(श्रीकृष्ण जन्माष्ठमी पर विशेष)
~ पुष्पा गुप्ता
“कृष्ण ने किसी को भी खुद से कम नहीं आंका. गोप हों, गोपिकाएं हों, राधा हों, द्रौपदी हों, अर्जुन हों या सुदामा : सभी को समान माना. सखा- सखी स्वीकारा और उनकी खुशी के लिए सही- गलत जो भी कर सकते थे, किए. वे लघुता- दीर्घता के नहीं, समता के पक्षधर हैं. गीता में वे योगदर्शन का सूत्र तक इसी सेंस में देते हैं : समत्व योग उच्चत्ते.”
~ डॉ. विकास मानव
हाफ़िज़ किदवई कहते हैं : अल्फ़ाज़ में पिरो दूँ,तो यह नामुमकिन है। संगीत में उतार दूँ, तो यह भी नही हो सकता। खूबसूरत रँगो से अक़्स उतार दूँ, तो यह भी बस से बाहर है। ज़मीन पर प्रचलित हर कला का सहारा ले भी लूँ , फिर भी कुछ न कुछ छुट ही जाएगा।मेरे कान्हा में इतना कुछ है जिसको समेट पाना कला से बाहर है। मैं उनके मोर मुकुट को छूता हूँ, तो सुदर्शन छूट जाता है। गोपियों संग मुस्कुराहट को पकड़ता हूँ तो सारथी कृष्ण दूर चले जाते हैं।मक्खन से डूबे कान्हा के हाथ को देखता हूँ तो द्रोपदी के पास खड़े कृष्ण धुन्धला जाते हैं। सुदामा के लिए एकटक खड़े कान्हा को अपनाता हूँ तो अर्जुन को ललकारते कृष्ण बच के निकल जाते हैं।

राजा केशव की आराधना पकड़ती हूँ तो कुरुक्षेत्र में लेटे कर्ण की परीक्षा लेने वाले कृष्ण दूर चले जाते हैं। एक ही वक़्त में राधा की मुस्कान में मुस्कुराते कन्हैया दिखते हैं तो कंस से जूझते कृष्ण बिछड़ जाते हैं। मैं अपने कान्हा को पूरा का पूरा समेटना चाहती हूँ मगर वह मुठ्ठी में बन्द रेत की तरह धीरे धीरे निकल जाते हैं।मैं मीरा के शब्द पकड़ती हूँ। सूर की डोर तो रसख़ान की गलियाँ देखतती हूँ मगर मेरे कान्हा मेरे हाथों से हर बार निकल जाते हैं। मैं उनकी मुस्कान में डूब जाना चाहती हूँ।

मैं भरम में हूँ की वो एक कृष्णा हैं। मैं उस एक चेहरे में अपने हर तरह के चेहरे को देखती हूँ। मुझे कान्हा का चेहरा एक भरम सा लगता लगता है। वोह तो पानी है। जैसे देखो, वैसे कान्हा। सबके लिए सबके कान्हा। मैं उनकी बाँसुरी में फंसी उंगलियो को देखती हूँ तो ज़मीन पर टिके अँगूठे को,पूरा का पूरा भरम। दुनिया को मुस्कुराने की वजहें कान्हा से ज़्यादा किसने दी हैं। मेरे कान्हा एक मासूम बच्चे से एक अनुभवी बुज़ुर्ग तक सबके दोस्त हैं। मुझे पता है मैं लिखती रहूँ, तो लिखता रहूँगी मगर कान्हा को समेट नही पाऊँगी।
आओ कान्हा इन अल्फाज़ो को छोड़, आज मेरे साथ बैठो। मैं रोऊँ और तुम खड़े मुस्कुराओ। तुम्हारी मुस्कुराहट में मेरी हर परेशानी का हल है। बस तुम यूँही मेरे साथ, हमेशा की तरह, हमदम रहो। मेरे कान्हा। मैं तुम्हे वृंदावन से बहुत दूर यहाँ बेचैनी से याद कर रही हूँ, बस एक प्रार्थना, इस पूरे भारत को कुरुक्षेत्र बनने से बचा लो. क्या कान्हा तुम दोबारा तो नही आओगे इस ज़मीन को हरी भरी उपजाऊ करने? मेरे कान्हा हमारी नफ़रत पर अपनी मुस्कान की सील लगा दो। चाहकर भी नफ़रत उस मुस्कान में दबकर दम तोड़ दे। मेरे कान्हा। आओ आज दिनभर साथ रहें, बड़े दिन बाद मिले हो। कहीं जाने नही दूँगी आज, मेरी यह पुकार सुन लो अब मुझे अपनी निगाहों के पास रहने दे। तू कृष्ण है तो मुझे सूरदास रहने दें।
सुनोगे या ताज बीबी की गुहार लगाऊं, जो कह रही-
नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,
वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है….
