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इला भट्ट की पुस्तक ‘महिलाएं, काम और शांति’ का लोकार्पण

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आशा पटेल

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के प्रमुख रामबहादुर राय ने कहा कि प्ररुयात सामाजिक कार्यकर्ता और सेवा की संस्थापक इला भट्ट की पुस्तक ‘महिलाएं, काम और शांति’ भाषणों का संकलन है लेकिन इसमें सिर्फ बोले हुए शब्द नहीं है। समाज के साथ दशकों तक जुड़े रहने से मिले अनुमवों का निचोड़ है। ये अनुभव उत्तने ही गहन और व्यापक है जितना कि हमारा आकाश।

गांधीजी और कस्तूरबा जो प्रयोग महिलाओं के बीच करना चाहते थे, उसे इला भट्ट ने महिलाओं के बीच कर दिखाया और आगे बढ़ाया। इस पुस्तक में सिर्फ भारतीय महिलाओं की चिंता नहीं है, बल्कि1977 में इला भट्ट के साथ अपनी पहली मुलाकात को याद किया और बताया कि कैसे वह पल उनकी जिंदगी की दिशा तय करने में अहम साबित हुआ। इला भट्ट के विजन और कमिटमेंट से प्रेरित होकर उनके साथ काम करने के लिए अमेरिका में अपनी पी. एच.डी अधूरी छोड़कर भारत लौटने का उन्होंने फैसला किया।

सेल्फ-एम्प्लॉयड विमेंस एसोसिएशन (सेवा) की बुनियादी सोच पर उन्होंने कहा कि विचार काम और मूल्य इसके मुख्य सिद्धांत थे जिसमें काम को हमेशा सबसे आगे रखा गया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इला बेन (बेन गुजराती संबोधन) का पक्का मानना था कि गरीबी खुद एक तरह की हिंसा है। कामगार महिलाओंबनाए। उन्होंने बताया कि 2022 में जब सेवा ने 1972 में अपनी स्थापना के 50 साल पूरे किए तो इला भट्ट ने अपने भाषण में कहा था कि अपने सिद्धांतो पर चलते हुए सेवा को आगे के पचास साल भी पूरे करने हैं। गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलनायक और एक एक्टिव सोशल वर्कर सुदर्शन आयंगर ने रहीम के एक दोहे से शुरुआत की जहाँ काम आवे सुई. कहीं करे तलवार। उन्होंने समझाया कि सुई चुभ सकती है लेकिन वह ठीक करने के लिए ही ऐसा करती है। नरमी कमजोरी नहीं है। यह एक हुनर और ताकत है। उन्होंने कहा कि औरतें अक्सर अपने समय से आगे रही हैं।

अपनी भूमिका में लिखती कि भाषणों को पढ़ते हुए समझ आया कि उनके कई विचार और अवधारणाएं दीर्घकाल तक प्रभावी रहने वाली हैं। अभी से वैश्विक स्तर पर उनकी प्रासंगिकता बढ़ रही है। उनके कई विचार उनके समय से आगे के थे। अब उन्हें महत्व मिलेगा। उन्हें लागू किया जाएगा। इसलिए निश्चित रूप से वह समय आ गया है जब उनकी अवधारणाओं को और अधिक लोगों तक ले जाया जाए ताकि वे इन शोध कर सकें। उनका विस्तार करवे जान रही थीं कि पूंजीवाद अभी अपने और क्रूर रूप में सामने आएगा और संगठित व असंगठित क्षेत्र के बीच संघर्ष और तीखे होंगे और तब यह पुस्तक सेवा बहनों को अपने व दूसरों के लिए रास्ता दिखाएगी। आज जिस तरह पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं उलट-पुलट हो रही हैं और कुछ बड़े देश छोटे देशों को पूरा निगल ही रहे है. युद्धों की विभिषिका से सारी मानवता लहूलुहान है, कह सकते हैं कि उनकी परेशानियां ऐसे ही नहीं थीं।

पुस्तक में उनकी जो अवधारणाएं मुख्य रूप से एक धारा में दिखाई देती हैं वे है-मूल्यजनित संगठन व सहकारिता, 100 मील का सिद्धांत और संपोषक अर्थव्यवस्था। इसे वे शांति की अर्थव्यवस्था भी कहती थीं। पुस्तक में आप पाएंगे कि किस तरह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने विनम्र पर दृढ़ लहजे में वे एक एक कर वैश्वीकरण, और पूंजी एकत्रीकरण से निकले पूंजीगत विकास को समाज, मानव और प्रकृति विरोधी बताते हुए स्थानीय सामुदाय आधारित और प्रकृति समन्वित विकास जिसके केंद्र में महिलाएं और उनका काम है और जो संपोषित अर्थव्यवस्था की वाहक है, के महत्व को स्थापित करती चली जाती हैं।

रामबहादुर राय महिलाएं, काम और शांति’ पुस्तक के लोकार्पण समारोह में उन्होंने कहा, यह बहुत महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, इस अर्थ में कि अगर आपको अंधेरे से बाहर निकलना है. आप रोशनी की तलाश में हैं, तो यह पुस्तक टॉर्च की तरह, रोशनी की तरह, सूरज की किरण की तरह काम करेगी।

कार्यक्रम का आयोजन इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के कलानिधि विभाग ने किया था। पुस्तक इला भट्ट की अंग्रेजी पुस्तक दूमैन, वर्क एंड पीस का हिंदी अनुवाद है। अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार नीलम गुप्ता ने किया है। नवजीवन ट्रस्ट ने प्रकाशन किया है।

