डॉ. विकास मानव
मानव जीवन की तीन परतें हैं।
पहली परत से तीसरी परत की यात्रा करना ही सारी आध्यात्मिक खोज की साधना है। जो तीसरा है, वह न देह है, न मन है और न तो है पदार्थ ही। वह सबसे भिन्न है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या उस तीसरे की झलक हम पा सकते हैं और उसकी अनुभूति कर सकते हैं? तो उत्तर है कि बिल्कुल कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए प्रयत्न और पुरुषार्थ आवश्यक है।
भोजन करते समय एक क्षण के लिए यह देखने का आप प्रयत्न करो कि भोजन शरीर के भीतर जा रहा है। भोजन क्षर है और शरीर भी क्षर है। एक क्षर दूसरे क्षर में प्रवेश कर रहा है।
मगर कैसे?
एक क्षर को दूसरे क्षर में पहुंचा रहा है, वह कौन है?
वह अक्षर आत्मा का कर्ता रूप मन है। यदि आत्मा की उपस्थिति न हो तो शरीर न भोजन करेगा और न तो उसे पचा सकेगा। यह काम शरीर मन की ऊर्जा से आत्मा की उपस्थिति में करता है। भूख शरीर को लगती है लेकिन भूख का अनुभव जिसे होता है, वह मन है और जिसकी उपस्थिति में होता है, वह साक्षी आत्मा। आत्मा न हो तो न तो शरीर को भूख लगेगी, न उस भूख का अनुभव इंद्रियों के स्वामी मन को ही होगा।
भूख और भूख की प्रतीति दो तल हैं। क्या हम तीसरे की खोज कर सकते हैं जो तटस्थ भाव से सब कुछ देख रहा है। प्रयत्न करो, पुरुषार्थ करो, तीसरा स्पष्ट हो जाएगा।
कोई भी अनुभव हो, कोई भी घटना हो. उसमें तीन की उपस्थिति अवश्य रहेगी। यह संसार, यह जगत भी तीन आयामी है। इसलिए ‘त्रिक’ का दर्शन सर्वत्र होगा।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश : यह त्रिक है। सत, रज, तम : ये त्रिक है।
सत्यं, शिवं, सुंदरम : यह त्रिक है. महासरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाली : यह त्रिक है। जागृत, स्वप्न, सुसुप्ति : यह त्रिक है। गर्मी, वर्षा, जाड़ा : यह त्रिक है. Bबाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था : ये त्रिक है। प्रातः, मध्याह्न, सायं : ये भी त्रिक है।
कहने का मतलब है कि सर्वत्र त्रिक का ही अस्तित्व है इस त्रिआयामी जगत में। त्रिक के अभाव में कोई भी अनुभव निर्मित नहीं हो सकता।
लेकिन जो तीसरा है, वह गुप्ततम है। उसके प्रति हमारी
जितनी संवेदना रहेगी, उतनी ही हमें उसकी प्रतीति होगी।
प्रतीति ही एक दिन अनुभूति में बदल जाती है। प्रतीति में बोध है और अनुभूति में आत्मा-परमात्मा का ज्ञान।





