ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)
_भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में अलग-अलग प्रकार के संवत प्रचलित हैं। इनके बारे में ठीक से जानने के लिए हमें इनका प्रारंभिक इतिहास जानना और समझना होगा। बात करें साहित्य की तो यहाँ का प्राचीन प्रचलित संवत कलयुगी या सप्तर्षि सवंत को माना जा सकता है।_
सप्तर्षि संवत को लौकिक संवत, पहाड़ी संवत(कश्मीर में प्रसिद्ध होने के कारण), कथा संवत, शास्त्र संवत भी कहा जाता रहा है। यह संवत 27 नक्षत्रों पर आधारित 2700 सालों का एक कल्पित संवत है। इसमें सप्तर्षि तारों के हिसाब से गणना होती है, खैर हमें ऐतिहासिककता की ओर बात करना है इसलिए इसे यहीं छोड़ते है.कश्मीर के इतिहासकार कल्हण अपने ग्रन्थ राजतरंगिणी में इसके और शक संवत में अंतर बताते हुए सूचना देते हैं(इसमें अंतर का हिसाब-किताब की गणना बहुत कठिन है वो अलग से कभी लिख दूँगा)। सप्तर्षि संवत की शुरुआत चैत्र के पहले दिन से होता है और इसके महीने पूर्णिमा से समाप्त होते हैं अर्थात ये चंद्र कलाओं पर आधारित हैं।
कलयुगी संवत अभिलेखों और साहित्य में आता है उसपे फिर कभी चर्चा। इसी तरह का जैनों में वीर-निर्वाण संवत और बौद्धों में बुद्ध संवत भी प्रचलित था, विशेषकर उनके धार्मिक साहित्य में।
अब हम बात करेंगे विक्रम संवत पर जिसके बारे में यह लोकप्रचलित परम्परा चली आ रही है कि मालवा के राजा विक्रमादित्य ने शकों को अपने प्रदेश से पराजित कर अपने नाम से विक्रम संवत चलाया।
विक्रम संवत के प्रारंभ होने का वर्ष 57 ई0 पू0 निर्धारित किया गया है क्योंकि पहली बार धौलपुर से मिले एक चौहान अभिलेख से इसकी तिथि 898 विक्रमी संवत(841 ई0) मिलती है। विक्रम संवत जो कि 57 ई0पू0 से प्रारंभ है ठीक उसी समय से प्रारंभ होकर कृत संवत नाम(तीसरी सदी से), मालव संवत नाम (चौथी सदी से लगभग) की भी तिथि मिलती है।
ये तीनों संवत अलग-अलग नाम से ठीक 57 ई0 पू0 से शुरू होते हैं इसलिए इन्हें एक मानने में कोई कठिनाई नहीं है।
इसके लिए ये भी ध्यान रखना सबसे जरूरी है कि प्राचीन अभिलेखों में दूसरी सदी ई0 तक किसी भी संवत का नाम नहीं मिलता केवल वर्ष की सँख्या मिलती है या तो किसी राजा के शासनकाल का वर्ष(इस मामले में शुरुआत अशोक के अभिलेखों से ही देखा जा सकता है जिसने केवल अपने शासनकाल का वर्ष दिया है उसने किसी भी संवत का उल्लेख नहीं किया है)।
नरवर्मन के मंदसौर अभिलेख में तो कृत और मालव संवत दोनों का नाम एक साथ आता है एक ही अर्थ में तिथि है:-441 वाँ वर्ष का वर्षा ऋतु।
राजपुताना म्यूजियम में रखे एक शिलालेख में कार्तिक शुक्ल-पंचमी कृत संवत 481 की तिथि मिलती है इसमें भी मालव को इससे संबंधित किया गया है।
मंदसौर के ही कुमारगुप्त के अभिलेख में लिखा मिलता है कि मालवों के गण के समय से 493 वर्ष बीतने पर पौष शुक्ल-13 की तिथि को यह लेख निर्गत हुआ।
ऐसे दर्जन भर अभिलेख हैं जिनसे यह साबित होता है कि मालव राज्य या राजा के स्वतंत्रता के समय से यह संवत प्रारम्भ किया गया है, इसे कृत संवत इसलिए कहा गया है क्योंकि उनके स्वतंत्रता के पश्चात उनके राज्य में कृत युग अर्थात सतयुग या आम बोलचाल की भाषा में सुखद स्थिति आ गयी।
