उस्ताद लहुजी सालवे का जन्म अतिशूद्र समाज की मांग जाति में हुआ था,इतिहास में मनुवादी समाज व्यवस्था ने लहु जी को कभी महत्व नहीं दिया,इसलिए इतिहास के बाबत महात्मा फुले कहते हैं कि ‘ आर्य ब्राह्मणों द्वारा लिखा गया भारत का इतिहास सच्चा इतिहास ही नहीं है,’ ब्राह्मणी इतिहास ने शूद्रों के इतिहास का नामोनिशान खत्म कर दिया है,उन्होंने उच्चवर्णियों और उनके गुरुओं के नाम पर इतिहास को बदल दिया है,
अस्पृश्यों के इतिहास को छुपाकर आर्य ब्राह्मणों का झूठा इतिहास बनाकर उनका गौरवगान किया गया है,अनायास ही आर्य ब्राह्मणों का महत्व बढ़ाया गया है,इतिहास में की गई हेराफेरी की घटनाओं के सबूत आज भी मिलते हैं,कैसी विडम्बना है कि लहुजी सालवे का नाम महामना फुले के साहित्य के अलावा कहीं दिखाई नहीं देता,
महाराष्ट्र के पुरंदर किले के नजदीक पेठ गांव में 14 नवम्बर 1794 में लहुजी का जन्म हुआ,
शिवाजी महाराज के राज्य में लहुजी के पूर्वजों ने युद्ध में अपनी स्वामीनिष्ठा और ईमानदारी के साथ कर्तव्य पालन किया,इस सेवार्थ शिवाजी महाराज ने सालवे घराने को ‘ राऊत ‘ की पदवी प्रदान की थी,शिवाजी के हिंदवी राज्य में किला संरक्षण की जिम्मेदारी मातंग समाज के शूरवीरों के ही जिम्मे थी,आज की भाषा में वह सच्चा देशभक्त घराना था,लहुजी के पिता राघोजी नरव्याघ्र के समान अत्यंत शक्तिशाली व्यक्ति थे,लेकिन पेशवा राज्य में उनका उपयोग सिर्फ हिंसक पशुओं की देखभाल के लिए किया गया ,क्योंकि अछूतों की ताकत ब्राह्मणवादियों से देखी नहीं जाती थी,वे उन्हें सेना के दूसरे पदों पर नहीं देख सकते थे,इससे उनका धर्म खतरे में पड़ जाता था.
1817 में अंग्रेजी सेना ने पूना के खड़की नामक लस्करी थाने में पेशवाओं पर आखिरी हमला किया ,जिसमें पेशवा का सेनापति बापू गोखले रणभूमि छोड़कर भाग खड़ा हुआ,राघोजी अपने मांग -रामोशी ,व्हलर आदि जातियों के कुछ साथियों को साथ लेकर अंग्रेजों से लोहा लेते रहे, लेकिन अंग्रेजों की विशाल सेना के सामने राघोजी काफी समय तक नहीं टिक सके,अंततः वह शहीद हो गए,राघोजी को मरते देखकर पूना का पेशवा बाजीराव द्वितीय युद्धभूमि से भाग निकला ऐसे शूरवीर योद्धा थे लहुजी के पिता राघोजी,लहुजी ने अपने पिता से तलवार चलाना, दांडपट्टा ,भाला फेंक , निशानेबाजी ,बंदूक चलाना , घुड़सवारी ,पर्वतरोहण , गनिमीकावा आदि कौशल का सैनिकी प्रशिक्षण प्राप्त किया था देश का संरक्षण करना उनका एकमात्र उद्देश्य था,इसलिए विदेशी आक्रमण को रोकना ही स्वातंत्रता संग्राम की शुरुआत थी वे अंग्रेजों को अपने पिता का हत्यारा मानते थे,अतः उनके विरुद्ध वे सशस्त्र युवा वर्ग खड़ा कर देना चाहते थे,सन 1822 में उस्ताद लहुजी ने पूना के शनिवारबाड़ा के गंजपेठ इलाके में पहला अखाड़ा शुरू किया,उस अखाड़े में मलखंब ,तलवार चलाना ,बंदूक चलाना, दांडपट्टा,नेमबाजी,गतकाफरी, आदि कौशल का प्रशिक्षण दिया जाता था,इस तरह लहूजी के अखाड़े में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए रणबांकुरे तैयार किये जाते थे,उस्ताद लहूजी के इसी अखाड़े से उत्पन्न भारत के अप्रातिम एक क्रांतिकारी थे-गुरु ज्योतिबा फुले..
क्रांतिकारी गुरु लाहूजी राघोजी साल्वे (14 नवम्बर 1794 – 17 फ़रवरी 1881) एक भारतीय क्रांतिकारी थे। कभी-कभी उन्हें लाहुजी वस्ताद भी कहा जाता है । लाहूजी का जन्म पुरंदर किले की तलहटी में स्थित नारायणपुर गांव के नारायण पेठे के पूर्व मंगवाड़ा में एक हिंदू मांग परिवार में हुआ था । [ संदर्भ आवश्यक ] लाहूजी ने युद्ध कला की शिक्षा अपने घर के पुरुषों से प्राप्त की थी। [ उद्धरण वांछित ] उनके पिता राघोजी साल्वे भी एक योद्धा थे। [ संदर्भ आवश्यक ]
लाहूजी के पूर्वज छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना में सेवारत थे। [ संदर्भ आवश्यक ] पुरंदर किले की सुरक्षा की जिम्मेदारी लहूजी के दादा को सौंपी गई थी। [ उद्धरण वांछित ] शिवाजी महाराज ने लाहूजी के पूर्वजों को उनकी उपलब्धियों के कारण “राउत” की उपाधि प्रदान की थी। [ संदर्भ आवश्यक ]
लाहूजी युद्ध की सभी कलाओं में निपुण थे, जिनमें भाला-विद्या, तलवारबाजी, घुड़सवारी, तोप-चालन और निशानेबाजी शामिल थी। [ संदर्भ आवश्यक ] उन्होंने देश की आजादी के लिए ‘नरम दिल नहीं बल्कि उग्र क्रांतिकारी’ तैयार करने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने 1850 ई. में युवाओं को युद्ध कला सिखाने का बीड़ा उठाया। 1822 में पुणे के रास्ता पेठ में मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया गया। [ संदर्भ आवश्यक ] सभी समुदायों के युवा इस प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण के लिए आने लगे। इनमें बाल गंगाधर तिलक , वासुदेव बलवंत फड़के , महात्मा फुले , गोपाल गणेश अगरकर , चापेकर बंधु , क्रांतिभाऊ खरे, क्रांतिवीर नाना दरबारे, राव बहादुर सदाशिवराव गोवंडे, नाना मोरोजी, क्रांतिवीर मोरो विट्ठल बालवेकर, क्रांतिवीर नाना छत्रे, महात्मा फुले के सहयोगी वालवेकर और परांजपे ने भी लहूजी साल्वे में पढ़ाई की थी। अखाड़ा. [ संदर्भ आवश्यक ]
20 जुलाई 1879 को अंग्रेजों ने वासुदेव बलवंत फड़के को उस समय पकड़ लिया जब वह ‘देवर्णवद्गा’ शिविर में सो रहे थे और उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया। 7 नवम्बर 1879 को वासुदेव फड़के को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। लहूजी के मन पर गहरा असर पड़ा। 17 फरवरी 1881 को पुणे के संगमपुर क्षेत्र में एक घर में लाहूजी साल्वे का निधन हो गया, जिससे एक महान क्रांतिकारी युग का अंत हो गया।





