अग्नि आलोक
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सिर्फ जाति पूछो नेता की,पूछो ना धर्म,ईमान…!

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शशिकांत गुप्ते इंदौर

पर्दा उठ रहा है।*
सिर्फ जाति पूछो नेता की,पूछो ना धर्म,ईमान।मंशा हो दलबदल की,उससे पूछो नहीं ज्ञान।।

मुकुल का शाब्दिक अर्थ होता है बौर मतलब कली।कली खिलकर फूल बनती है।फूल में प्राकृतिक रूप से जनन संरचना होती है।फूल से बीज बनता है।
मुकुल का शब्द अर्थ कली।कली चार साल तक अच्छे दिनों को खोजने के लिए कीचड़ में उतर गई थी चार साल के बाद उसे इस कहावत का स्मरण हुआ चार “दिनों की चांदनी फिर वो ही अंधेरी रात।” इससे तो मैं भला अपना घर भला।
जितिन का शब्दिक अर्थ होता है।सुंदर और शरीर के नियम।शरीर से सुंदर होना महत्वपूर्ण नहीं है, शरीर के शिर्षस्थ भाग में समझदानी होना जरूरी है।सिर्फ समझदानी होने से काम नहीं चलता समझदानी छोटी या संकीर्ण नहीं होनी चाहिए।
वो दिन कब आएगा जब देश में  चुनाव के मैदान में भारतीय मानव चुनाव का उम्मीदवार  होगा?अखंड भारत की अवधारणा को मूर्त देने की वकालत करने वाले लोगों में विप्रवर्ण का वर्चस्व कायम है।वर्ण व्यवस्था को कर्म के आधार पर न देखतें हुए सिर्फ निहित स्वार्थ की दृष्टि से देखा जाता हैब्रह्म जानाति ब्राह्मण: अर्थात् ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है “ईश्वर का ज्ञाता”।इस परिभाषा में संत कबीर साहब,संत रविदास,संत गुरुनानक,नामदेव,सावता माली,गोरा कुम्भार और अनेक सूफ़ी संत भी आतें हैं।
आज भ्रम को फैलाने का कर्म किया जा रहा है। भ्रम (illusion) के शिकार लोग  विज्ञापनों को यथार्थ समझने की भूल कर रहें हैं।उपलब्धियां सिर्फ विज्ञापनों में दर्शायी जा रही है।यथार्थ में उज्जवलाओ के साथ ‘कु’ कर्म होने पर अति धार्मिक लोग उनके शवों को मध्यरात्रि में अग्नि को समर्पित कर देतें हैं।उज्ज्वलाओ के परिजन राम नाम सत्य भी नहीं उच्चार पाते हैं।व्यवहार में तो आस्थावान लोग।दुसरें लोगों को प्रताड़ित कर राम नाम बुलवाकर श्रवनभक्ति को लाभ उठातें हैं।नव विधा भक्ति में श्रवण भक्ति का महत्व है।
तुलसीबाबा लिखतें हैं।
*सादर सुनई ते तरह भवसिंधु बिना जल यान*आदर से राम नाम सुनने के लिए किसी का अनादर करना अति धार्मिक लोगों के लिए जायज ही कहलाएगा?विज्ञापनों में दर्शायी जाने वाली उपलब्धि को यथार्थ मानने वालों को समझना चाहिए कि, उपलब्धि  तब पूरी होती है।जब उसका उपभोग संतोषजनक हो।
