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खान अब्दुल गफ्फार खान:’भारत रत्न’ पाने वाले पहले गैर-भारतीय

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बिना हथियार वाली फौज का वो कमांडर जिसकी जवानी अंग्रेजों की जेल में कटी, बुढ़ापा पाकिस्तान की कैद में

 6 फरवरी 1890 को पेशावर की मिट्टी में एक ऐसे नायक का जन्म हुआ, जिसने इतिहास की धारा बदल दी. खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें दुनिया ‘बच्चा खान’ और ‘सीमांत गांधी’ के नाम से जानती है, एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने पश्तूनों के ‘बदला’ लेने वाले स्वभाव को ‘क्षमा’ में बदल दिया. उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के उत्मान जई गांव में पैदा हुए गफ्फार खान ने बचपन से ही देखा कि पश्तून समाज की बहादुरी आपसी रंजिशों में बर्बाद हो रही है. उन्होंने बहुत कम उम्र में यह जान लिया था कि अंग्रेजों की गुलामी से ज्यादा खतरनाक ‘अशिक्षा’ की बेड़ियां हैं. यही कारण था कि उन्होंने महज 20 साल की उम्र में अपना पहला ‘आजाद स्कूल’ खोला.खान अब्दुल गफ्फार खान को ‘बच्चा खान’ और ‘सीमांत गांधी’ के नाम से भी जाना जाता है. वह आजादी की लड़ाई के महान नायक थे. उन्होंने पश्तूनों को अहिंसा का पाठ पढ़ाने के लिए ‘खुदाई खिदमतगार’ संगठन बनाया. विभाजन के समय उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त की थी. अपने सिद्धांतों के लिए उन्होंने अंग्रेजों और पाकिस्तान की जेलों में कुल 27 साल बिताए. वे ‘भारत रत्न’ पाने वाले पहले गैर-भारतीय नागरिक थे.

जब स्वाभिमान के लिए ठुकरा दी अंग्रेजों की बड़ी नौकरी

बच्चा खान की जिंदगी में पहला बड़ा बदलाव तब आया जब उन्हें 10वीं के बाद ब्रिटिश सेना की ‘कॉर्प्स ऑफ गाइड्स’ में कमीशन मिला. एक पश्तून युवा के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. लेकिन जब उन्होंने देखा कि अंग्रेज अफसर भारतीय सैनिकों के साथ हिकारत और अपमानजनक व्यवहार करते हैं, तो उनका जमीर जाग उठा. उन्होंने बिना देर किए उस प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकरा दिया. यह उनका पहला व्यक्तिगत सत्याग्रह था. उन्होंने तय कर लिया था कि वे अंग्रेजों के लिए काम करने के बजाय अपने समाज को जागरूक करेंगे.

‘खुदाई खिदमतगार’: बिना हथियार वाली दुनिया की पहली अनुशासित फौज

साल 1929 में बच्चा खान ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी. उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ यानी ईश्वर के सेवकों का एक संगठन बनाया. इस फौज की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इनके पास हथियार नहीं थे. ईंट की धूल से रंगे लाल कपड़ों की वजह से इन्हें ‘लाल कुर्ती’ दल कहा गया. इस सेना में शामिल होने की शपथ बहुत कठिन थी. एक लड़ाकू पश्तून को यह शपथ लेनी पड़ती थी कि वह कभी हिंसा नहीं करेगा और जुल्म करने वाले को भी माफ कर देगा.

1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में जब ब्रिटिश फौज ने इन निहत्थे पठानों पर गोलियां चलाईं, तो एक अद्भुत नजारा दिखा. सैकड़ों लोगों ने गोलियां खाईं, लेकिन किसी ने पत्थर तक नहीं उठाया. एक अंग्रेज अफसर ने खुद माना था कि हथियारबंद पठानों से लड़ना आसान है, लेकिन इन निहत्थों के अनुशासन ने हमें डरा दिया.

गांधीजी के साथ रूहानी रिश्ता और ‘सीमांत गांधी’ की उपाधि

महात्मा गांधी और बच्चा खान का रिश्ता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि रूहानियत से जुड़ा था. दोनों की भाषा, खान-पान और पहनावा बिल्कुल अलग था, लेकिन दोनों की आत्मा में ‘अहिंसा’ बसती थी. इसी गहरे जुड़ाव की वजह से उन्हें ‘सीमांत गांधी’ कहा गया. खान अब्दुल गफ्फार खान ने उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में गांधीजी के सिद्धांतों को इतनी मजबूती से लागू किया कि पठान समाज पूरी तरह अहिंसक आंदोलनों का हिस्सा बन गया. 1934 में जब उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव मिला, तो उन्होंने सादगी से उसे ठुकरा दिया.

खान अब्दुल गफ्फार खान और पंडित जवाहरलाल नेहरू.

विभाजन का दर्द: ‘आपने हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया’

1947 की आजादी बच्चा खान के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं थी. वे धर्म के आधार पर देश के बंटवारे के सख्त खिलाफ थे. जब कांग्रेस ने विभाजन स्वीकार कर लिया, तो वे गहरे दुख में डूब गए. उन्होंने भारी मन से कांग्रेस नेतृत्व से कहा था, ‘आपने तो हमें भेड़ियों के आगे फेंक दिया.’ उनका इशारा उस पाकिस्तान की ओर था, जहां पश्तूनों के अधिकारों की कोई गारंटी नहीं थी. यह टीस उनके दिल में उम्र भर बनी रही.

नेल्सन मंडेला से भी ज्यादा समय जेल में बिताया

आजादी के बाद बच्चा खान पाकिस्तान में रहे, लेकिन वहां की सरकार को उनकी ‘पश्तूनिस्तान’ की मांग और स्वायत्तता के विचार रास नहीं आए. विडंबना देखिए कि जिस नेता ने अपनी जवानी अंग्रेजों की जेलों में काटी, उसका बुढ़ापा पाकिस्तान की कालकोठरियों में गुजरा. उन्होंने अपने जीवन के कुल 27 साल जेल में बिताए, जो नेल्सन मंडेला की कैद से भी ज्यादा लंबी अवधि है. 1960 के दशक में उन्हें अफगानिस्तान में निर्वासन भी झेलना पड़ा, लेकिन उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ.

भारत रत्न पाने वाले पहले गैर-भारतीय नायक

भारत ने अपने इस महान सपूत को कभी ओझल नहीं होने दिया. 1987 में जब वे इलाज के लिए भारत आए, तो उनका स्वागत किसी राष्ट्रप्रमुख की तरह हुआ. भारत सरकार ने उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया. वे यह सर्वोच्च सम्मान पाने वाले पहले गैर-भारतीय बने. यह सम्मान उस सरहद को चुनौती थी, जो नक्शे पर तो थी लेकिन दिलों में नहीं. 20 जनवरी 1988 को इस महान योद्धा ने अंतिम सांस ली. उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उन्हें अफगानिस्तान के जलालाबाद में दफनाया गया.

Ramswaroop Mantri

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