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कन्हैया_के_नाम_एक_खुला_पत्र

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प्रिय कन्हैया,
दुविधा थी कि तुम्हारे लिये संबोधन में क्या लिखूं- साथी, कॉमरेड या बंधु? 
साथीपन और कॉमरेडशिप जब तुमने खुद ही त्याग दी तो तो अपनी उस भावना को भी प्रकट करने का क्या लाभ जिसमे तुम्हें छोटे भाई की तरह स्नेह करता रहा हूँ। 
याद करता हूँ उन दिनों को जब तुम एक फर्जी आरोप में असली जेल भेजे गए थे। जेल जाना सार्वजनिक जीवन भर कोई अनोखी या अनहोनी घटना नही है और हम सब खासकर कम्युनिस्ट जेल को लेकर इतने उत्साहित रहते हैं कि अनेकों गीत और नारे जेलों को लेकर बनाये गए हैं। लेकिन उन 13 दिनों तक मैं सामान्य नही रह सका था। और मैं ही क्यों, मेरी पार्टी का कोई भी व्यक्ति। 
देश मे लोकतंत्र और संविधान के मूल्यों के लिये समर्पित कोई भी व्यक्ति खुश नही था। मुझे ये कहते हुए कोई संदेह नही कि तुम्हारे लिए गाली देने वाले उन दिनों बहुत थे। भाजपा में ही नही बल्कि तुम्हारी नई पार्टी में भी। 
लेकिन उससे ज्यादा तुमने प्यार करने वाले भी हासिल किए। वह भी पार्टी की सीमाओं से परे। इनमें तुम्हारी नई पार्टी से कितने जरा से लोग थे, ये आने वाले दिनों में तुम खुद ही देख लोगे। इतना कॉमनसेंस तो बेशक तुम्हारे पास है। लेकिन मेरे दोस्त…. इतिहास ने तुम्हें एक जिम्मेदारी के लिए चुना था।उसका थोड़ा बहुत आभास तुम्हें है भी। वह ऐतिहासिक जिम्मेदारी सिर्फ कॉमनसेंस से पूरी होती नही है।
इसलिये तुम्हें उज्ज्वल और सफल भविष्य की शुभकामनाएं देता हूँ। इन दोनों शब्दों पर मेरा जोर क्यों है, ये तुमसे बेहतर कौन समझ सकता है?
सफलता तुम्हें चाहिए है। हर हाल में। हर कीमत पर। इसलिये आज ये कहने में मुझे दिक्कत हो रही है कि वह पार्टी कोई भी हो सकती थी। कांग्रेस महज संयोग है। शायद इसलिए कि वह बड़ी पार्टी है। उसमें स्कोप अधिक है। लेकिन वह स्कोप तुम और भी जगहों पर तलाश ही रहे थे पिछले महीनों में। 
बात पहले हो जाती, किसी और के साथ हो जाती तो शायद फ़ासीवाद पर पुराने दिनों की तरह उग्र नही दिखते और परिवारवाद के प्रति इतने नरम और मजाकिया भी। लेकिन क्या कहूँ?लेकिन हो भी सकता था। आख़िर संतुलन साधना तो नीतीश बाबू को भी आता ही है। 
सच कहूं तो उन्ही दिनों मुझे अंधा युग का वह संवाद तंग कर रहा था- आज पहली बार मुझे आशंका व्यापी है। तुमने तो खैर पढ़ा नही होगा अंधा युग। 
पढ़ लिया करो। तुमसे प्रेम किया है इसलिए कह रहा हूँ कि पढ़ने से ही तुम्हे रास्ता मिलेगा। कुछ लोग अध्ययन का विकल्प अपने कॉमन सेंस को मान लेते हैं। वे बेशक बहुत प्रतिभाशाली लोग होते हैं। लेकिन सहजबोध ज्ञान का विकल्प नही है। पकड़े जाते हैं। जैसे कल की पत्रकार वार्ता में गाँधी,अम्बेडकर और भगतसिंह के विरोधाभाषी उद्धरण देते समय तुमने किया था। 
पत्रकारों और श्रोताओं की अज्ञानता से बच जाना अलग बात है लेकिन उससे कोई युगनिर्माता नही बनता। 
इसलिये मैं आशंकित था कि इतिहास की गलियों में बेलगाम घूमते हुए लेनिन और स्टालिन तक न पहुंच जाओ। 
स्टालिन से याद आया कि जब तुमने एक टीवी डिबेट जीतने के लिये स्टालिन मुर्दाबाद का नारा लगाया था और संबित पात्रा ने गोडसे मुर्दाबाद का नारा लगाने से इनकार कर दिया था तो बेशक तुमने एक जबरदस्त कॉमन सेंस का परिचय दिया था और अनेकों की तरह ये मान लिया था कि वह बहस तुमने जीती। कभी फुरसत में सोचना कि एक बहस जीतने के लिए तुमने क्या हारा था? संबित पात्रा वैचारिक रूप से तुमसे अधिक समर्पित साबित हुआ। 
