अग्नि आलोक
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कहानी : उड़नपरी

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सुधा सिँह

     अंतर्प्रांतीय खेल-कूद प्रतियोगिता होने वाली थी। राजकीय बालिका विद्यालय के खेल के मैदान में वह उड़न तश्तरी की सी उड़ी जा रही थी। अन्य बालिकायें उसके बहुत पीछे रह गई थीं। बसंती बिष्ट अभी पिछले सप्ताह ही इस विद्यालय में प्रतिनियुक्ति पर प्रधान अध्यापिका बन कर आई थीं।

          वह इस बालिका की मोहक छवि एवं तीव्र गति पर उससे बहुत प्रभावित हुईं। ऊपर से गोल एवं नीचे अंडाकार मुखाकृति पर पतली-पतली घनी भौहें,  काली बड़ी-बड़ी आँखें, पतली नासिका, भरे हुए ओंठ, पतली, लम्बी छरहरी काया, श्यामल वर्ण की वह कन्या थी जैसे किसी चित्रकार की कल्पना साकार हो उठी हो।

 अपनी लम्बी सुडौल टाँगों से वह हिरनी के समान कुलाँचें मारती सबसे आगे निकल गई थी। माथे पर पसीने की बूँदें और कानों के पास दोनों तरफ लम्बी चोटी दुहरी करके लाल रिबन से बंधी हुई थी।

       जब वह सब लड़कियों के साथ आकर सामने खड़ी हुई तो बसंती बिष्ट मौन न रह सकीं—

“शाबाश! बेटी क्या नाम है तुम्हारा?”

“जी मैम! लीला सिंह्। कक्षा दस की छात्रा हूँ।“

बसंती बिष्ट को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि स्पोर्ट्स की टीचर श्रीमती नीना गुप्ता ने लीला की ओर बेरुखी से देखा और उसके बाद आने वाली छात्राओं का नाम टीम के लिये चयन करने लगीं। प्रधान अध्यापिका इसे अपनी अवहेलना समझ कर उस समय मौन रहीं पर वहाँ से हटते समय श्रीमती गुप्ता को अपने दफ्तर में आने के लिये कह गईं।

       जैसे ही श्रीमती गुप्ता ने प्रधान अध्यापिका के दफ्तर में कदम रक्खा बसंती एकदम क्रोध से फट पड़ीं—

“ नीना जी! आपकी तानाशाही नहीं चलेगी। जो लड़की सबसे तेज दौड़ी उसे आपने नज़रअंदाज़ कर दिया और अन्य लड़कियों को टीम में शामिल किया जो उससे बहुत पीछे थीं। मैं लीला के साथ ये अन्याय नहीं होने दूंगी।‘’

नीना गुप्ता शांत स्वर में बोलीं—

“मैम! लीला स्वयं कालेज के बाहर स्पोर्ट्स में भाग नहीं लेगी। उसके साथ कुछ समस्या है। उसने पहले ही मुझसे मना कर दिया था।“

प्रधान अध्यापिका ने लीला को चपरासी से अपने पास बुलवाया और बड़े प्यार से उससे प्रश्न किया—

“लीला! तुम कालेज के बाहर खेलने क्यों नहीं जाना चाहतीं? क्या तुम्हारे घरवाले तुम्हें मना करते हैं—“

बात बीच में काट कर आँसू भरी डबडबाई आँखों से प्रधान अध्यापिका को देखते हुए वह बोल पड़ी—

“मैम मेरा है ही कौन जो मुझे मना करेगा?”

“तो फिर तुम्हें क्या एतराज़ है? तुम सबसे तेज़ दौड़ती हो। बेटी मेरी बात मान कर स्पोर्ट्स में भाग लो।“

“मैम। लोग मेरी हँसी उड़ाते हैं। मेरे लिये अश्लील बातें कहते हैं तो मैं अपने सम्मान की रक्षा के लिये कालेज के बाहर किसी भी प्रतियोगिता में भाग नहीं लेती हूँ।“—लीला कहते हुए ज़ोर से सिसकने लगी।

