत्येक ग्राम पंचायत में कृषि विभाग के अमले द्वारा नरवाई प्रबंधन की जानकारी कृषक संगोष्ठियों के माध्यम से दी जा रही है। मैदानी अमले द्वारा कृषकों को नरवाई न जलाने की सलाह दी जा रही है। विकासखंड स्तर पर कृषि, राजस्व तथा पंचायत विभाग के साथ समन्वय कर कृषकों से संवाद कर नरवाई जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में बताया जा रहा है। साथ साथ विगत सप्ताह से कृषि अभियांत्रिकी विभाग द्वारा नरवाई प्रबंधन हेतु जागरूकता रथ के माध्यम से विकास खण्ड स्तर पर नरवाई नही जलाने हेतु प्रचार प्रसार किया जा रहा है। जागरुकता रथ के माध्यम से कृषकों को स्ट्रॉरीपर (भूसामशीन) से भूसा बनाना, मल्चर मशीन और जिले मे उपयोग हो रहे जुगाड्डु यंत्र पाटा द्वारा फसल अवशेषों को बारिक काटकर खेत में मिलाकर जैविक खाद बनाना, रुपर सीडर से बिना नरवाई में आग लगाये सीधे तीसरी फसल मूंग की बुआई करना, स्ट्रॉरीपर के बाद रोटावेटर या गहरी जुताई करना आदि के बारें में कृषको को जानकारी दी जा रही है।किसानो द्वारा लगातार नरवाई जलाने की घटनाए परिलक्षित हो रही है, सेटेलाईट से प्राप्त डेटा अनुसार तहसीलवार एवं ग्रामवार प्रतिदिन नरवाई जलाने संबंधित आंकडे प्रदर्शित हो रहे है। नरवाई जलाने संबंधित घटनाओ को नियंत्रण हेतु कृषको के विरूद्ध राजस्व एवं कृषि विभाग के मैदानी अमले के अधिकारियो के माध्यम से पंचनामे तैयार किये जाकर नरवाई जलाने वाले कृषको के विरूद्ध अर्थ दण्ड की कार्यवाही की जा रही है। अनुभाग धार अन्तर्गत विकास खण्ड धार, तिरला, नालछा, सरदारपुर एवं बदनावर से लगभग 83 प्रकरण तैयार किये गये है। जिन पर तहसीलदार के माध्यम से नोटिस तैयार किये जा कर अर्थ दण्ड हेतु नोटिफिकेशन एवं कार्यवाही राजस्व विभाग द्वारा की जावेगी।

नरवाई के लिए हर किसान की समस्या अपनी अलग रहती है। किसान की समस्या जाने बिना नरवाई के लिये रोकना उचित नहीं होगा। न ही नरवाई अपनाने वाले किसानों को आर्थिक रूप से दंडित करना इसका समाधान है। इसके लिये यह आवश्यक है कि नरवाई के लिये बाध्य किसानों की समस्या का अध्ययन किया जाये और हर किसान की समस्या के आधार पर उसके निराकरण के उपाय अपनाये जाये। अवशेषों को भूमि में मिलाने के लिये नये यंत्रों तथा नई तकनीक का भी विकास हो। उन किसानों का जो भूसे का प्रबंधन बिना नरवाई के सफलतापूर्वक कर रहे हैं उनके द्वारा अपनाये जाने वाली विधि भी अन्य किसानों को प्रेरणा दे सकती है।
*रामस्वरूप मंत्री*
*(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और किसान संघर्ष समिति मालवा निमाड़ के संयोजक है)*





