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बोले जावेद अख्तर- कुछ लोग नफरत पैदा करते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं…

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इंदौर

‘धर्म और सांप्रदायिकता दो अलग चीज है। सांप्रदायिकता धर्म के पीछे छुपती है। सांप्रदायिकता नफरत फैलाती है। अगर नफरत भी सेल्फलेस होती तो मैं उसकी भी इज्जत करता, लेकिन कुछ लोग पैदा करते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं’ ये कहना है मशहूर लेखक-शायर-गीतकार जावेद अख्तर। मंगलवार को वे इंदौर में दैनिक भास्कर उत्सव में शिरकत करने पहुंचे। उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रोता पहुंचे थे। यहां उन्होंने दर्शकों के सवालों का जवाब दिया, साथ ही अपने दिल की बात भी रखी। अख्तर ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

कुछ कुछ होता है फिल्म आई थी। जावेद साहब ने काम करने से मना कर दिया था। क्या फर्क है वक्त के साथ और उसूलों पर चलने में?
जावेद अख्तर 
– चलना है तो दोनों को बैलेंस करना पड़ेगा वरना आप चल ही नहीं पाएंगे। जिनके बहुत ज्यादा उसूल होते हैं वो बोरिंग होते हैं। उसूलों पर बात भी करना बुरा काम है वैसे। मैंने पहला गाना लिख दिया था। ‘कोई मिल गया…’ वो रिकॉर्ड बन गया। मैंने कहा मेरा नाम भी मत देना। कुछ-कुछ होता है मुझे टाइटल अच्छा नहीं लगा। क्या करूं हाय… ये गाना मैं नहीं लिख पाऊंगा। मैंने पिक्चर छोड़ दी। बाद में देखा तो करण ने अच्छी फिल्म बनाई थी।

करण के फादर के साथ दोस्ताना मैंने बनाई थी। अगली फिल्म के लिए करण फिर मेरे पास आया, ‘कभी अलविदा न कहना’ या ‘कल हो न हो’, मैंने कहा कि तुम्हारे दो मुझ पर उधार हैं। इस फिल्म में गाना ऐसा लिखूंगा कि याद रखा जाएगा। फिर मैंने ‘कुछ तो हुआ है, कुछ हो गया है…’ वो गाना मैंने लिखा और उधार चुकाया। उसूल को लेकर एक लाइन आपको ड्रॉ करना पड़ती है कि इसके पीछे नहीं। दूसरे की खुशी के लिए भी ऐसी बात माननी चाहिए जो आपकी खुशी की नहीं है। हर बार आप उसूल का झंडा लेकर खड़े हो जाएं वो बात ठीक नहीं है।

फरहान की फिल्म करते हैं तो फीस लेते हैं?
जावेद अख्तर 
– राइटर ही वो है जो दूसरे के दु:ख और दूसरे के सुख को समझ सके। फिल्म का गीत या डायलॉग किसी कैरेक्टर को रिप्रेजेंट करता है। उसके दर्द और खुशी को अपना दर्द नहीं बना सके तो आप राइटर नहीं। राइटर दिल ही दिल में एक्टर होता है। जितने लोगों को आप प्रस्तुत कर सकते हैं, उतने अच्छे राइटर हैं आप। हां फरहान के साथ काम करता हूं तो फीस लेता हूं। जोया से भी। डायरेक्टर और प्रोड्यूसर के साथ काम कर रहा हूं तो जरूर लेनी चाहिए। प्रोफेशनल एटीट्यूड अलग है, वो रखना चाहिए। बेटे का सोचूंगा तो लिख ही नहीं पाऊंगा।