बेशक वक्तव्य कला तुमको आती है। मैने खुद से बेहतर वक्ताओं में तुम्हे स्वीकार किया है। लेकिन भाषण को सब कुछ मान लेना आपको खुद के खिलाफ खड़ा करता है और आप उसी को एक काम मानने लगते हैं। तब आपको दूसरा काम करने में दिक्कत आती है। शायद नई पार्टी में न आये क्योंकि वहाँ वैसे भी काम और नेता, दोनों में कोई सामंजस्य नही है।चूंकि मैं थियेटर को थोड़ा बहुत समझता हूं तो स्पीच के तुमको सौ में से पंचानबे नम्बर भी दे सकता हूँ लेकिन इस कला में तो वे भी महारथ हासिल किए हुए हैं जो इस देश, लोकतंत्र और संविधान के लिये सबसे बड़े खतरे हैं। सभाओं में पड़ने वाली तालियों की आदत मुझे भी है पर मुझे उसकी लत नही है क्योंकि उसकी व्यर्थता और क्षणभंगुरता को मैं जानता हूँ। 
तो, थियेटर में गिमिक्स और सरप्राइज की भूमिका रहती है। जब राजनीति में ये आने लगे तो राजनीति नाटक बन जाती है। जनता में राजनीति को लेकर जो नकारात्मक धारणाएं पहले से मौजूद हैं, मुझे दुख है कि तुमने भी उनमें इजाफा ही किया है। याद करो अन्ना आंदोलन के साथ जो युवा स्वतःस्फूर्त ढंग से उठ खड़ा हुआ था, जब उस आंदोलन के गर्भ से एक राजनीतिक पार्टी उत्पन्न हुई तो सबने खुद को छला हुआ महसूस किया था। ऐसा ही कुछ आज वे भी महसूस कर रहे होंगे जिन्होंने तुम्हारे समर्थन के लिये अपनी दोस्तियों और रिश्तेदारियों को दाँव पर लगा दिया था। बाबा भारती और डाकू खड़क सिंह की कहानी याद है न कन्हैया?इसलिये आज लोगों में जो धारणा बन रही है वह यही है कि तुम्हे कम्युनिस्ट पार्टी में रहते हुए सांसद वगैरह बनना मुश्किल प्रतीत हो रहा था तो जहाँ से राज्यसभा में जाना आसान है, तुम वहाँ चले गए। आखिर तुमने उनके उन आरोपो को सही साबित कर दिया जिसके जवाब हम लोग सड़कों पर दे रहे थे। 
इसको लेकर तुमने कोई सजता हुआ उत्तर सोच ही लिया होगा परंतु तुम प्यार करने वाले उन लाखों साथियों को कैसे समझाओगे? 
याद रखो तुम कन्हैया हो, कृष्ण नही हो जो धर्म के माध्यम से लोगों को चुप कर दोगे। धर्म से ही याद आया कि अब तुम्हें मन्दिर जाकर प्रचार करने पर किसी आलोचना का सामना नही करना पड़ेगा क्योंकि यहाँ तो अध्यक्ष महोदय ही जनेऊ धारण कर फोटो सेशन कराते रहते हैं। इसलिये यह अकारण नही था कि तुमने पत्रकार वार्ता में गाँधी को तो बहुत याद किया लेकिन जवाहर लाल नेहरू को भूल गए। दअरसल कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व की जो नई राजनीति शुरू की है, उसमे नेहरू के लिये बहुत स्थान है भी नहीं। 
लेकिन यह दिलाना मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं कि जब लोकतंत्र और संविधान वगैरह बड़े शब्द अपने भाषणों में इस्तेमाल करो तो नेहरू को याद करो। वे भारतीय आधुनिकता के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक हैं- डॉ आंबेडकर के साथ। इसलिये परिवार को छोड़ने वाले संघ परिवारी गाँधी पर कोई वैचारिक हमला नही करते। इस काम के लिये वे नेहरू को चुनते हैं। इसलिये देखना ये चाहिये कि हमारे विरोधी किस पर हमला करते हैं? हमारे और विरोधियों के आदर्श समान नही हो सकते। दिल पर हाथ रखकर बताना कि यदि नेहरू नही होते तो क्या इतना भी लोकतंत्र हमारे हिस्से आज बचा होता? और नेहरू की विरासत को, उनके विचार को आज कौन सहेज रहा है? कांग्रेस तो बिल्कुल भी नही। अब तो तुम साथ मे रहोगे ही। देखना कि कितने कांग्रेसियों ने नेहरू की पुस्तकों को पढ़ा हुआ है? कितनो ने गाँधी को और कितनो ने संविधान को?