मसलन किसी युवा के पास इंजीनियरिंग की पढ़ाई का प्रमाण पत्र तो है लेकिन उसके पास रोजगार नहीं है।कुछ नसीब वाले होतें हैं।इन लोगों के पास उपलब्धि के नाम पर शैक्षणिक योग्यता का प्रमाणपत्र  ही संदेहास्पद होता है।फिर भी यह लोग सिर्फ प्रलोभनों (जुमलों)  का प्रचार प्रसार सत्तासीन होतें हैं।
समाचार माध्यमों को उत्तरप्रदेश का दलबदलू ब्राह्मण दिखाई देता है।पश्चिम बंगाल का राय नहीं दिखाई देता है।जिसने घर वापसी की है।
समाचार माध्यम तोड़ फोड़ की राजनीति को महिमामण्डित करतें हैं। राजनीतिविज्ञान का महत्व नहीं समझतें हैं।विज्ञान सम्मत हरएक विषय में विश्लेषणात्मक और प्रयोगात्मक अभ्यास जरूरी होता है।विज्ञान अंधश्रद्धा को दूर करता है।
भ्रम अंधश्रद्धा को फैलाता है 
अंधश्रद्धा के शिकार ही अंधभक्त बनतें हैं।इनलोगों को भ्रम का चश्मा पहना दिया जाता है।इनलोगों को यथार्थ दिखाई नहीं देता है।इसीलिए इनलोगों महंगाई, बेरोजगारी,धराशाही होती अर्थ व्यवस्था,दिखाई नहीं देती है।समाचार माध्यम इनलोगों का भ्रम बनाए रखतें हैं।कुछ समाचार माध्यम तो सत्ता की गौदी में ही बैठे हैं।ये भ्रमित लोग फेंक न्यूज़ को भ्रमवश सही समझ लेतें हैं।सात वर्षों से तो सत्ता से प्रश्न पूछना भी राष्ट्र के विपरीत आचरण की परिभाषा में आने लगा है।
विपक्ष की सरकार को गिराना या उसमें अवरोध पैदा करना यह राजनीति नहीं है।यह अधिनायकवादी मानसिकता का द्योतक है।इनदिनों राजनीति व्यवस्था में ही रही लापरवाही को छिपाने के लिए नित नए प्रयोग हो रहा हैं।
विधायिका के कार्यो पर न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।यही तो सत्तापक्ष की असफ़लताओं का प्रतीक है।न्यापालिका द्वारा करोडों का रुपयों के खर्च का हिसाब मांगना भी तो सत्ता पक्ष की कमजोरी को उजागर करता है।वैक्सीन के टिकाकरण को लेकर मांग और आपूर्ति में जो अंतर है, वह व्यवस्था की लापरवाही को प्रत्यक्ष दर्शाता है।महामारी के दौरान ऐसे अंसख्य उदाहरण देखने सुनने को मिले है।
उपयुक्त सभी ज्वलंत और मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए बहुत से राज्यों में सरकारों के आपसी अंतर्द्वंद में समाचार माध्यम रुचि ले रहें हैं।
यह सारे मुद्दे Party with different और Good Governace स्लोगन को उजागर कर रहें हैं।

