एक इतिहास चुपके से रच गया। लहू का एक कतरा बहे बिना जम्मू-कश्मीर में आठ चरणों का कोई चुनाव संपन्न हो जाना अजूबा सा लगता है, लेकिन पंचायतों के बाद जिला विकास परिषद के चुनाव में भी यह हो गया। इसके साथ ही इस केंद्र शासित प्रदेश में तीन स्तरीय पंचायत प्रणाली भी अस्तित्व में आ गई। पूर्ण राज्य के दर्जे वाले जम्मू-कश्मीर में यह नहीं थी। मतदान भी 50 प्रतिशत से ज्यादा हुआ। कोई गड़बड़ी भी नहीं। बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो इस सदी में इससे पहले नहीं हुआ था। इस चुनाव में पाकिस्तानी शरणार्थियों और वाल्मीकि समाज को भी मतदान का अधिकार मिला। यदि कश्मीरी पंडितों का मतदान प्रतिशत भी बढ़ जाता, तो तस्वीर और भी बदल सकती थी। भविष्य का एहसास कराता सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह है कि कश्मीर घाटी में अब तक हुए किसी भी चुनाव में पहली बार भाजपा का खाता खुला है। एक महिला वकील समेत तीन भाजपा प्रत्याशियों ने घाटी में जीत दर्ज की।
नतीजों का समीकरण भी बड़ा दिलचस्प है। पहलगाम के अरमान अली कहते हैं कि डीडीसी के नतीजे तो मोनालिसा की तसवीर की तरह हैं। हर कोण से सबको गदगद करने वाले। भाजपा खुश है कि घाटी में खाता खुलने के साथ-साथ वह 74 सीटों के साथ प्रदेश में सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है। सात दलों का गुपकार गठबंधन भी खुश है कि उसने 110 सीटें जीत लीं और 20 में से 13 जिला विकास परिषदों पर उसका कब्जा लगभग तय है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद हुए इन पहले चुनावों पर भाजपा का दावा है कि अवाम ने फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र रैना कह रहे हैं कि पब्लिक को गुपकार कुबूल नहीं है और अब कश्मीर खित्ता भी हमारे साथ है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती का दावा है कि जनता ने जता दिया है कि यह फैसला उसे रास नहीं आया। 370 की बहाली की लड़ाई में जनादेश हमारे साथ है। फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाले गुपकार गठबंधन में भी पार्टी के तौर पर पीडीपी (27 सीटें) कमजोर हुई है। भाजपा के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस 67 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। 26 सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस कुछ कहने की स्थिति में न थी, न है। चार सीटों के नतीजे अभी आने हैं।
चरमपंथियों का पूरी प्रक्रिया में हाशिए पर रहना साबित करता है कि जनता उनका खेल समझ चुकी है। इस बार तो वे धमकाने की भी हिम्मत नहीं कर सके। निर्दलीयों की बंपर जीत (49 सीट) भी चौंकाती है। यह बताती है कि जिन्हें न भाजपा पसंद थी न गुपकार, वे भी चाह रहे थे कि निजाम चले। पीडीपी से अलग होकर जम्मू-कश्मीर में अपनी पार्टी बनाने वाले अल्ताफ बुखारी भी 12 की संख्या तक पहुंचने में कामयाब हो गए। माना जा रहा है कि वह भाजपा से करीबी बढ़ा सकते हैं। वैसे भी कश्मीर में एक क्षेत्रीय दल हमेशा से ऐसा रहा है, जिस पर किसी राष्ट्रीय दल का हाथ रहता है। इस बार यह भूमिका उनकी पार्टी निभा सकती है।