       प्रधान अध्यापिका ने उसे गले से लगा लिया और बोलीं—

“लीला तुम चिंता न करो। आत्मविश्वास से कालेज की टीम में भाग लो। मेरे रहते कोई तुम्हारा अपमान नहीं कर सकेगा।“

लीला डुपट्टे के छोर से आँखें पोंछती बाहर चली गई। लीला के बाहर जाते ही बूढ़े चपरासी ने कहा—

“मैम! आप पहली व्यक्ति हैं‌ जो लीला से प्यार से बोली हैं। सब उससे नफ़रत करते हैं। साथ की लड़कियाँ उससे बात नहीं करतीं।‘’

“क्यों सब उसे क्यों नफरत करते हैं।“

चपरासी कुछ दुविधा में पड़ा कि कहूँ या न कहूँ पर फिर हिम्मत करके बोला—

“मैम! लीला एक ठाकुर साहब की नाजायज़ संतान है। उसकी माँ पतुरिया थी। बहुत सुंदर थी। ठाकुर साहब ने उसे रखैल बना लिया था। लीला उसी की बेटी है सब लोग जानते हैं अतः उसे उल्टा-सीधा कहते हैं। ठाकुर साहब की मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने लीला को कालेज में रह कर पढ़ने की व्यवस्था कर दी थी। वह कालेज के अंदर एक कमरे में रहती है। बड़ी प्यारी, सीधी बच्ची है।

       मैं और मेरी बीबी उसका ध्यान रखते हैं। मेरी अपनी कोई औलाद नहीं है। मैं सोचता हूँ कि मेरे बाद इसका क्या होगा?

चपरासी के भरभराये स्वर और उसकी कही बातें सुनकर प्रधान अध्यापिका चिंतित हो उठीं। वेश्या की लड़की हो कर यदि वह सामान्य जीवन व्यतीत करना चाहती है तो लोग उसका अपमान क्यों करते हैं? लड़कियाँ उसको नीची दृष्टि से देखती हैं ये तो गलत बात है। मुझे इस संदर्भ का स्वयं संज्ञान लेना होगा तभी इस लड़की को न्याय मिल पायेगा।

         अगले दिन कालेज में प्रार्थना के बाद प्रधान अध्यापिका ने दसवीं कक्षा की एक लड़की को बुलाकर प्रश्न किया—

“तुम लोग लीला के साथ मित्रता क्यों नहीं करतीं?”

पहले वह चुप रही तो प्रधान अध्यापिका ने कहा—“डरो नहीं। सच-सच बताओ।“

“मैम! हमारे माता-पिता लीला के साथ रहने को मना करते हैं।‘’

“क्यों क्या वह अच्छी लड़की नहीं है।“

“लीला बहुत अच्छी है और पढ़ने में भी बहुत तेज़ है।“—कई लड़कियाँ एक साथ  बोल पड़ीं।

“ इस पर भी तुम लोग उसे क्यों अकेला छोड़ देते हो?’’

“मैम! लीला की मां वेश्या थी इसलिये हमारी मम्मी हमें उसके साथ रहने को मना करती हैं।“—अर्पिता ने हिम्मत करके कहा।

प्रधान अध्यापिका ने समझाया—“देखो बच्चों! हमें अपना कर्तव्य सोच समझ कर निर्धारित करना चाहिये। लीला की मां यदि वेश्या थी तो उनकी कोई मजबूरी रही होगी। यह व्यवसाय कोई अपनी खुशी से नहीं अपनाता है। कई बार बलात्कार की शिकार लड़कियाँ जिन्हें समाज नहीं अपनाता या तो आत्महत्या कर लेती हैं या मजबूरी में अपने जीवन यापन के लिये वेश्यावृत्ति अपना लेती हैं।

      तुम सोच कर देखो कि यदि वे अपनी संतानों को सामान्य जीवन में स्थापित करने का यत्न करती हैं तो हमें उनके प्रयत्न में सहायक बनना चाहिये या उसकी योग्य संतान को भी सम्मान न देकर उससे उन्नति के अवसर छीन लेना चाहिये।“

“मैम! हमें लीला के साथ देख कर लड़के छेड़ते हैं। वे कहते हैं—“लाल चौक कब चल रही हो, हमें बता देना। अरे भाई मेरे साथ घूमने चलोगी— हमारी मम्मी इसीलिये लीला को साथ रखने को मना करती हैं।“—शिखा बोली।