पर्दा उठ रहा है।*
सिर्फ जाति पूछो नेता की,पूछो ना धर्म,ईमान।मंशा हो दलबदल की,उससे पूछो नहीं ज्ञान।।
मुकुल का शाब्दिक अर्थ होता है बौर मतलब कली।कली खिलकर फूल बनती है।फूल में प्राकृतिक रूप से जनन संरचना होती है।फूल से बीज बनता है।
मुकुल का शब्द अर्थ कली।कली चार साल तक अच्छे दिनों को खोजने के लिए कीचड़ में उतर गई थी चार साल के बाद उसे इस कहावत का स्मरण हुआ चार “दिनों की चांदनी फिर वो ही अंधेरी रात।” इससे तो मैं भला अपना घर भला।
जितिन का शब्दिक अर्थ होता है।सुंदर और शरीर के नियम।शरीर से सुंदर होना महत्वपूर्ण नहीं है, शरीर के शिर्षस्थ भाग में समझदानी होना जरूरी है।सिर्फ समझदानी होने से काम नहीं चलता समझदानी छोटी या संकीर्ण नहीं होनी चाहिए।
वो दिन कब आएगा जब देश में  चुनाव के मैदान में भारतीय मानव चुनाव का उम्मीदवार  होगा?अखंड भारत की अवधारणा को मूर्त देने की वकालत करने वाले लोगों में विप्रवर्ण का वर्चस्व कायम है।वर्ण व्यवस्था को कर्म के आधार पर न देखतें हुए सिर्फ निहित स्वार्थ की दृष्टि से देखा जाता हैब्रह्म जानाति ब्राह्मण: अर्थात् ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म (अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है “ईश्वर का ज्ञाता”।इस परिभाषा में संत कबीर साहब,संत रविदास,संत गुरुनानक,नामदेव,सावता माली,गोरा कुम्भार और अनेक सूफ़ी संत भी आतें हैं।
आज भ्रम को फैलाने का कर्म किया जा रहा है। भ्रम (illusion) के शिकार लोग  विज्ञापनों को यथार्थ समझने की भूल कर रहें हैं।उपलब्धियां सिर्फ विज्ञापनों में दर्शायी जा रही है।यथार्थ में उज्जवलाओ के साथ ‘कु’ कर्म होने पर अति धार्मिक लोग उनके शवों को मध्यरात्रि में अग्नि को समर्पित कर देतें हैं।उज्ज्वलाओ के परिजन राम नाम सत्य भी नहीं उच्चार पाते हैं।व्यवहार में तो आस्थावान लोग।दुसरें लोगों को प्रताड़ित कर राम नाम बुलवाकर श्रवनभक्ति को लाभ उठातें हैं।नव विधा भक्ति में श्रवण भक्ति का महत्व है।
तुलसीबाबा लिखतें हैं।
*सादर सुनई ते तरह भवसिंधु बिना जल यान*आदर से राम नाम सुनने के लिए किसी का अनादर करना अति धार्मिक लोगों के लिए जायज ही कहलाएगा?विज्ञापनों में दर्शायी जाने वाली उपलब्धि को यथार्थ मानने वालों को समझना चाहिए कि, उपलब्धि  तब पूरी होती है।जब उसका उपभोग संतोषजनक हो।
मसलन किसी युवा के पास इंजीनियरिंग की पढ़ाई का प्रमाण पत्र तो है लेकिन उसके पास रोजगार नहीं है।कुछ नसीब वाले होतें हैं।इन लोगों के पास उपलब्धि के नाम पर शैक्षणिक योग्यता का प्रमाणपत्र  ही संदेहास्पद होता है।फिर भी यह लोग सिर्फ प्रलोभनों (जुमलों)  का प्रचार प्रसार सत्तासीन होतें हैं।
समाचार माध्यमों को उत्तरप्रदेश का दलबदलू ब्राह्मण दिखाई देता है।पश्चिम बंगाल का राय नहीं दिखाई देता है।जिसने घर वापसी की है।
समाचार माध्यम तोड़ फोड़ की राजनीति को महिमामण्डित करतें हैं। राजनीतिविज्ञान का महत्व नहीं समझतें हैं।विज्ञान सम्मत हरएक विषय में विश्लेषणात्मक और प्रयोगात्मक अभ्यास जरूरी होता है।विज्ञान अंधश्रद्धा को दूर करता है।
भ्रम अंधश्रद्धा को फैलाता है 
अंधश्रद्धा के शिकार ही अंधभक्त बनतें हैं।इनलोगों को भ्रम का चश्मा पहना दिया जाता है।इनलोगों को यथार्थ दिखाई नहीं देता है।इसीलिए इनलोगों महंगाई, बेरोजगारी,धराशाही होती अर्थ व्यवस्था,दिखाई नहीं देती है।समाचार माध्यम इनलोगों का भ्रम बनाए रखतें हैं।कुछ समाचार माध्यम तो सत्ता की गौदी में ही बैठे हैं।ये भ्रमित लोग फेंक न्यूज़ को भ्रमवश सही समझ लेतें हैं।सात वर्षों से तो सत्ता से प्रश्न पूछना भी राष्ट्र के विपरीत आचरण की परिभाषा में आने लगा है।
विपक्ष की सरकार को गिराना या उसमें अवरोध पैदा करना यह राजनीति नहीं है।यह अधिनायकवादी मानसिकता का द्योतक है।इनदिनों राजनीति व्यवस्था में ही रही लापरवाही को छिपाने के लिए नित नए प्रयोग हो रहा हैं।
विधायिका के कार्यो पर न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है।यही तो सत्तापक्ष की असफ़लताओं का प्रतीक है।न्यापालिका द्वारा करोडों का रुपयों के खर्च का हिसाब मांगना भी तो सत्ता पक्ष की कमजोरी को उजागर करता है।वैक्सीन के टिकाकरण को लेकर मांग और आपूर्ति में जो अंतर है, वह व्यवस्था की लापरवाही को प्रत्यक्ष दर्शाता है।महामारी के दौरान ऐसे अंसख्य उदाहरण देखने सुनने को मिले है।
उपयुक्त सभी ज्वलंत और मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाने के लिए बहुत से राज्यों में सरकारों के आपसी अंतर्द्वंद में समाचार माध्यम रुचि ले रहें हैं।
यह सारे मुद्दे Party with different और Good Governace स्लोगन को उजागर कर रहें हैं।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

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