तुमने तो पढ़ा है न?
तुम तो दोस्ती दुश्मनी की इतनी बातें करते हो, बुनियादी बात ये नही है कि दुश्मन पहले तय करो तो दोस्त अपने आप बनेंगे। यह बहुत ही गड़बड़ सोच है। हम दुश्मनी के लिये सार्वजनिक जीवन मे नही आये हैं। हम दोस्ती के लिये, प्यार के लिए राजनीति में हैं। हम दुनिया को खूबसूरत और सबके लिए आसान बनाने के लिये राजनीति करते हैं। हमारी दोस्ती समाज के शोषित, पीडित, दलित, मेहनतकश और किसान के साथ है। इनके खिलाफ जो है, वह हमारा दुश्मन है। 
दुश्मनी उसने चुनी है, हमने नही। इसलिये हम आरएसएस-भाजपा-कॉरपोरेट गठजोड़ और उनके फासीवादी विचार के खिलाफ हैं कि वे मेहनतकश के खिलाफ खड़े हैं। 
मेरा स्टेशन आने वाला है। पत्र को खत्म करना चाहिए अब। तो आखिर में मुझे बस इतना ही कहना है कि तुम्हारी चिंता जायज है। आज लड़ाई कठिन है। फ़ासीवाद एक सामान्य तानाशाही नही होती। इससे लड़ाई भी आसान नही होती। वह सत्ता की लड़ाई तो कतई नही है। लेकिन तुमने जिस पार्टी का चयन किया है मेरी समझ मे वह इसके लिये एकदम ही तैयार नही है। हाँ, सत्ता उन्हें पसंद आती है और वे खुद फासीवादी नही हैं। वे सत्ता में आ जाएंगे तो फ़ासीवाद सत्ता से दूर होगा और तुम्हारे लिए भी शायद उज्ज्वल भविष्य निकल आये। लेकिन जब वे अपने खुद के लोगों को नही संभाल पा रहे हैं तो तुम्हारे लिये भी कितना सोचेंगे, मुझे नही पता। 
हाँ, कठिन लड़ाई लड़ने के लिये हम मौजूद हैं। और हम लड़ेंगे साथी- उदास मौसम के खिलाफ। 
तुमने आसान रास्ता चुना लिया। तुम्हे मुबारक। जब तुम्हे पार्टी में अतिरिक्त महत्व दिया गया तो हमारे ऊपर आरोप सवर्णों को महत्व देने का था। आज युवाओं को सम्मान नही देने का आरोप है। 
इन सबसे लड़ेंगे और फ़ासीवाद से भी लड़ेंगे। 
जय भीम-लाल सलाम की लड़ाई को आगे ले जाएंगे। 
इस नारे ने जो उम्मीदें जगाई थी वे ऐतिहासिक थीं। वे उन उम्मीदों से बढ़कर थी जो तुम पर लगी थीं। करोड़ों नही तो लाखों लोग उन्हें उम्मीद से देख रहे थे। चूंकि कम लोगों और साथियों की सही लेकिन तुमसे अधिक समय तक उम्मीदों के बोझ को मैंने महसूस किया है इसलिये जानता हूँ कि कठिन होता है निभाना। तुमसे नही हो सका। वे सब साथी गलत साबित हुए जो अंतिम समय तक एक आशा लगाए बैठे थे कि हमारा कन्हैया कैसे दलबदल कर सकता है? और दिन भी कौन सा चुना? शहीद ए आज़म भगत सिंह का जन्मदिन। 
क्या कहूँ तुमसे। गाँधी के साथ जो सुलूक काँग्रेसी करते रहते हैं, वह तुमने भगत सिंह के साथ किया। भगत सिंह नास्तिक थे वरना तुमसे कहता कि….
लेकिन खैर, तुम्हें सफल होना है और हमे समर्पित। तुम्हें सफलता मिले इसकी शुभकामनाओं सहित।।
तुम्हारा,

सत्यम सागर

Ramswaroop Mantri

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