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कश्मीर टाइम्स के 2020 में सील कार्यालय पर एसआईए के छापे की निंदा

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जम्मू में कश्मीर टाइम्स के कार्यालय पर जम्मू कश्मीर पुलिस की राज्य जांच एजंसी (एसआईए) के गुरुवार को छापे की मीडिया संगठनों और कई वरिष्ठ पत्रकारों ने निंदा की है। 

डीजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन  ने छापे की कार्रवाई की निंदा करते हुए गहरी चिंता जताई और कहा कि पत्रकारिता अपराध नहीं है। 

डीजीपब ने जारी बयान में कहा कि किसी स्वतंत्र और विश्वानीय समाचार संस्थान को इस तरह निशाना बनाना प्रेस की आजादी पर सीधा हमला है। उन्होंने आजाद पत्रकारिता को लोकतंत्र की रीढ़ बताते हुए अधिकारियों से कश्मीर टाइम्स के खिलाफ उत्पीड़न की कार्रवाई बंद करने और पत्रकारों को स्वतंत्रता पूर्वक अपना काम करने देने की मांग की। 

नेटवर्क ऑफ वुमन इन मीडिया, इंडिया ने कश्मीर टाइम्स व इसकी प्रबंध संपादक अनुराधा भसीन के साथ एकजुटता जताई है।  

न्यूजलॉन्ड्री के अनुसार वायर की संपादक सीमा चिश्ती ने छापे को “शर्मनाक” करार दिया है, हिंदू की कूटनीतिक मामलों की संपादक सुहासिनी हैदर ने कार्रवाई को “राजनीति प्रेरित” बताया है। 

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स के एशिया पेसिफिक समन्वयक कुणाल मजूमदार ने कहा कि छापे की कार्रवाई बेहद परेशान करने वाली और जम्मू कश्मीर में मीडिया संस्थानों पर बढ़ते दबाव को लेकर चिंताएं पैदा करने वाली है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को कार्रवाई के कानूनी आधार बताना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच पूरी पारदर्शिता और प्रक्रिया के पालन के साथ हो। उन्होंने कहा कि समाचार संस्थानों को अपना काम करने के लिए दंडित नहीं किया जा सकता। 

कश्मीर के पत्रकारों का भी कहना है कि छापे की कार्रवाई अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से ही जारी मीडिया को दबाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। पत्रकारों ने बताया कि इधर कश्मीर में उनके निजी जीवन में प्रशासन और सुरक्षा एजंसियों का दखल बहुत बढ़ गया है और उनसे पैन व आधार, वेतन/पारिश्रमिक  का विवरण मांगने से लेकर यह तक पूछा जाता है कि वह कौन सी खबरों पर काम कर रहे हैं।

एक पत्रकार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि “ऐसे में हमारे पास दो ही विकल्प हैं कि या तो हम पत्रकारिता छोड़ दें या फिर जेल जाएँ।” 

कश्मीर टाइम्स, की जहां तक बात है, 1954 में शुरू हुआ जम्मू कश्मीर का पुराना और प्रतिष्ठित अखबार है लेकिन अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से प्रशासन के निशाने  पर है। अखबार की प्रबंध संपादक अनुराधा भसीन ने इंटरनेट बंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी। उनका कहना था कि इससे जम्मू कश्मीर में प्रेस की आजादी पंगु हो गई है और आजीविका खतरे में पड़ गई है। अदालत ने सरकार को इस पर बंदिशें कम करने का निर्देश दिया। 

2020 में प्रशासन ने कश्मीर टाइम्स के दफ्तर को सील कर दिया था। 2021 से इसका प्रिन्ट संस्करण बंद है और केवल वेबसाईट चल रही है। अभी अगस्त में जम्मू कश्मीर के गृह विभाग ने जब 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया तो अनुराधा भसीन की किताब “द डिसमेंटल्ड स्टेट : अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर आफ्टर आर्टिकल 370” शामिल थी। 

जम्मू में जिस दफ्तर पर एसआईए ने छापा मारा था, संस्थान के संचालकों के अनुसार वह दफ्तर भी तीन से ज्यादा वर्षों से बंद पड़ा था। संस्थान का कोई स्टाफ नहीं है और कार्य फ्रीलांसर पत्रकारों से ही चलता है। बेहद सीमित संसाधनों के बावजूद कश्मीर टाइम्स ने हाल में श्रीनगर पुलिस थाने में विस्फोट की दुर्घटना से लेकर पत्रकारों के लिए नौकरी के अवसरों की कमी, बाढ़ से झेलम के तटबंधों के कमजोर होने, पीएसए हिरासतों, लद्दाख में विरोध प्रदर्शनों पर कई खबरें दी हैं। एक दिन पहले ही घोषित लाड़ली पुरस्कारों में निधि जामवाल के लेख को पुरस्कृत किया गया। 

Ramswaroop Mantri

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