रेनाना झाबवाला जो इला भट्ट और सेल्फ-एम्प्लॉयड विमेंस एसोसिएशन (सेवा) की नेशनल कोऑर्डिनेटर के रूप में महिलाओं को मजबूत बनाने और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने में बिना थके कामको काम गरीबी से बाहर ला गरिमा दिलाता है। उन्होंने मुख्य धारा के आर्थिक ढांचों के साथ जुड़ने की अहमियत पर जोर दिया।

इला भट्ट की कार्यशैली में समाहित पारिस्थितिक चेतना को उन्होंने झाडू के जीवन चक्र के माध्यम से दर्शाया। एक ऐसी प्रक्रिया जो प्राकृतिक है निरंतर है और स्वयं को पुनर्जीवित करने वाली है। झाडू कैसे जमीन से निकली घास से बनता है और जब उसका काम खत्म हो जाता है तो उसे जानवरों को खिला दिया जाता है। बारिश आने पर फिर वह नई घास बनकर हमारे सामने आ जाता है। यानि कि प्रकृति से निकला उसी में समाया और फिर उसी में से नया रूप ले बाहर आ गया। यह प्राकृतिक है निरंतर है और पुनर्जीवित होने वाला इला भट्ट के रोजमर्रा के काम में शामिल पारिस्थितिकीय (इकोलॉजिकल) सोच का एक उदाहरण है।

उन्होंने गुजरात दंगों समेत मुश्किल समय के बारे में सोचा और बताया कि कैसे महिलाओं ने धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर मिलजुल कर आपस में

लेखिका और जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित रजनी बख्शी ने कहा कि महात्मा गांधी के अहिंसा के दर्शन को केवल एक नैतिक या राजनीतिक रणनीति के रूप में नहीं बल्कि सभ्यता के एक आधारभूत सिद्धांत के रूप में समझा जाना चाहिए। एंथ्रोपोलॉजी से समानता दर्शाते हुए उन्होंने मार्गरेट मीड के विचारों का जिक्र किया जिन्होंने 1500 साल पुराने एक मानव जीवाश्म, जिसकी टूटी हुई बांह की हड्डी ठीक हो चुकी थी को सभ्यता के प्रतीक के रूप में पहचाना था। उनके अनुसार यह इस बात का सबूत था कि किसी ने संकट के समय रुककर दूसरे व्यक्ति की देखभाल की थी। इस आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि हिंसा का कोई सभ्यतागत आधार नहीं है और मानव इतिहास में करुणा और देखभाल आक्रामकता से पहले आती हैं।

किताब की अनुवादक पत्रकार और लेखिका नीलम गुप्ता ने बताया कि पुस्तक इला मह के लिखे हुए निबंधों का नहीं उनके भाषणों का संग्रह है। पुस्तक में उनके देश दुनिया में दिए गए ऐसे 27 भाषण हैं जो इन पचाससके। इसके लिए जरूरी था कि पुस्तक हिंदी में भी आए। पर नीलम गुप्ता के अनुसार इला भट्ट इस पुस्तक को हिंदी में इसलिए देखना चाहती थीं कि इस पुस्तक में आए अपने विचारों अनुभवों और अवधारणाओं को सेवा की 25 लाख से भी अधिक उन बहनों तक पहुंचा सके जो सेवा सिद्धांतों व मूल्यों पर चलते हुए सामाजिक व आर्थिक रूप से न केवल खुद आत्मनिर्भर हुई है. समाज व प्रशासन को भी नई दिशा दे रही हैं। वे जानती थीं कि अगर विकास को अहिंसक, समन्वित, समावेशी व टिकऊ बनाना है तो जरूरत पड़ने पर जमीन पर समुदायों के बीच काम कर रही उनकी असंगठित क्षेत्र की इन बहनों के लिए यह पुस्तक मार्गदर्शक होगी। वे अक्सर कहती थीं कि उनके विचार व अवधारणाएं बहनों के साथ काम करते हुए और उन्हीं के बीच से निकलकर आए हुए हैं। पर वे लगातार यह भी अनुभव कर रही थीं कि दुनिया तेजी से बदल रही है। पूंजीगत अर्थ व्यवस्थाओं और असंगठित क्षेत्र के बीच टकराव लगातार तीखा होता जा

नीलम गुप्ता ने बताया कि अप्रैल 2022 में सेवा के पचास साला समारोह के समय हुई मुलाकात में इला भट्ट ने खुद ही उन्हें अपनी किताब ‘वीमेन, वर्क एंड पीस का हिंदी में रूपांतरण करने के लिए प्रतिबद्ध कर दिया था। नवंबर 2022 में वे पंचतत्व में लीन हो प्रकृ ति के साथ एकाकार हो गई। उनके बेटे मिहिर भट्ट ने अनुवाद के काम को पूरा करवाने की जिम्मेदारी ली। लोकार्पण समारोह में नीलम गुप्ता ने किताब की पहली प्रति इला भट्ट को समर्पित की और एक थाती के रूप में उसे सेवा भारत की नेशनल कोआर्डिनेटर रेनाना झाबवाला को सौंप दिया। रेनाना शुरू से ही इला भट्ट के साथ काम में जुटी रहीं हैं उनके काम और विजन को गहराई से समझती है। उन्होंने इमोशनल होकर कहा इला बेन, आखिर आपने यह काम मुझसे करवाया ही लिया।

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के कलानिधि विभाग के प्रमुख प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि यह किताब महिलाओं के काम् सोशल जस्टिस और शांति पर एक जरूरी और सोबने पर मजबूर करने वाली बहस को निमंत्रण देती है। आज का समाज महिलाओं की एक्टिव भूमिका को तेजी से पहचान रहा है और मान रहा है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहा है।

Ramswaroop Mantri

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