जूली सचदेवा (दिल्ली)
काफ़िर हैं सिर-फिरे है हमें मार दीजिए
हम सोचने भी लगे हैं हमें मार दीजिए
है एहतिराम-ए-हज़रत-ए-इंसान हमारा दीन
अब तो बे-दीन हो गए हैं हमें मार दीजिए
हम पूछने लगे हैं सबब अपने क़त्ल का
हम हद से बढ़ रहे हैं हमें मार दीजिए
करते हैं अहल-ए-जुब्बा-ओ-दस्तार से सवाल
हम तो गुस्ताख़ ही हो गए हैं हमें मार दीजिए
ख़ुशबू से हमारा रब्त है जुगनू से है काम
हम कितने भटक गए हैं हमें मार दीजिए
मा’लूम है हमें कि बड़ा जुर्म है ये काम
हम ख़्वाब देखते हैं हमें मार दीजिए
ज़ाहिदे ज़ोहादो-तक़्वा-ओ-परहेज़ की साथी
यह सब हम ख़ूब जानते हैं हमें मार दीजिए
बे-दीन हैं मगर हैं ज़माने में जितने दीन
हम सब को मानते हैं मुझे मार दीजिए
फिर उस के बा’द शहर में नाचेगा हू का शोर
हम तो आख़िरी सदा हैं हमें मार दीजिए
हम ठीक सोचते हैं कोई हद मेरे लिए
हम साफ़ देखते हैं हमें मार दीजिए
ये ज़ुल्म है कि ज़ुल्म को कहते हैं साफ़ ज़ुल्म
इत्ता बड़ा ज़ुल्म कर रहे हैं हमें मार दीजिए
ज़िंदा रहे तो करते रहेंगें हमेशा प्यार
हम साफ़ कह रहे हैं हमें मार दीजिए
ज़ख़्म बाँटने वालों को ज़ीस्त पे है हक़
हम तो मरहम बाँटते हैं हमें मार दीजिए
बारूद का नहीं मिरा मस्लक दरूद है
हम ख़ैर माँगते हैं तो हमें मार दीजिए!
(चेतना विकास मिशन)