सब लोग आज के दौर में बहुत कुछ करना चाहते हैं। कौन सा तरीका जिंदगी जीने का तरीका अच्छा है। एक काम करें या बहुत सारे?
जावेद अख्तर 
– मल्टी टास्किंग मर्दों में कम होती है। मेरे भाई ने मुझे पॉइंट आउट किया था। मान लीजिए इंदौर से भोपाल जा रहे हैं हम और गाड़ी पुरुष ड्राइव कर रहा है। अब चलते-चलते सड़क में दो हिस्से आ गए, लेकिन वहां बोर्ड नहीं लगा है कि किधर जाना है। तो ऐसे में पुरुष का पहला रिएक्शन ये होगा कि पहले म्यूजिक बंद करो। वो एक साथ म्यूजिक भी सुन ले और किधर जाना है ये भी तय कर ले, ये उसके बस की बात नहीं। हम सब वैसे मल्टी टास्किंग हैं। आप, माता-पिता, बहन से दूसरे तरह से मिलते हैं, दोस्तों से अलग, पति का पत्नी से पत्नी का पति से अलग रिश्ता है। रोल अलग-अलग हैं तो वही मल्टी टास्किंग है। कितने सारे काम करते हैं। सुबह से शाम तक आपने कितनी मल्टी टास्किंग की आप सोचेंगे तो हैरान हो जाएंगे।

जावेद अख्तर ने एंकर आतिका अहमद के सवालों का जवाब देते हुए कहा- जो आज है वो सब अच्छा नहीं है। कुछ अच्छा है वो सब अच्छा नहीं है। जो अच्छा आज है उसे ले लें और जो बुरा है उसे छोड़ दें। हर चीज नई आ रही है उसमें कुछ अच्छा है कुछ बुरा है।

जावेद अख्तर ने एंकर आतिका अहमद के सवालों का जवाब देते हुए कहा- जो आज है वो सब अच्छा नहीं है। कुछ अच्छा है वो सब अच्छा नहीं है। जो अच्छा आज है उसे ले लें और जो बुरा है उसे छोड़ दें। हर चीज नई आ रही है उसमें कुछ अच्छा है कुछ बुरा है।

किसी भी गाने के लिए सबसे ज्यादा क्या महत्वपूर्ण है?
जावेद अख्तर 
– आप सिंगर को भूल गईं, सिंगर बहुत महत्वपूर्ण है। लता, किशोर ने जो गाने गाए वो ही गा सकते थे। सिंगर का भी बहुत कंट्रीब्यूशन होता है। गाने में सिंगर का वही मुकाम है जो थिएटर में एक्टर का है। धुन एक गाने की जिस्म है। शब्द उस गाने का कैरेक्टर है। शब्द अगर अच्छे हैं तो वो धुन के बाद पहुंचेंगे लेकिन बरसों तक रहेंगे। अच्छी ट्यून पहले आकर्षित करती है, लेकिन बीस साल बाद भी गाना याद रहे उसके लिए शब्द बहुत अच्छे चाहिए। सिंगर का गाने में और एक्टर का फिल्म में वो मुकाम है जो एक फुटबॉल मैच में सेंटर फॉरवर्ड का होता है।

सबसे ज्यादा कौन से सिंगर ने आपके लिखे हुए गीत गाए हैं।
जावेद अख्तर – किशोर दा, लताजी, आशाजी, अल्ताफ, कुमार शानू, सोनू, अमिताभ सभी ने गाए हैं।

कहते हैं कि बड़ों की बात माननी चाहिए। उसे चैलेंज करना चाहिए या नहीं?
जावेद अख्तर 
– देखिए ये तो मैं नहीं मानता कि मेरी जिंदगी मिसाल है। आपने देखा होगा कि बच्चे क्या करते हैं, पतली सी डोरी में छोटा सा कंकर बांध लेते हैं और घुमाते हैं। ऐसी होनी चाहिए जिंदगी। डोरी ट्रेडिशन है। पत्थर जिंदगी है। पहले रेलवे ट्रेन शॉकिंग लगती थी। बुजुर्ग कहते थे कि ये तो बहुत खतरनाक चीज है। अगर सब बात बड़ों की मान ली जाए तो कोई नई चीज नहीं आएगी। अगर हर बात बड़ों की छोड़ दी तो कोई पेड़ कितनी ही बड़ा हो वो बिना जड़ के नहीं रह सकता। जो आज है वो सब अच्छा नहीं है। कुछ अच्छा है वो सब अच्छा नहीं है। जो अच्छा आज है उसे ले लें और बुरा है उसे छोड़ दें। हर चीज नई आ रही है उसमें कुछ अच्छा है कुछ बुरा है।

