,मुनेश त्यागी
सारी दुनिया में शोषण, अन्याय, भेदभाव, गैर बराबरी की शक्ल सूरत एक जैसी है, जो मानव विरोधी हैं और जो रुप रंग और प्रवृत्ति में सब एक हैं। यह सब मिलकर किसानों में दोनों का खून पीते हैं। इन सबके खात्मे और विनाश को लेकर शिक्षा, एकता, समाजवाद और क्रांति की जरुरत अभी भी बनी हुई है। इन्हीं सब को लेकर कुछ साल पहले यह कविता लिखी गई थी। आप इसे पढ़िए, इस कविता को पढ़कर लगता है थी शोषण अन्याय भेदभाव गैर बराबरी सारी दुनिया में सब जगह एक जैसे हैंऔर विश्व के पैमाने पर इसका विस्तार देखिए। इसको पढ़कर आपको आनंद आएगा, जिज्ञासा बढ़ेगी क्योंकि यह जनविरोधी और मनुष्य विरोधी मुद्दे आज भी कायम है और बने हुए हैं और इस कविता की का महत्व आज भी बना हुआ है। सविनय यह कविता आपकी सेवा में पेश कर रहा हूं,,,,,,अमेरिका और फ्रांस में देखो
इंग्लैंड और जापान में देखो
भारत और यूरोप में देखो
देश और विदेश में देखो
देखो देखो गौर से देखो
सारे रक्त पिपासु एक।
रेल सड़क और कार में
खेत और खलिहान में
मां बहन की इज्जत लूटती
ऑफिस और जहान में
देखो देखो गौर से देखो
सारे चीर खसोटू एक।
चाहे गांव के चाहे शहर के
काले, गोरे कैसे भी हों
मैं भी कहता, तुम भी कह दो
जन-शोषक शत्रु हैं एक
देखो देखो गौर से देखो
मेहनत के हड्पी सारे एक।
वोल्गा, गंगा, डार्लिंग में
मिसौरी अमेजन नील में देखो
कष्ट, दुख और वेदना का
रूप एक है रंग भी एक
काली गोरी झुर्रियों में
बहता हुआ रक्त भी एक।
सूरज एक है, चंदा एक
गगन एक है, धरती एक
इंद्रधनुष और हवा एक है
मांस, मज्जा, रुधिर है एक
देखो देखो गौर से देखो
शोषक चोर लुटेरे एक।
सुनो तनिक सोचो भी जरा
जात पांत और धर्म की
दीवारों को, जंजीरों को
तोड़ो, ढाओ, देओ फैंक
देखो देखो गौर से देखो
मानव मुक्ति का घोष है एक।
एक विश्व है, देश अनेक
मेहनतकश सारे एकम एक
अब ना सहेंगे जुल्मों सितम हम
नारा, परचम सबका एक
देखो देखो गौर से देखो
क्रांति के सब माहिर एक।
दलित, पीड़ित और उत्पीड़ित
किसान और मजदूर हैं एक
नहीं रहेंगे अलग अलग अब
हिंदू मुस्लिम है सब एक
देखो देखो गौर से देखो
इंकलाब का नारा एक।





