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ज्ञान-विज्ञान के नए द्वार खोलती है भाषा, इंसानी रिश्तों की बुनियाद बनती है भाषा

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डा. सलमान अरशद

भाषा के भसड़ में एक बात कहना ज़रूरी समझता हूँ। देश और दुनिया की जितनी भी भाषाएं सीख सकते हैं, सीखिए, भाषा ज्ञान-विज्ञान के नए द्वार खोलती है, इंसानी रिश्तों की बुनियाद बनती है, इसके  साथ ही आप जहाँ पैदा हुए हैं वहां की भाषा और बोलियों को बचाने की भी कोशिश कीजिये। भारत की अनेक बोलियाँ और भाषाएं संकटग्रस्त हैं और सियासत इनको बचाने और बढ़ाने में आड़े आ रही है। 
भारत एक ऐसी सियासत की गिरफ्त में जकड़ता जा रहा है जिसके पास तबाही के प्रोग्राम तो हैं लेकिन सृजन का कोई प्रोग्राम नही है। ऐसे में नागरिक के रूप में ये जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। 
2014 के बाद जब मुसलमानों को सताना देशभक्ति का पैरामीटर बन गया तो मैंने नोकरी छोड़ी और देश के बाहर नोकरी पाने की कोशिश की। कई तरह के अनुभव हुए, उनमें से एक शेयर कर रहा हूँ। 
एक अंतराष्ट्रीय NGO में अप्लाई किया, 4 राउंड के साक्षात्कार में तीन क्लियर हो गए लेकिन चौथा राउंड क्लियर नहीं हुआ। इसमें एक महिला ने लंदन से मुझसे बात की थी। 45 मिनट की बातचीत के बाद भी मुझे सिर्फ इसलिए रिजेक्ट किया गया कि मेरी इंग्लिश उतनी ठीक नही है जितनी कि यूरोप में काम करने के लिए ज़रूरी है। 
मेरी पूरी पढ़ाई सरकारी स्कूल और यूनिवर्सिटीज में हुई है। मैंने देश के तीन यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई की है और ठीक ठाक छात्र रहा हूँ। मेरे लेख और शोध पत्र खूब छपे हैं। लेकिन आज के बाज़ार में मैं अनफिट हूँ। सिर्फ इसलिए कि अच्छी अंग्रेज़ी नहीं जानता। 
ग्रेजुएशन के बाद मैंने अंग्रेज़ी सीखी, ये बस काम चलाऊ है, ये सीखना भी इसलिए हुआ कि आज भी बढ़िया किताबें इंग्लिश में ही मिलती हैं। 
इसलिए जितनी भाषाएं सीख सकते हैं, सीखिए, लेकिन बाज़ार की भाषा ज़रूर सीखिए। पिछली सदी में चाइना ने अंग्रेज़ी सीखने पर बहुत ज़ोर दिया आज दुनिया के बाज़ार में उनका दबदबा है। 
भाषा सिर्फ भाषा होती है, न अपनी न पराई, न दिव्य न निकृष्ट, राजनेताओं और नफरती एजेंटों से बचिए। सारे नेताओं, अफसरों और व्यवसायियों के बच्चे विदेश में पढ़ते हैं या देश के ही ऐसे स्कूलों में जो हर लिहाज़ से बेहतरीन होते हैं। 
पश्चिमी सभ्यता और ईसाई धर्म को कोसने वाले मध्यवर्ग के बच्चे कान्वेंट में पढ़ते हैं वो भी डोनेशन दे कर। हिन्दी जिसे देश पर थोपने की कोशिश हुई वो बाजार की भाषा नहीं बन पाई इसलिए तेज़ी से ख़त्म हो रही है। उर्दू जिसे मुसलमानों की भाषा बताकर मिटाने की कोशिश हुई, वो मिट रही है लेकिन हिन्दी की मज़बूरी है कि उर्दू के बिना चल नहीं सकती, इसलिए जब तक हिन्दी ज़िन्दा है उर्दू भी मरेगी नहीं। 
हम तो बस भाषा की सियासत से दूर रहें, यही हम सब के व्यापक हित में है। आज जब मुसलमानों से नफरत सियासत और सत्ता का प्राथमिक काम बन गया है तो इस नफरत से ख़ुद को बचा लेना ही बहुत बड़ी उपलब्धि होगी, हलांकि ऐसा होता हुआ दिखाई दे नहीं रहा है। 
Dr. Salman Arshad

Ramswaroop Mantri

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