अग्नि आलोक
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मदारी

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     – वसंत लिमये

बुतों का जमाना बीता नहीं।
कायम है अपने हित साधन के खेल
पहले बनाए भी
हमीं ने किये मिस्मार
हमने-तुमने, एक दूजे के
इबादत गाह, पूजा स्थल
अपने अपने मजहब
अपने अपने मकसद
गवाह हैं चारों दिशाएं
हर सिम्त से आए
बुत परस्त – बुत शिकन
कोई एक नहीं, हम सब
हुए तंग नज़री के गुनाहगार
अपने अपने स्वार्थ
आज यह तो कल वह मूर्ति
बने- टूटे – फिर बनायेंगे
बस जय – जयकार करो हमारी
तुम्हारे बच्चों को
स्कूल नहीं, पढ़ाने वाले नहीं,
पीने के पानी के संकट
इनके लिए धन नहीं
करोड़ों खर्च हो जाए
इस दिखावे में
तुम आम आदमी हो मजमा बनो
भीड़ का हिस्सा बनो
कभी हमारी कल को तुम्हारी
बजेगी डुगडुगी
आज हम मदारी
कल तुम्हारी बारी
मजमा जुट ही जाएगा
बच्चा लोग! बजाओ ताली!

Ramswaroop Mantri

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