इसलिए इसके लिए कृत संवत नाम सही बैठता है। राजस्थान से मालवों के कुछ सिक्के भी मिले जिनसे उनके स्वतंत्र राज्य की पुष्टि हो जाती है।
अब सवाल यह है कि इसके प्रवर्तक क्या वाकई कोई विक्रमादित्य ही था या ये पदवी किसी स्थानीय राजा को इसीलिए दे दिया गया क्योंकि भारतीय साहित्य में विक्रमादित्य का तात्पर्य एक ऐसे योद्धा से होता है,जिसने किसी विदेशी आक्रमणकारियों को जरूर परास्त किया हो, ऐसे 14 विक्रमादित्य इतिहास में मिलते हैं जिसमें सबसे प्रसिद्ध विक्रमादित्य चंद्रगुप्त द्वितीय(चौथी सदी)है।
कुछ विद्वानों का मत है कि मालवा संवत में विक्रम नाम चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के कारण लगा होगा क्योंकि उज्जैन जो कि मालव राज्य की राजधानी थी वो चंद्रगुप्त के समय उसकी सांस्कृतिक राजधानी बनायी गयी।
लेकिन ऐसा करने पर हमें ये मानना पड़ेगा कि उसके पहले कोई विक्रमादित्य नाम का राजा न हुआ है भारतीय इतिहास में जबकि 57 ई0पू0 के राजा विक्रमादित्य की पुष्टि जैन ग्रँथों और सातवाहन राजा हाल के गाथासप्तसती(प्राकृत भाषा में) से भी हो जाती है। इसलिए ये मानना उचित नहीं।
बाकी ये तो 100% कन्फर्म है कि किसी भारतीय राजा ने ही शकों को हराने के उपलक्ष्य में इसे शुरू किया था न कि किसी शक राजा ने इसे शुरू किया(जैसा कि मार्शल ने इसे शक अय प्रथम को माना, चूँकि अधिकाँश शक शासक बौद्ध थे इसलिए बौद्धिष्ट इसे अपनी ओर खींच सकते हैं)।
विक्रम संवत के नाम से ही 1176 ई0 में चालुक्य राजा विक्रमादित्य छठे ने एक अलग चालुक्य-विक्रम-संवत भी चलाया था।
विक्रमी संवत का प्रारम्भ उत्तर भारत में चैत्र शुक्लपक्ष-1 से शुरू होता है तो यही दक्षिण भारत में कहीं-कहीं कार्तिक शुक्लपक्ष-1 से शुरू होता है। इसे चैत्रादि और कार्तिकादि के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत के महीनों की शुरुआत कृष्ण पक्ष1 से शुरू होकर शुक्ल पक्ष 15 पर खत्म होता है जबकि दक्षिण भारत के महीने शुक्ल 1 से शुरू होकर अमावस्या को खत्म होते हैं। इसलिए उत्तरी भारत के महीने पूर्णिमांत और दक्षिणी भारत के महीने अमांत कहलाते हैं। इसी प्रकार काठियावाड़ और गुजरात में ये विक्रम संवत आषाढ़ शुक्लपक्ष-1 से शुरू होते हैं।_
ठीक इसी प्रकार के तथ्य शक संवत के भी मिलते हैं जिसे चलाने का श्रेय शक राजा, सातवाहन राजा या कुषाण राजाओं को दिया जाता है लेकिन ऐतिहासिक अभिलेखों के सबूतों के आधार पर यह माना गया है कि शक संवत 78 ई0 में कुषाण राजा कनिष्क ने प्रचलित करवाया।
इस प्रकार विक्रम और शक संवत में 135 वर्षों का अंतर मिलता है।
रही बात संवत के सौर और चन्द्र माह पर आधारित होने की तो इतना जान लें कि जो संवत चन्द्र माह पर है उसकी तिथि बदलती रहती है जैसे विक्रम संवत बाकी जो सवंत सूर्य के अनुसार है उसकी तिथि नियत होती है क्योंकि आजकल का सबसे लोकप्रचलित अंग्रेजी कैलेंडर सूर्य के अनुसार ही व्यवस्थित है।
वैसे भारत का सरकारी पंचाग शक संवत पर आधारित है क्योंकि यह सौर महीनों से मेल खाता है।
(लेखक चेतना विकास मिशन के ‘ज्योतिष अनुभाग प्रभारी’ हैं.)