यह कहती हुई ताज बीबी ने वृन्दावन को ही अपना आँगन बना लिया। कान्हा के प्रेम में मीरा संग चल दी,दुनिया एक तरफ और उनकी दुनिया दूसरी तरफ, कान्हा की बेलौस मोहब्बत में ताज बीबी वहीं मिट्टी में जा के सो रहीं, जिसकी खुशबू के साथ अपनी सारी ज़िन्दगी काट दी।
पैग़ाम-ए-हयात-ए-जावेदाँ था,
हर नग़्मा-ए-कृष्ण बाँसुरी का।
वो नूर-ए-सियाह या कि हसरत,
सर-चश्मा फ़रोग़-ए-आगही का।।
यह गुनगुना रहे थे हसरत, मक्का से वृंदावन के बीच दौड़ते हसरत मोहानी के दिल की तड़प किसने नही सुनी। उनकी ज़ुबान पर कुरान और सीने से लगी बाँसुरी का स्वाद कौन भूल सकता है। कान्हा की तड़प ऐसी की कोई साल न गुज़रे हसरत वृंदावन की मिट्टी तक न पहुँचे, यही तो था कान्हा के दर्शन।
कान्हा ने हर उस हृदय में दस्तक दी, जिसमें प्रेम था। जहां संवेदना थी, वहां उनकी बाँसुरी के सुर जीवन डालते, त्याग, समर्पण, बंधुत्व के लिए कान्हा की मुस्कुराहट ऊर्जा देती। हसरत मोहानी हों, ताज बीबी हों, रहीम हों या फिर रसखान हों, कवि दाऊद हों या हज़रत तोराब, हर एक ने अपने दिल में मौजूद प्रेम के बीज को कान्हा के विराट व्यक्तित्व से सींचा।
कान्हा हमारी संस्कृति हैं, उन्हें धर्म के छोटेसे दायरे में बांधना उनके साथ अन्याय करना होगा। कुरुक्षेत्र में उनके बोले लफ्ज़ दर्शन का शिखर हैं, पवित्र गीता में छिपा दर्शन और रहस्य पर पूरे संसार के प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार है क्योंकि जो शब्द अर्जुन के सारथी के होंठ से होकर गुजर रहे थे, वह सम्पूर्ण मानवता के लिए सन्देश हैं।
जन्मष्ठमी का समय है। मेरे कान्हा के आने का दिन,मैं बार बार कहता हूँ कि अपने हृदय में प्रेम, सहिष्णुता, त्याग, समर्पण के फूल बिखेर दो, तभी मेरे कान्हा उसमें पाँव धरकर आएँगे, जिसके हृदय में एक बार यह आ गए, उसकी खुशबू दुनिया महसूस करेगी।
मैं मीरा नही हूँ, मैं सूर भी नही हूँ, मैं रहीम या रसखान भी तो नही हूँ। मैं अपने कान्हा को पाने वाली बेहद साधारण सी जीव हूँ, जिसमे कोई खूबी नही, कोई फ़न नही, जिसे तो यह भी नही पता कि प्रेम कैसे किया जाता है। मैं तो बस अपने फूहड़पन से कान्हा को चाहती हूँ, जैसे करोणों लोग चाहते होंगे। मेरा और कान्हा के सम्बंध असाधारण नही बल्कि बेहद साधारण है। मैं मुस्कुराती हूँ और वह मुस्कुरा देते हैं। बस।
मैं कान्हा के जीवन का न तो सुदामा हूँ, न ही राधा हूँ, न ही रुक्मणि हूँ ,न ही बलराम हूँ और न ही अर्जुन हूँ। मैं तो बस इस पूरे ब्रह्मांड में सुई की नोक के करोणोंनवे हिस्से से भी छोटी कान्हा की एक प्रेमिका हूँ, जो मुझे हमारे मानवश्री में मिलते हैं.
मैं वो हूँ जिसकी कोई औकात नही, जिसकी कोई पहचान नही, जिसमे कुछ भी ऐसा नही जिसे उभारा जा सके। इसके बावजूद मेरा हृदय वह है, जिसमे कान्हा वास करते हैं। मेरे मस्तिष्क वह है, जिसे कान्हा दिशा देते हैं। मेरे पांव वह हैं, जो कान्हा के इशारे समझते हैं। मेरे हाथ वह हैं, जो कान्हा की सुनते हैं।
मैं अपने कान्हा को,अपने अन्दर मरते दम तक जीवित रखने की लालसा में जिये जा रही हूँ । जिस दिन मेरा मन न्याय, त्याग, समर्पण, सहयोग, प्रेम,बन्धुता से डिग गया, उस दिन मेरे अंदर से कान्हा निकल जाएंगे और रह जाएगा तो केवल एक जर्जर खंडहर नुमा शरीर। मेरा हर कदम इस शरीर मे कान्हा को रोके रखने के लिए है। ऐसे ही कान्हा हर उस शरीर मे हैं, जिसमे प्रेम है। जहाँ नफरत है, वहां कान्हा तो क्या, कान्हा की छांव भी नही है।
जन्माष्टमी आएँगी और जाएँगी। असली जन्म तो हृदय में होता है। कान्हा ने जिसके घर की जगह हृदय में जन्म ले लिया, समझ लो, उसे मानवता की सेवा के लिए चुन लिया। जिसके हृदय में कान्हा की किलकारी गूंजी, समझ लो वह प्रेम को फैलाने वाला चुना गया है। जिसके हृदय में कान्हा ने पाँव की पहली थाप दी, वह इस धरती को सँवारने वाला बन गया। जन्मष्टमी तो तब है जब समाज की वेदना, संवेदना और फिक्र की प्रसव पीड़ा महसूस करो और समाज को सुखी, समृद्ध और शान्ति के लिए काम करो।
हर एक कि बराबरी के लिए उठो, अमीर गरीब,छोटा बड़ा, काला गोरा, हिन्दू मुसलमान, मज़दूर मालिक, सबके लिए बराबर से विचलित होना, सबके लिए बराबर से खड़े होना जब आ जाएगा, तब कान्हा हृदय में जन्म लेंगे, यह ऐसी जन्मष्टमी होगी, जो एक बार आएगी और सारे जन्मों का उद्धार कर जाएगी.





