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*….जरा याद करो लद्दाखियों की कुर्बानी….देशप्रेमियों को गद्दार ठहराने का अपराध मत कीजिए*

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यदि किसी एक अवाम की बात की जाए, तथ्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि सबसे देशप्रेमी अवाम तो लद्दाखी अवाम है। चूंकि वे सीमावर्ती क्षेत्र में रहते हैं, वे तिब्बती मूल के हैं, बहुलांश आबादी जनजाति है, 80 प्रतिशत लोग बौद्ध या शिया मुस्लिम हैं। इस सबके चलते वह हमारे नहीं हैं, उनके देशप्रेम पर संदेह किया जा सकता है या उन्हें या उनके सबसे सर्वमान्य नायक को ( सोनम वांगचुक) देशद्रोही ठहराया जाए, ये किसी भी तथ्य या तर्क के आधार पर जायज नहीं है, न्यायसंगत नहीं है, उचित नहीं है।भारत की सीमाओं की रक्षा करने वाले अब तक 600 से अधिक लद्दाखियों को वीर सैनिकों को मिलने वाला गैलेंट्री अवार्ड मिला है। इतनी बड़ी संख्या में किसी क्षेत्र के लोगों को यह अवार्ड नहीं मिला है। गैलेंट्री अवार्ड वीरता के लिए मिलने वाला पुरस्कार है। इसमें महावीर चक्र, परम वीर चक्र, अशोक चक्र, कीर्ति चक्र, सूर्य चक्र आदि शामिल हैं।

डॉ. सिद्धार्थ 

जब घायल हुआ हिमालय

खतरे में पड़ी आज़ादी

जब तक थी सांस लड़े वो [लद्दाखी]

फिर अपनी लाश बिछा दी

संगीन पे धर कर माथा 

सो गये अमर बलिदानी

तुम भूल न जाओ उनको [लद्दाखियों को]

इसलिए कह रहा हूं

लद्दाखी वीरों की कहानी 

हम सब पढ़ते-सुनते आए हैं, वे कविताएं-गीत गाते आए हैं कि भारत की सीमाओं का सबसे बड़ा रक्षक हिमालय है। क्या कोई पहाड़ सिर्फ अपने आप किसी देश का रक्षक हो सकता है, इसका जवाब हां और ना के बीच है। भौगोलिक ऊंचाई, बर्फ से लदे पहाड़ों, बर्फीली नदियों, झीलों और दुर्गम रास्तों के चलते किसी विदेशी सेना और सैन्य शक्ति के लिए हिमालय को पार करना कठिन तो रहा है, लेकिन नामुमकिन कभी नहीं रहा है। 

आज के आधुनिक युग में तो यह बिलकुल भी बहुत कठिन नहीं रहा गया है। फिर हिमालय हमारे देश की सीमाओं का सबसे बड़ा रक्षक है, क्योंकि इन सीमाओं के रहने वाले लोग भारतीय सैनिक के रूप में और भारतीय सैनिकों के सहायक-सहयोगी के रूप में हिमालय को पार करने की कोशिश करने वाले देशों चाहे वे चीन और पाकिस्तान हों, उनके हमलों, घुसपैठ की कोशिशों को अपनी वीरता और शहादत से रोकते रहे हैं, रक्षा करते रहे हैं। हालांकि उनका यह इतिहास हजारों वर्षों का है, लेकिन फिलहाल आजादी के बाद के इतिहास को देखते हैं। 

अगर किसी एक कौम ने भारत की सीमाओं की आज के पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान से, इस हिमालयी क्षेत्र की सबसे अधिक रक्षा की है, तो वे लद्दाखी सैनिक और वहां के नागरिक हैं। यह सिलसिला 1947-48 में पाकिस्तान की जम्मू-कश्मीर ( जिसमें लद्दाख भी शामिल था) पर कब्जा करने की कोशिश, 1962 में चीन से युद्ध, 1965 में पाकिस्तान से युद्ध, 1971 में फिर पाकिस्तान से युद्ध, चीन घुसपैठ की समय-समय पर होने वाली अन्य कोशिशों, कारगिल युद्ध (1999) और हाल में चीन से भारतीय सीमा में प्रवेश की कोशिशों तक चलता रहा है। यह क्षेत्र 5900 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।