प्रधान अध्यापिका ने कहा—“अपने पर विश्वास रखना चाहिये और किसी से डरना नहीं चाहिये। यदि लीला जैसे बच्चों को समाज सहारा नहीं देगा तो मजबूरन किसी कमज़ोर मानसिक स्थिति में वे उन्हीं गंदी गलियों में जाने को विवश हो जायेंगे। तुम लोग शपथ खाओ कि लीला को समाज में उच्च स्थान दिलाने में मेरी सहायता करोगी।“

सब लड़कियों ने प्रधान अध्यापिका को आश्वासन दिया।

    स्पोर्ट्स् टीम की कैप्टेन लीला को बनाया गया तो बहुत कठिनाई से उसने हामी भरी।

       इसी बीच लीला की माँ की मृत्यु हो गई। ठाकुर साहब की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। ठाकुर साहब के बेटे ने लीला को माँ के घर से निकलने को कहा—

“लीला! मेरा तुमसे अब कोई सम्बंध नहीं। तुम अपनी कोई व्यवस्था कर लो। दसवीं तक की कालेज की फीस जमा करा दी है। आगे की पढ़ाई के लिये पैसे नहीं दे पाऊँगा।‘’

लीला ने रोते हुए कहा—“भैया! मैं कहाँ जाऊँ?”

“खबरदार जो मुझे भाई कहा। –जहन्नुम में जाओ। मैं कुछ नहीं जानता। यह घर पापा ने तुम्हारी माँ के जीते जी उन्हें दिया था। इस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है ”—कहते हुए लीला को उसके बैग सहित घर से निकाल कर दरवाज़े पर ताला बंद करके ठाकुर साहब का बेटा अपनी कार पर बैठ कर चला गया।    

      लीला कालेज में अपने कमरे पर आ गई। एक तो माँ के जाने का दुःख ऊपर से घर से निर्वासन। वह बहुत चिंतित थी कि अब क्या होगा? उसकी चिंता तब और बढ़ गई जब लाल चौक के दलाल को उसने कालेज के गेट के बाहर चक्कर लगाते देखा।

      प्रधान अध्यापिका को जब लीला के स्पोर्ट्स का अभ्यास न करने और उसकी माँ की मृत्यु के विषय में ज्ञात हुआ तो वह उसके कमरे पर गईं। प्रधान अध्यापिका की सहानुभूति पाकर लीला फूट-फूट कर रो उठी। रोते हुए बोली–

    “मैं कहाँ जाऊँ मैम? मेरा कोई सहारा नहीं। मेरा कोई घर नहीं। लाल चौक का दलाल कालेज के चक्कर काट रहा है। वह मौका देख रहा है कि कब मुझे कालेज कैम्पस के बाहर पाये और पकड़ कर ले जाये। डर के मारे मैं सो भी नहीं पाती। स्पोर्ट्स प्रतियोगिता होने वाली है। सालाना परीक्षा सर पर है। मैं पढ़ भी नहीं पाती। जी करता है फाँसी लगा कर मर जाऊँ—‘’

“चुप! चुप! अब कभी ऐसी बात नहीं करना। तुम मेरी बेटी हो। तुम्हें अपनी परिस्थितियों से संघर्ष करना होगा। मैं तुम्हारे साथ हूँ।“

प्रधान अध्यापिका ने लीला को गले लगा लिया। मैं कल आकर तुम्हें अपने घर ले चलूँगी।     

      प्रधान अध्यापिका बसंती बिष्ट एवं उनके पति कर्नल रणजीत बिष्ट आकर लीला सिंह को अपने साथ कचहरी ले गये और उन्होंने लीला को गोद लेने के लिये आवेदन किया है। उनके बेटे ने भी लीला को बहिन स्वीकार कर लिया है।

     लीला की योग्यता और आत्मविश्वास देख कर अब कोई लीला पर फब्तियाँ नहीं कसता है। अब लीला सिंह बिष्ट की उड़नपरी की उड़ान प्रगति पथ पर अग्रसर है। ☄️

Ramswaroop Mantri

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