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लोहिया और जयप्रकाश का गैर-कांग्रेसवादी समाजवाद

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समाजवादी धारा की राजनीति की जब भी चर्चा होती है, तो इस आंदोलन के दो पितृ पुरूषों का नाम अनायास जेहन में आ जाता है। डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण। ये दोनों आधुनिक भारतीय समाजवादी आंदोलन के उत्सव पुरूष रहे हैं। आजादी के बाद भारतीय राजनीति में मोहभंग की जो स्थिति उभरी, उस मोहभंग की व्याख्या और वैसे माहौल में भावी भारत का नया सपना दिखाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उस समाजवादी आंदोलन की रही, जिसके पहले अगुआ डॉक्टर राममनोहर लोहिया थे। लोहिया के निधन के ठीक छह साल बाद आजादी के सपनों के मोहभंग का विस्तार हुआ तो उस समाजवादी डोर को थामने वह जयप्रकाश आ गए, जो कभी कांग्रेस समाजवादी दल में लोहिया के सहयोगी थे, लेकिन बाद के दिनों में विनोबा के रचनात्मक आंदोलन सर्वोदय से जुड़ गए थे।

1948 तक कांग्रेस का हिस्सा थे लोहिया

1962 के आम चुनाव आते-आते स्वप्नदर्शी नेहरू की नीतियों से देश के पढ़े-लिखे तबके का मोहभंग होने लगा था। बेशक तब तक भारतीय राजनीति की मुख्यधारा की पार्टी कांग्रेस ही थी, तब तक उसमें सक्रिय नेताओं में आजादी के आंदोलन के दौरान गढ़े और स्वीकार किए गए राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मूल्य जिंदा थे। हालांकि उन्हीं दिनों कांग्रेस में वंशवाद की बेल रोपी जा चुकी थी। स्वप्नदर्शी नेहरू के होने के बावजूद भारतीय आम जीवन में जैसा गुणात्मक बदलाव आना चाहिए था, नहीं आ रहा था। ऐसे माहौल में नेहरू की नीतियों के तीक्ष्ण विरोधी के रूप में राम मनोहर लोहिया उभरे, जो 1948 तक उसी कांग्रेस का हिस्सा थे, जिसकी नुमाइंदगी और नेतृत्व नेहरू कर रहे थे। 1962 के आम चुनावों तक लोहिया की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से चढ़ा। तब उन्होंने प्रधानमंत्री को खुद उनके निर्वाचन क्षेत्र उत्तर प्रदेश के फूलपुर में जोरदार चुनौती दी। हालांकि लोहिया नाकाम रहे। इसके बाद उन्होंने मनन किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि कांग्रेस को चुनौती देने के लिए विपक्षी दलों को साथ आना होगा।

उनकी यह सोच बाद में गैरकांग्रेसवाद के रूप में जानी गई। लोहिया के जमाने से गैर-कांग्रेसवाद भारतीय राजनीति में कांग्रेस विरोध की प्रमुख धुरी रहा है। लेकिन हाल के दिनों में गैर-कांग्रेसवाद का तानाबाना बिखरने लगा है। केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के उभार के बाद गैर-कांग्रेसवाद की बुनियाद में किंचित अंतर आया है। लोहिया के गैर कांग्रेसवाद में समाजवादी विचारधारा के दलों के साथ तत्कालीन भारतीय जनसंघ भी था। इसका असर 1967 के चुनावों में दिखा भी, जब भारतीय राजनीति में अजेय समझी जाने वाली कांग्रेस की नौ राज्यों की सरकारों का सफाया हो गया। उत्तर प्रदेश, बिहार समेत नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी संविद सरकारें बनीं। इसके बाद से भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसवाद एक मजबूत राजनीतिक सिद्धांत के रूप में स्थापित हो गया।