लद्दाखी सैनिकों, उनकी सैन्य रेजीमेंट लद्दाखी स्काउट और अन्य लद्दाखी सैनिकों के बिना भारत की हिमालयी क्षेत्र की चीन से जुड़ी 4 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक सीमा और पाकिस्तान से भारत की जुड़ी सैकड़ों किलोमीटर की सीमा की रक्षा करना असंभव नहीं तो, बहुत मुश्किल होता और होगा।

इसका एक उदाहरण कारगिल में पाकिस्तान की घुसपैठ, भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा और भारत-पाकिस्तान के बीच के कारगिल युद्ध का दे रहा हूं। जब कारगिल की ऊंची पहाड़ियों पर पाकिस्तानी सैनिकों ने कब्जा कर लिया, तो भारतीय सेना को इसकी भनक तक नहीं लगी। भारत और भारतीय सेना को इसकी सूचना लद्दाखी भेड़ चरवाहे ताशी नामग्याल ने दी। ताशी नामग्याल जब अपनी भेड़ों को खोजते हुए उस पहाड़ी पर पहुंचे तो पाकिस्तानी सैनिकों को वहां कब्जा जमाए देखकर भौचक रह गए। वे भागते हुए भारतीय सेना के वंजू सैन्य मुख्यालय पहुंचे और सैन्य अफसरों को इसकी सूचना दी। 

5 मई, 1999 को कैप्टन सौरभ कालिया अपने पांच सैन्य साथियों के साथ इसकी जानकारी लेने जब कारगिल की चोटियों पर गए, तो उन्हें पाकिस्तानी सैनिकों ने मार डाला। उसके बाद युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध जितने ऊंचे बर्फ से ढंके पहाड़ों पर हो रहा था और जो कठिन हालात थे। उन हालात में बिना लद्दाखी सैनिकों और नागरिकों के पाकिस्तान को हराना और पीछे हटने के लिए मजबूर करना नामुमकिन सा था। लद्दाखी अवाम इतनी ऊंचाई (जहां आक्सीजन बहुत कम होता है) और पहाड़ों, दुर्गम रास्तों और घाटियों में जीने के अभ्यस्त होते हैं। उन्हें इस इलाके की रत्ती-रत्ती चीजों का पता होता है। 

इसी कारगिल युद्ध में वे जांबाज पिता-पुत्र भी एक साथ पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ युद्ध में शामिल हुए थे, जिसमें एक की हत्या 24 सितंबर, 2025 को लेह में प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों ने कर दी थी। जिनका नाम त्सेवांग थारचिन था। उनके पिता का नाम स्टैनज़िन नामग्याल ( Stanzin Namgyal) है, जिनका मार्मिक वीडियो आप सब ने देखा होगा। पिता-पुत्र ये दोनों पूर्व सैनिक कारगिल युद्ध में एक साथ पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ लड़े थे।

थारचिन कारगिल युद्ध के एक अनुभवी सैनिक रहे हैं। जिन्होंने 1996 से लेकर 2017 तक भारत के एक सैनिक के रूप में लद्दाख स्काउट्स के हवलदार के रूप में अपने देश की सैन्य सेवा की थी। सेवा निवृति के बाद वे लेह में एक कपड़े की दुकान चला रहे थे। उनके चार बच्चे हैं। दो बेटी और एक बेटा। सबसे बड़ा बच्चा 16 साल का है। जो सैनिक स्कूल में पढ़ता है और भारतीय सेना में शामिल होने का स्वप्न देख रहा है और उसकी तैयारी कर रहा है।