न्यू एज वर्ल्ड में आदमी और औरत की रिलेशनशिप को लेकर क्या कहना चाहेंगे?
जावेद अख्तर 
– सच बात ये है कि दुनिया में कुछ बहुत खराब औरतें भी होंगी और बहुत अच्छे मर्द भी होंगे। अगर हम देखें तो एक एवरेज मेन से वुमन बेहतर है। कई हजार सालों से औरतों के साथ नाइंसाफी की गई है। पहले से बहुत बेहतर हाल हैं लेकिन अभी मिलों आगे जाना है। मैथ्स और साइंस उनके बस की बात नहीं है कहते थे, लेकिन बैंकिंग में औरतें भारी पड़ी हैं। अभी की वित्त मंत्री महिला है। सीईओ और चेयरपर्सन कंपनियों में औरतें हैं।

कई मुल्कों में औरतें पीएम या प्रेसीडेंट हैं। चलिए मैथ्स आपको आता होगा लेकिन औरतों को रंगों का तो सेंस है। औरतों को गीतों का तो सेंस है। लोकगीत ज्यादातर दुनिया में औरतों ने ही बनाए हैं। दुनिया में कोई बड़ा पेंटर औरत क्यों नहीं हुई। सारे मर्द? दुनिया में बहुत बड़ी म्यूजिशियन औरत क्यों नहीं हुई? क्या उनमें पेंटिंग, म्यूजिक का टेलेंट नहीं था। उन्हें बनाने नहीं दिया। पहले औरत मर्द के नाम से लिखती थीं, राइटर के रूप में। अपने नाम से नहीं लिख सकती थीं। फिर वो राज खुल गया।

औरत घर की इज्जत होती है। मर्द क्यों नहीं होता? औरत ही ये बोझा लेकर क्यों घूम रही है? लड़कियां अब बाप और पति का लगाती हैं। पहले एक का लगता था अब दो का लगता है। भाई होना महत्वपूर्ण है, बहन होना नहीं। सेक्स क्राइम बहुत बढ़ गए हैं। ये क्यों हो रहा है, को-एजुकेशन और फिल्में बिगाड़ रही हैं। जहां ज्यादा थिएटर हैं वहां क्राइम ज्यादा होना चाहिए। अब देखिए साउथ में थिएटर ज्यादा हैं, तो वहां क्राइम ज्यादा होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है। ये वजह नहीं है। को-एजुकेशन वजह है ये भी गलत है।

हिंदुस्तान में करोड़ों ऐसे लड़के होंगे। जिन्होंने किसी जवान लड़की से 5 मिनट बात की होगी। मां और बहन के अलावा। यूपी के मेरठ में लड़का-लड़की साथ बैठते हैं तो पीटे जाते हैं। कर्नाटक में चाय पी रहे थे तो पीटा। हम अपनी बेटियों को बड़ा संभलकर पालते हैं। दूसरे को देते हैं तो शिकायत करते हैं कि जला दिया या पीट दिया। बिना हड्‌डी का चिकन दिया आपने। मैं जब ऐसी खबर पढ़ता हूं तो मां-बाप को ब्लेम करता हूं। तलाक बहुत बुरी चीज है लेकिन उससे बुरी चीज है बुरी शादी।

फिल्मों में रेजिस्टेंस है?
जावेद अख्तर 
– दीवार में परवीन बॉबी का रोल कॉल गर्ल का था। मैंने ये समझाया कि ये कोई हीरोइन तो है नहीं। अगर ये ऐसी रहती भी है तो क्या परेशानी। फिल्मों में प्रेग्नेंसी मौसम के कारण होती थी। बारिश बहुत हो जाती थी तो ऐसा कुछ हो जाता था। त्रिशूल में रेग्युलर लिव-इन रिलेशनशिप के सीन थे।

लवली वुमन की कोई परिभाषा। 5-6 क्वालिटी?
जावेद अख्तर 
– शबाना आजमी। औरत भी इंसान है। कोई भी इंसान अच्छा कैसे हो सकता है। उसमें टैलेंट है। ह्यूमर है। सबका ख्याल रखती है। अच्छा काम करती है। वो अच्छी इंसान है। अलग से क्या खूबी चाहिए आपको। औरतों में ज्यादा खूबी से मर्द डर जाते हैं। इंटेलिजेंट औरतें बर्दाश्त नहीं हैं। औरत इंटेलिजेंट होती है तो वो छुपाती है कि मैं इतनी इंटेलिजेंट हूं।