भाजपा ने बनाई रखी दूरी

बाबरी विध्वंस के बाद गैर-कांग्रेसवाद की बुनियाद थोड़ी दरकी। भारतीय जनसंघ के परवर्ती रूप भारतीय जनता पार्टी से समाजवादी धारा के दलों ने किंचित दूरी बनाई। लेकिन 1998 आते-आते एक बार फिर गैर-कांग्रेसवाद का सिद्धांत तेजी से स्थापित हुआ। भारी भ्रष्टाचार और बिहार की अराजकता के आरोप की वजह से लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल कांग्रेस के साथ ज्यादा जुड़ा रहा। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी, गैर-कांग्रेसवाद का दामन कभी थामती रही तो कभी छोड़ती रही। हालांकि गैर-कांग्रेसवाद के साथ भारतीय जनता पार्टी से भी उसने कम से कम खुले तौर पर अपनी दूरी बनाए रखी। अन्यथा समाजवादी धारा की चाहे बाकी सभी पार्टियां मसलन बीजू जनता दल, इंडियन नेशनल लोकदल, जनता दल सेक्युलर, रामकृष्ण हेगड़े की लोकशक्ति पार्टी, समता पार्टी और जनता दल यू गैर-कांग्रेसवाद के सिद्धांत से जुड़े रहे और कांग्रेस के साथ जाने से परहेज करती रहे। 1998 से 2004 तक भारतीय जनता पार्टी के साथ भी रहीं। मुलायम सिंह यादव कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ खुलकर सामने नहीं आए, लेकिन 1999 में उन्होंने कांग्रेस को समर्थन ना देने का जो दांव मारा, और सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने को जिस तरह से तोड़ा, गैर-कांग्रेसवाद का उससे बड़ा दूसरा उदाहरण कम ही होगा।

विभाजन के बाद मिला कम्युनिस्ट पार्टियों का सहयोग

1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी के साथ कम्युनिस्ट पार्टियों का जो सहयोग-संबंध शुरू हुआ, वह लगातार जारी रहा। बीच के 1989 से 1991 के दौर को छोड़ दें तो कांग्रेस के साथ वामपंथी दलों का सहयोग बना रहा। 1998 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक कांग्रेस की सरकार आई तो कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ कांग्रेस का गठजोड़ कुछ ज्यादा ही बढ़ा। यही वह दौर है, जब भारतीय परिदृश्य में स्वयंसेवी संगठनों का प्रसार बढ़ा। हालांकि उनमें ज्यादातर वामपंथी विचारधारा से ही प्रभावित थे। धार्मिक, जातिवादी, जेंडर से जुड़े मुद्दों को उठाकर भारतीय समाज को बुराईयों की खान बताने के बहाने ज्यादातर एनजीओ की भूमिका प्रकारांतर से वाम वैचारिकता को बढ़ावा देना ही रही। भारतीय परिदृश्य में वाम वैचारिकता को आगे बढ़ाने में इनका योगदान तो बढ़ा ही, कांग्रेस से नजदीकी भी बढ़ी। इस नजदीकी का फायदा यह हुआ कि हर मंच पर वाम वैचारिकता जहां कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश में जुटी रही, वहीं कांग्रेस और उसका प्रथम परिवार भी एनजीओ संस्कृति को बढ़ावा देने में रूचि लेता रहा है। इसके कारण एनजीओ संस्कृति ने भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर नरेंद्र मोदी विरोध पर अपना ध्यान केंद्रित रखा।

कांग्रेस ने 6 साल में 3 CM बदल दिए थे” कांग्रेस में अपने राजनीतिक भविष्य की खोज लेकिन हाल के दिनों में एक विशेष बदलाव दिख रहा है। अब कांग्रेस की बात वह समाजवादी धारा कहीं ज्यादा कर रही है, जो लोहिया और जयप्रकाश का बात-बेबात हवाला देने से नहीं चूकती। देश बदलने, बराबरी और सशक्तीकरण आदि के लिए यह धारा बाहरी तौर पर काम करती रही, लेकिन अंदरखाने में उसका एक मात्र उद्देश्य राष्ट्रवादी वैचारिकता के खिलाफ अभियान चलाना हो गया है।

कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व को यह मुफीद रहा, इसलिए वह समाजवादी और साम्यवादी वैचारिक धारा को सहयोग करती रही। इसके प्रतिसाद में समाजवादी धारा हर मुमकिन मौके और मंचों पर कांग्रेस का सहयोग करती रही। कांग्रेस की वैचारिकता में ही राष्ट्र का ना सिर्फ भविष्य देखती रही, बल्कि देश को दिखाती भी रही। लेकिन हाल के दिनों में एक और बदलाव दिख रहा है। अब कांग्रेस की बात वामपंथियों से ज्यादा समाजवादी कर रहे हैं। लोहिया का गैरकांग्रेसवाद का सिद्धांत आज की समाजवादी धारा भूल चुकी है। समाजवादी नेताओं को कांग्रेस में अपना राजनीतिक भविष्य कितना नजर आता है, इसे देखना हो तो उस शरद यादव को देखिए, जो पहली बार संसद में गैर-कांग्रेसवाद की लहर पर सवार होकर ही पहुंचे थे। इस समय तो उनकी खुशी देखते ही बनती है। नीतीश कुमार तो कांग्रेसवाद का झोला उठा ही चुके हैं।

कांग्रेस में अपने राजनीतिक भविष्य की खोज

लेकिन हाल के दिनों में एक विशेष बदलाव दिख रहा है। अब कांग्रेस की बात वह समाजवादी धारा कहीं ज्यादा कर रही है, जो लोहिया और जयप्रकाश का बात-बेबात हवाला देने से नहीं चूकती।

देश बदलने, बराबरी और सशक्तीकरण आदि के लिए यह धारा बाहरी तौर पर काम करती रही, लेकिन अंदरखाने में उसका एक मात्र उद्देश्य राष्ट्रवादी वैचारिकता के खिलाफ अभियान चलाना हो गया है। कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व को यह मुफीद रहा, इसलिए वह समाजवादी और साम्यवादी वैचारिक धारा को सहयोग करती रही। इसके प्रतिसाद में समाजवादी धारा हर मुमकिन मौके और मंचों पर कांग्रेस का सहयोग करती रही। कांग्रेस की वैचारिकता में ही राष्ट्र का ना सिर्फ भविष्य देखती रही, बल्कि देश को दिखाती भी रही। लेकिन हाल के दिनों में एक और बदलाव दिख रहा है। अब कांग्रेस की बात वामपंथियों से ज्यादा समाजवादी कर रहे हैं। लोहिया का गैरकांग्रेसवाद का सिद्धांत आज की समाजवादी धारा भूल चुकी है। समाजवादी नेताओं को कांग्रेस में अपना राजनीतिक भविष्य कितना नजर आता है, इसे देखना हो तो उस शरद यादव को देखिए, जो पहली बार संसद में गैर-कांग्रेसवाद की लहर पर सवार होकर ही पहुंचे थे। इस समय तो उनकी खुशी देखते ही बनती है। नीतीश कुमार तो कांग्रेसवाद का झोला उठा ही चुके हैं।

कांग्रेस के इर्द गिर्द समाजवादी नेता

समाजवादी धारा के वे नेता भी राहुल गांधी को अपना नेता मान चुके हैं, जो एक दौर में राहुल तो छोड़िए, उनके पिता राजीव गांधी तक से बड़े नेता होते थे। जिनकी राजनीतिक साख कहीं ज्यादा थी। वैचारिकता और बौद्धिकता की दुनिया में लगातार सक्रिय रहने वाले विजय प्रताप जैसे समाजवादी पुरोधा तो कांग्रेस के बौद्धिक केंद्र राजीव गांधी फाउंडेशन में अब लगातार बैठने तक लगे हैं।

अब तो समाजवादी लोहिया के गैर-कांग्रेसवाद को भी दोषी ठहराने लगे हैं। हालांकि अभी तक सार्वजनिक तौर पर समाजवादी धारा के किसी प्रमुख व्यक्ति ने यह बात स्वीकार नहीं की है, लेकिन आपसी बातचीत में अब वे कहने लगे हैं कि अगर 1963 में लोहिया ने गैर-कांग्रेसवाद के नाम पर जनसंघ को साथ नहीं लिया होता तो भारतीय जनता पार्टी इतना आगे नहीं बढ़ती। संभवत: इसी ‘पाप के प्रायश्चित’ में समाजवादी नेता कांग्रेस के इर्द गिर्द इकट्ठा हो रहे हैं

Ramswaroop Mantri

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