भाजपा ने जहां जबरदस्त होमवर्क के साथ अपना सर्वस्व झोंक दिया था, वहीं गुपकार के घटक दल अपने अंतर्विरोधों से ही नहीं उबर सके। इसके बावजूद यह गठबंधन सबसे ज्यादा जिलों में अपना परचम लहराने में कामयाब रहा है। यह भी दिलचस्प है कि सबसे ज्यादा सीटें जीतकर भी गुपकार को 3.94 लाख वोट मिले, जबकि भाजपा को 4.87 लाख।
हिंसा के बिना और भारी जन-भागीदारी के साथ हुए इस चुनाव का जो संदेश है, उसे समझने के लिए कश्मीर के हालात को समझना बहुत जरूरी है। लगभग एक दशक होने को आया, घाटी में सब कुछ तकरीबन ठप है। इस दौरान जन्मे और स्कूल जाने की उम्र में आ जाने वाले हजारों नौनिहालों को तो यही नहीं पता कि स्कूल होता क्या है। बाजार बंद पड़े हैं। घाटी की लाइफ-लाइन, यानी सैलानियों की आमद न के बराबर है। कुछ कसर बाकी रह गई थी, तो कोरोना ने पूरी कर दी। सियासत और दहशतगर्दी के एजेंडे ने भी खूब बर्बाद किया। पूरी घाटी में एक भी सिनेमाघर नहीं है। इंटरनेट ज्यादातर तो चलता ही नहीं और चलता भी है, तो लंगड़ाकर। इसी दौरान जिन प्रतिभाओं ने पढ़ने, खेलने या सिनेमा में मकबूलियत पाई, उन्होंने भी जिन-तिन वजहों से अपनी राह बदल ली। न पढ़ाई, न कमाई और न ही मनोरंजन। आदमी करे, तो करे क्या? खाली रहेगा, तो शैतान तो दिमाग में घुसेगा ही। ऐसे ही कश्मीर कई सालों से ठहरा हुआ है।
एक पीढ़ी के सपने मर चुके हैं और नई पीढ़ी ने यह जाना ही नहीं कि सपने होते क्या हैं। ऐसे में, सबसे जरूरी यह है कि यह ठहराव टूटे। इसमें कोई हलचल हो। जिंदगी चले, तो सही। चलेगी जिंदगी, तभी तो आगे बढे़गी। इसलिए इस बार कश्मीरी अवाम ने यह साफ कर दिया है कि बस अब और नहीं। आप कुछ भी करें, लेकिन हमारी जिंदगी में गति लाएं। प्रगति से भी पहले गति की जरूरत है। इसी चाहत ने उसे घर से निकलकर पोलिंग बूथ तक पहुंचाया। आतंकियों और उनके हिमायतियों को बिलों में रहने के लिए मजबूर कर दिया।
मतदाताओं ने अपना काम पूरा किया। अब बारी राजनीतिक दलों की है। सबसे ज्यादा जिला विकास परिषदों पर काबिज गुपकार गठबंधन और सबसे ज्यादा सीटों पर काबिज भाजपा ने जो दावे और वादे किए हैं, उन पर उन्हें खरा उतरना ही होगा। गौर कीजिए, कश्मीर की प्राथमिकताएं जम्मू से बिल्कुल जुदा हैं। जम्मू के लोग देशव्यापी बहसों का हिस्सा बनते हैं। बाहरी मुद्दों में उनका मन भी लगता है, लेकिन कश्मीरियों के लिए यह मुमकिन नहीं है। उनकी पीढ़ियां तबाह हो रही हैं। उन्हें सबसे पहले तो ऐसा निजाम चाहिए, जो स्कूल, बाजार और सरकारी दफ्तर खुलवा सके, जो सैलानियों को वापस ला सके। जो बेखौफ होकर सड़कों पर निकलना संभव कर सके। जाहिर है, इस काम को स्थानीय संस्थाएं ही बेहतर ढंग से अंजाम दे सकती हैं।
नतीजों से इतना तो साफ है कि अनुच्छेद 370 अहम मुद्दा नहीं था। इसे लेकर स्थानीय लोगों के मन में संशय तो है ही। भाजपा तमाम कोशिशों के बाद भी इसे दूर नहीं कर पाई, लेकिन सिर्फ इसी कारण भाजपा को नकारा भी नहीं गया। इतना संदेश तो गया ही कि जनजीवन को पटरी पर लाने के लिए तंत्र को रास्ता देना ही होगा। बम, बारूद और पत्थर अब कुबूल नहीं।