पीछे आप देखते हैं तो क्या लगता आप अलग इंसान थे?
जावेद अख्तर 
– ऑनली फूल पीपल डॉन्ट चेंज (सिर्फ मूर्ख व्यक्ति नहीं बदलता)। वक्त के साथ बदलना चाहिए। झूठ बोलना है तो दूसरों से बोलिए, अपनों से नहीं। अपनों से कहिए कि मैंने गलत किया। मैंने किसी का दिल दु:खाया या तोड़ा। धीरे-धीरे जैसे हर चीज आप ठीक करते हैं। वैसे अपनी पर्सनालिटी भी है। उसे देखते रहिए और बेहतर बनाने की कोशिश कीजिए। ये भी मैं नहीं कहूंगा कि आप संत हो जाइए। लेकिन आपकी लड़ाई सच्चाई के लिए होनी चाहिए। सोने में मिलावट होती है तब जेवर बन पाता है।

कभी आपको अफसोस हुआ कि सलीम और जावेद अलग क्यों हो गए? या ये होना ही था?
जावेद अख्तर 
– जिंदगी चलती रहती है, उसमें अलग-अलग दौर आते हैं, चले जाते हैं। अच्छे दौर से आप याद कीजिए और आगे बढ़िए। आप स्वीकार करें कि वो दौर पूरा हो गया और आगे बढ़ें। जो भी रिलेशनशिप है वो पूरी हो गई तो हो गई। जो अच्छी बाते हैं उन्हें याद रखकर जिंदगी को सजाओ।

1-2-3 गाने से जुड़ा किस्सा क्या था?
जावेद अख्तर 
– 1-2-3 गाने का किस्सा ये था कि माधुरी तब स्टार नहीं बनी थी। नौटंकी टाइप का गाना चाहिए था, लेकिन बात बन नहीं रही थी। गणेशजी का जुलूस निकल रहा था। फिर लक्ष्मीकांतजी ने हारमोनियम पर गाया डमी वर्ड में सुनाया। मैंने कहा कि 13 तक ये ही रखेंगे। मैंने कहा कि इसके आगे जो मैं गाना लिखूंगा तो आपको एतराज नहीं होगा। ये गाना सुपर-डुपर हिट गाना रहा। अब मैं कहीं भी जाऊं तो लोग कहे वो सुनाइए।

भाषागत शुद्धता?
जावेद अख्तर 
– भाषा प्योर होनी चाहिए। ये वैसा ही है जैसे प्याज के छिलके उतारना शुरू करें और कहे कि प्याज ढूंढना है। हार्वर्ड डिक्शनरी में शब्द जोड़े जाते हैं और हमारे यहां कम किए जाते हैं। जुबान वर्ड (शब्द) को अपनाने से बनती है। निकालने से नहीं बनती है।

कार्यक्रम का शुभारंभ जावेद अख्तर, दैनिक भास्कर समूह के एमडी सुधीर अग्रवाल सहित मंच पर मौजूद अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर किया। इसके बाद जावेद अख्तर ने सवालों के बेबाकी से जवाब दिए।

कार्यक्रम का शुभारंभ जावेद अख्तर, दैनिक भास्कर समूह के एमडी सुधीर अग्रवाल सहित मंच पर मौजूद अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर किया। इसके बाद जावेद अख्तर ने सवालों के बेबाकी से जवाब दिए।

लोगों के सवाल-

आपने कहा कि परिवर्तन को अपनाना चाहिए। हम कहते हैं कि बड़ों से सीखें, क्यों हम बच्चों से नहीं सीखना चाहते?

जावेद अख्तर – आपकी बात सही है। 20-22-24 साल के बच्चे हैं, ये दुनिया उन्हीं की है। हमारी है ही नहीं। दुनिया बदल गई है। हम तो रह रहे हैं। लेकिन बहुत सारी बातें हम जानते हैं जो उन्हें नहीं पता। इसलिए आपसी तालमेल से रहना जरूरी है। यंग पीपल को दुनिया का बहुत पता है। ये लेन-देन इगो को हटाकर हो तो बहुत अच्छा।

आपकी खुशमिजाजी का राज क्या है?

जावेद अख्तर – जिंदगी से प्यार कीजिए। दिलचस्पी रखिए।

आप कितना पढ़ते हैं अब?