मारे गए पूर्व सैनिक थारचिन के पिता ने अपनी और लद्दाखियों के देश प्रेम को रेखांकित करते हुए कहा कि, “कारगिल युद्ध के दौरान मैं और मेरा बेटा साथ-साथ लड़े थे। मैं तीसरी इन्फैंट्री डिवीजन में था, जबकि थारचिन लद्दाख स्काउट्स में था। थारचिन ने चार बार सियाचिन में सेवा की है। मुझे अपनी सेवाओं के लिए सेना प्रमुख से प्रशंसा पत्र मिला है। सेना में शामिल होना हमारे खून में है। थारचिन के बच्चे भी आर्मी स्कूल में पढ़ रहे हैं और वह चाहते थे कि वे सेना में शामिल हों। क्या सरकार अपने देशभक्तों के साथ ऐसा ही व्यवहार करती है?” देश प्रेम लद्दाखियों से खून में है। शहादत और वीरता का उनका इतिहास है। 

1999 में कारगिल ऑपरेशन विजय के बाद लद्दाखी रेजिमेंट को एक महावीर चक्र और पांच वीर चक्र सहित 84 वीरता पुरस्कार मिले, लेकिन इस युद्ध में 30 लद्दाखी जवान शहीद हो गए। कुल 527 शहीदों में 30 अकेले लद्दाख के थे। 

ये मेरे वतन के लोगों आप इस तरह न सोचें की सिर्फ 3 लाख की आबादी वाले लोग 1 अरब 40 करोड़ की आबादी भारत के लिए कुछ खास मायने नहीं रखते हैं। एक बार आप तथ्यों की रोशनी में देखिए मेरे अपने इस प्यारे वतन की सीमाओं की रक्षा में लद्दाखियों की कितनी बड़ी भूमिका है-

भारत की सीमाओं की रक्षा करने वाले अब तक 600 से अधिक लद्दाखियों को वीर सैनिकों को मिलने वाला गैलेंट्री अवार्ड मिला है। इतनी बड़ी संख्या में किसी क्षेत्र के लोगों को यह अवार्ड नहीं मिला है। गैलेंट्री अवार्ड वीरता के लिए मिलने वाला पुरस्कार है। इसमें महावीर चक्र, परम वीर चक्र, अशोक चक्र, कीर्ति चक्र, सूर्य चक्र आदि शामिल हैं।

यह प्रति व्यक्ति आबादी के अनुपात में देखा जाए 3 लाख लोगों के आबादी वाले लद्दाख के सैनिकों को 600 से अधिक गैलेंट्री अवार्ड मिलना किसी को आश्चर्यजनक लग सकता है, लेकिन यह आश्चर्यजनक नहीं है। किसी भी देश की रक्षा में उसकी सीमाओं पर रहने वाले लोगों का सबसे बड़ा योगदान होता है, खासकर जब वह सीमा बर्फ से भरी ऊंची हजारों किलोमीटर तक विस्तृत दुर्गम और कठिन क्षेत्र हिमालय में हो।

लद्दाखी सैनिकों की रेजीमेंट 11,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। जहां सामान्य इंसान को सांस लेना भी मुश्किल होता है, क्योंकि आक्सीजन की कमी होती है।  यह रेजीमेंट अपने जवानों के पर्वतीय कौशल का प्रदर्शन ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों, ग्लेशियरों और दुर्गम इलाकों में करती है। बड़ी संख्या में इस रेजिमेंट में लद्दाखी सैनिक सेवारत हैं, जो पाकिस्तान और चीन से लगती सीमाओं की रक्षा करता है।

कुछ लद्दाखी परिवारों के कई सदस्य इस रेजिमेंट में सेवारत हैं। उदाहरण के लिए, नुब्रा घाटी के पिंचिमिक गांव में, चार भाई लद्दाख स्काउट्स में सेवारत हैं। इनमें से एक भाई, जो मानद कैप्टन है, एक पर्वतारोही भी है जिसने माउंट एवरेस्ट सहित कई चोटियों पर चढ़ाई की है। लद्दाखी परिवारों के पास इस रेजीमेंट के सैनिकों की बहादुरी की अनगिनत वीरता की कहानियां हैं। 

बात कारगिल तक सीमित नहीं है, भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन के बीच के सैन्य युद्धों और सैनिक झड़पों को कोई इतिहास पढ़ ले तो उसे पता चल जाएगा कि 1947-1948 से लेकर आज तक भारत की चीन और पाकिस्तान से जुड़ी सीमाओं की रक्षा में लद्दाखी सैनिकों और नागरिकों की कितनी बड़ी भूमिका रही है।

