शशिकांत गुप्ते
इनदिनों विपक्षी एकता प्रयास मेंढकों को तराजू पर तौलने वाली कहावत सिद्ध हो रहा है।
ममता में लोकतंत्र के प्रति ममत्व का आभाव दिखाई दे रहा है।
बात Grass root मतलब तृण मूल करना और सोच भी तृण इतना ही रखना। यह सोच अप्रत्यक्ष अहंकार को दर्शाता है।
माया पूर्ण रूप से माया में सराबोर होकर स्त्री महावत बनकर गज पर सवार होकर सिंहासन पर काबिज होने का सपना संजो रही है।
लगभग सारे क्षत्रप अपने दल के Suprimo मतलब मुखिया बनाकर स्वयं को सियासत का सूरमा समझने का भ्रम पाले हुए हैं।
कुछ क्षत्रपों की सियासी पहुंच मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक वाली कहावत चरितार्थ कर रही है। फिर भी भ्रमवश स्वयं को सियासत का तीस-मार-ख़ाँ समझते हैं।
विपक्ष एकता का प्रयास मतलब दूध के ग्लास में उंगली डालकर मक्खन चाटने का प्रयास करने जैसा है?
कारण दूध से सीधे मक्खन नहीं निकलता है। दूध का दही जमाना पड़ता है। दही को मथनी से मथना पड़ता है,तब कहीं मक्खन निकलता है।
विपक्ष यही गलती कर रहा है। बगैर वैचारिक मंथन कर और बगैर आपसी सामंजस्य स्थापित कर, सीधे एकता का प्रयास कर रहा है,ऐसा प्रयास असफल होने की ही संभावना होती है।
विपक्षी एकता के लिए प्रयास करने वालों को इस बात पर बहुत ही गंभीरता से विचार करना अनिवार्य है। जिस सियासी ताकत से मुकबला करना है,वह ताकत दूसरों की लकीर पौंछ कर स्वयं की लकीर बड़ी करने में निपुण है।
स्वयं की लकीर बड़ी करने में महारथ प्राप्त ताकत के पास वैचारिक सोच नदारद है।
यह सियासी ताकत अपनी छद्म उपलब्धियों का बखान करने के लिए विज्ञापनों पर बेतहाशा व्यय करने में सक्षम है।
यही ताकत साम-दाम-दंड और भेद इन चारों “अ” नीतियों इस्तेमाल बखूबी करतीं है।
सियासत में पनप रहें,क्षत्रपों में आंतरिक लोकतंत्र सबसे बड़ी कमजोरी है?
कुछ क्षत्रप अपने सूबे को छोड़ दूसरे सूबों में हम तो डूबेंगे सनम तुम्हे भी ले डूबेंगे वाली कहावत को चरितार्थ करने के प्रयास में रहते हैं। इन क्षत्रपों का यह प्रयास अप्रत्यक्ष किसको लाभ पहुंचा सकता है,यह अंडरस्टूड है।
कुछ सियासतदान जिधर बम उधर हम वाली कहावत को मूर्त देने के लिए शाम रंग की पेटियों तक सीमित न रहते हुए खोकों को प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। पेटी और खोका क्या होता है यह तो खग ही जाने खग की भाषा वाली कहावत को आमलीजामा पहनाने वाले अच्छे से जानते है।
विपक्ष जबतक देश की जनता की पीड़ा को समझकर,जनता की पीड़ा पर सिर्फ मरहम नहीं, पीड़ा का स्थाई इलाज करने के लिए प्रयास नहीं करेगा,तबतक विपक्ष जनता का समर्थन प्राप्त करने में असफल ही होगा।
सभी दलों को एक बात अपने जहन में गांठ बांधकर रखना चाहिए कि,लोकतंत्र में विपक्ष मतलब सिर्फ कोई सियासी दल नहीं होता,विपक्ष होती है देश की जनता।
ये पब्लिक है ये सब जानती है।
जनता के मौन को उदासीनता नहीं समझना चाहिए।
जनता के मौन का अर्थ निम्न पंक्तियों में समाहित है।
वक़्त गूँगा नहीं है बस मौन है
पर वक़्त आने पे बता देता है किसका कौन है…
शशिकांत गुप्ते इंदौर