जावेद अख्तर – मैं झूठ नहीं बोलूंगा। कुछ बरसों पहले पढ़ता था उससे आधे से भी कम अब पढ़ता हूं। जोया और फरहान दोनों पढ़ते हैं। वो मुझ से ऐसी किताब का जिक्र करते हैं, जो मैंने पढ़ी ही नहीं। पहले मैं बहुत पढ़ता था। जो अच्छा लगे वो पढ़ो। एक ही चीज मत पढ़ो, सारी चीज पढ़ो। हैवी के साथ लाइट लिटरेचर भी पढ़ें। उससे आप यंग बने रहेंगे।

धर्म और साम्प्रदायिकता को कैसे देखते हैं?

जावेद अख्तर – मैं नास्तिक हूं। मेरा सुपर पॉवर में कोई विश्वास नहीं। मैं धर्म के खिलाफ नहीं हूं। धर्म और साम्प्रदायिकता दो अलग चीज है। साम्प्रदायिकता धर्म के पीछे छुपती है। वो नफरत फैलाती है। अगर नफरत भी सेल्फलेस होती तो मैं उसकी भी इज्जत करता, लेकिन कुछ लोग पैदा करते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं। कमाल की बात ये है कि इस मुल्क का बंटवारा करने वाला भी धार्मिक नहीं था, साम्प्रदायिक था। वो शराब भी पीता था और सूअर भी खाता था। अगर इंडिया डिवाइड नहीं होता तो करेंसी नोट पर जिन्ना की तस्वीर नहीं आती। हमें धर्म और साम्प्रदायिकता को अलग-अलग देखना चाहिए। जो मान रहा है मैं उसे गलत मानता हूं लेकिन उससे समाज को कष्ट नहीं होता है। समाज को कष्ट तब होता है तब वो अपने पॉलिटिकल मिशन के लिए यूज करें।

अभी दौर ओटीटी का दौर चल रहा है।

जावेद अख्तर – ओटीटी आपके यहां तो आज आया है, अमेरिका में पहले से है। थिएटर में पिक्चर देखने का मजा ही कुछ और है।

जावेद अख्तर को सुनने के लिए बड़ी संख्या में इंदौरी श्रोता अभय प्रशाल पहुंचे थे।

जावेद अख्तर को सुनने के लिए बड़ी संख्या में इंदौरी श्रोता अभय प्रशाल पहुंचे थे।

दस दिवसीय भास्कर उत्सव में कब क्या आयोजन, यहां पढ़िए पूरी लिस्ट

27 अप्रैल को म्यूजिकल नाइट : गुरुवार को म्यूजिकल नाइट में शंकर महादेवन और उनके बेटे सिद्धार्थ व शिवम के साथ इंदौर झूमेगा। ये आयोजन रात 8 बजे गुजराती स्कूल ग्राउंड, स्कीम नंबर 54 एबी रोड पर आयोजित होगा।

29 अप्रैल को कवि सम्मेलन : शनिवार को कवि सम्मेलन का आयोजन होगा। इसमें हास्य-व्यंग्य, गीत-गजल के साथ रोमांचित कर देने वाली कविताओं का आनंद पाठक उठाएंगे। इसमें कवि शैलेष लोढ़ा, विष्णु सक्सेना, मुमताज नसीम, हाशिम फिरोजाबादी, सुदीप भोला, जगदीश सोलंकी, संजय झाला, गजेंद्र प्रियांशु मौजूद रहेंगे।

30 अप्रैल को मोटिवेशनल टॉक शो : कथावाचक व मोटिवेशनल स्पीकर जया किशोरी का मोटिवेशनल टॉक शो होगा। ये प्रोग्राम रविवार शाम 5 बजे बास्केटबॉल कॉम्प्लेक्स, रेसकोर्स रोड पर होगा।

1 मई को साइंस को चुनौती देते नए दौर के संत : सोमवार को साइंस को चुनौती देते नए दौर के संत बागेश्वर धाम के संत धीरेंद्र शास्त्री से श्वेता सिंह का संवाद होगा। ये प्रोग्राम गुजराती स्कूल ग्राउंड, स्कीम नंबर 54, एबी रोड पर शाम 7 बजे होगा।

Ramswaroop Mantri

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