डॉ. विकास मानव
पूरे इंग्लैंड समेत यह बात दुनिया के सभी इतिहासकार और
वैज्ञानिक मानते हैं कि, या तो “वाइकिंग” है या तो सैक्सन।”
इंग्लैंड में केवल पच्चीस सौ वर्ष पहले तक, जब भारत
ज्ञान के क्षेत्र में आज से हज़ारों वर्ष आगे था और सभ्य था तब जो मूल निवासी थे वह लगभग बिना कपड़े वाले जंगली थे।
लगभग दो हजार वर्ष पहले, रोमन्स ने इंग्लैंड के मूल निवासियों पर और कुछ एरिया में जहाँ पर जर्मनी के गड़ेरिए रहते थे जिनको एंग्लो सैक्सन कहा जाता है उनका पिछवाड़ा तोड़ा।
बाद में वाइकिंग्स,जो समुद्री दस्यु थे डेनमार्क इत्यादि ने इंग्लैंड पर आक्रमण किया। मूल निवासियों को वेल्स इत्यादि में खदेड़ दिया गया।
आज के इंग्लैंड पर पूरी तरह से एग्लों सैक्सन या वाइकिंग्स का ही क़ब्ज़ा है। अंग्रेज़ जिस प्रकार रोमन्स से पिटे थे उससे एक बात सीख लिए : बाँटो और राज्य करो। पहले काटो, यदि नही काट पाए तो , फूट डालकर बाटों और लूटो : का फ़ार्मूला पूरी दुनिया में चलाया गया।
कनाडा के लगभग सभी मूल निवासी मार दिए गए। एक-आध परसेन्ट बचे हों तो बचे हों. अमेरिका, आस्ट्रेलिया और न्यू ज़ीलैंड में भी वही किया गया।
स्पेनिश, पुर्तगालियों ने भी अरेंजटिना , ब्राज़ील , मैक्सिको , गोवा, फ़िलीपींस में काट बांट करके कन्वर्ट कर दिया।
ध्यान दीजिए :
आज का पूरा इंग्लैंड, बाहरी है। इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ भी ऐग्लो सैक्सन यानि जर्मन मूल की है।
तो जब अंग्रेज़, भारत पहुँचे तो काटो बांटो, कन्वर्ट करो , लूटों के साथ साथ आर्यों की थ्योरी लेकर आए।
अब इस विषय में और अधिक लिखकर आपका समय व्यर्थ नही करना चाहता. मैं बात , आप के उपर लेकर चलता हूँ।
आप अपने गाँव जाइए , और आपको बताया जाएगा कि मूलत: आप इस गाँव के नहीं है बल्कि आप फलनवे गाँव से आपके पूर्वज यहाँ आए हैं।
100 वर्षो में अंग्रेज़ों ने आर्यों वाली थ्योरी के साथ साथ हर गाँव के हर व्यक्ति को उस गाँव का न बताकर बाहरी बना दिया। ऐसा नही है कि लोग इधर से उधर नहीं जाते हैं पर बाहरी बताकर अपराधबोध से भरना कुछ और बात होती है।
अंग्रेज़ खुद भी बाहरी थे और सबको बाहरी बना दिए माइक्रो लेवल पर. आर्यों वाली थ्योरी चला दिए माइक्रो लेवल पर।
बहुत ही कम लोगो को पता है इंग्लैंड में भी, कि वहाँ एक टर्म कहा जाता है- “लैंडेड जेन्ट्री।” इसी तरह की जमींदारी व्यवस्था भारत में अंग्रेज़ों ने बनानी चाही। मुगलो के समय भी कुछ ज़मींदारी होती थी पर वह उतनी सुव्यवस्थित नहीं थी।
भारत की सभी स्मृतियाँ , धरती , हवा , जल , प्रकाश और अंतरिक्ष पर सबका समान अधिकार समझती थी।
प्राचीन भारत में भूमि का संपत्ति के रूप में क्रय विक्रय संभव नहीं था। इस तथ्य की पुष्टि पाश्चात्य विद्वान बेडेन पावेल तथा सर जार्ज कैंपबेल ने भी की है। कैंपबेल का कथन है कि भूमि जोतने का अधिकार एक अधिकार मात्र ही था और सनातन व्यवस्था के अनुसार भूमि नहीं माना गया था।
आधुनिक अनुसंधानों द्वारा यह ज्ञात हुआ है कि प्राचीन भारत में सामंत, उपरिक, भोगिक, प्रतिहर तथा दंडनायक विद्यमान थे। ये लोग न्यूनाधिक सामंत प्रथा के अनुकूल थे। किंतु हमें इनके अधिकारों तथा कर्तव्यों का पता निश्चय रूप से नहीं हो सका है, सिवाय इसके कि ये लोग अपने स्वामियों को आवश्यकता पड़ने पर सैनिक भेजते थे।
इन अधिकारियों को पारिश्रमिक के रूप में भूमि प्रदान की जाती थी।
भूमिव्यस्था के संबंध में याज्ञवल्क्य के मतानुसार चार वर्ग, महीपति, क्षेत्रस्वामी, कृषक और शिकमी थे (याज्ञवल्क्य 2.158)।
आचार्य बृहस्पति ने क्षेत्र स्वामी के स्थान में केवल स्वामी शब्द का ही प्रयोग किया है परंतु इसका स्पष्टीकरण कर दिया है कि स्वामी, राजा और खेतिहर के मध्य का वर्ग था।
उपर्युक्त वर्णन केवल भूधृति के वर्गीकरण को इंगित करता है, न कि कृषक को एक आंग्ल दास के स्तर पर पहुँचा देता है।
नोट : लैंडेड जेन्ट्री के बारे में किसी LSE या हारवर्ड या DSE में नही पढ़ाया जाता।