क्या देशप्रेम का मतलब यह होता है कि हम अपने देश के जिस हिस्से में रहते हैं, जिस पर्यावरण में रहते हैं, हमारी जीवन-पद्धति है, हमारी जो संस्कृति है, उससे प्रेम न करना। अपनी मातृभाषा से प्रेम न करना। उसे बचाने के लिए कोई कोशिश न करना। अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व की मांग न करना।

अपनी जल-जमीन और पर्यावरण को बचाने की चाहत न रखना। वहां के अपने लोगों की रोजी-रोटी, आवास और सुरक्षा की चिंता न करना। क्या देशप्रेम का यह मतलब होता है कि अपने सभी राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और पर्यावरणीय अधिकार छोड़ देना? यह सब कुछ तो देशप्रेम की प्रेम की परिभाषा में नहीं आता। 

जो व्यक्ति या समुदाय जिस मिट्टी में जन्म लिया है, उससे प्रेम नहीं करता वह देश से प्रेम भी नहीं कर सकता है। लद्दाखी इस भारत भूमि से प्रेम करते हैं, लेकिन वे उतना ही लद्दाख से भी प्रेम करते हैं। सच तो यह है कि वे लद्दाख से प्रेम करना ठीक से जानते हैं, तभी वे भारत से भी ठीक से प्रेम करना जानते हैं। देश के जिस हिस्से में हम रहते हैं, उससे प्रेम करना और देश से प्रेम करना दोनों विपरीत चीजें नहीं। एक ही चीज को दो पहलू हैं। 

लद्दाखी अपने नाजुक भौगोलिक पर्यावरण को बचाने चाहते हैं, रोजगार चाहते हैं, अपने लिए भारतीय संविधान के दायरे में राजनीतिक अधिकार (चुनी हुई विधान सभा और अनुसूची-6) चाहते हैं। यह कैसे देश विरोधी है। यह सारी चीजें तो देश के कई राज्यों और क्षेत्रों को मिली हुई हैं। पूर्वोत्तर के चार राज्यों को छठी अनसूची भी प्राप्त है। कोई संविधान के दायरे से बाहर की चीज तो नहीं मांग रहे हैं। इन मांगों के लिए और उसके लिए उनके संघर्ष को कोई कैसे देशद्रोही मांग या संघर्ष ठहरा सकता है। 

यदि किसी एक अवाम की बात की जाए, तथ्य चीख-चीख कर कह रहे हैं कि सबसे देशप्रेमी अवाम तो लद्दाखी अवाम है। चूंकि वे सीमावर्ती क्षेत्र में रहते हैं, वे तिब्बती मूल के हैं, बहुलांश आबादी जनजाति है, 80 प्रतिशत लोग बौद्ध या शिया मुस्लिम हैं। इस सबके चलते वह हमारे नहीं हैं, उनके देशप्रेम पर संदेह किया जा सकता है या उन्हें या उनके सबसे सर्वमान्य नायक को ( सोनम वांगचुक) देशद्रोही ठहराया जाए, ये किसी भी तथ्य या तर्क के आधार पर जायज नहीं है, न्यायसंगत नहीं है, उचित नहीं है।

ये मेरे वतन के लोगों लद्दाखियों को द्रेशद्रोही ठहराने से पहले उन्होंने देश के लिए जो कुर्बानियां दी हैं, उसे एक बार याद कर लीजिए। उन्होंने देशप्रेम की जो मिसालें कायम की हैं, उसे जान लीजिए। 

जब घायल हुआ हिमालय

खतरे में पड़ी आज़ादी

जब तक थी सांस लड़े वो [लद्दाखी]

फिर अपनी लाश बिछा दी

संगीन पे धर कर माथा 

सो गये अमर बलिदानी

ये मेरे वतन के लोगों देशप्रेमियों को देश गद्दार ठहराने का अपराध मत कीजिए, इससे उनके दिलों को बहुत ठेस पहुंचेगी। उन्हें बहुत दर्द होगा।

Ramswaroop Mantri

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