-सुसंस्कृति परिहार
पिछले दिनों कफ़ सिरप से हो रही बच्चों की मौत से मां बाप सहमे हुए हैं वे अब घरेलू नुस्खे आजमा रहे हैं।यह हमारी चिकित्सा प्रणाली के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है। बीमारियों के इलाज के लिए जिस तरह बा मुश्किल टोने टोटके और घरेलू चिकित्सा से ध्यान हटाकर ग्रामीण जन ऐलोपैथिक चिकित्सा की ओर विश्वास पूर्वक जाने लगे थे उसे इन मृत्युओं से गहरी ठेस पहुंची है।

छिंदवाड़ा के परासिया ब्लॉक से जो तस्वीर सामने आई है, उसने पूरे मध्य प्रदेश की सरकारी मशीनरी की पोल खोल दी है। यहां 18 बच्चों की मौत हो जाती है लेकिन किसी एक का भी पोस्टमार्टम नहीं हुआ। पड़ताल में एक-एक कर ऐसे खुलासे हुए हैं, जो बताते हैं कि मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था से लेकर दवा नियंत्रण विभाग तक हर स्तर पर लापरवाही और लीपापोती हुई है। मृत बच्चों की संख्या 25 तक पहुंच गई है और भी बढ़ सकती हैं।कई बच्चों के बीमार होने की ख़बर है।
इस बीच परासिया के एसडीएम शुभम यादव ने झूठ परोसते हुए मीडिया से कहा कि परिवारों से पोस्टमार्टम की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया मगर जब उन्हीं परिवारों से मीडिया ने बात की, तो सच सामने आ गया। उसैद खान के पिता यासीन ने बताया, “किसी ने हमसे पोस्टमार्टम के लिए पूछा ही नहीं। न अस्पताल ने, न प्रशासन ने।” अदनान के पिता अमीन खान ने कहा, “मेरे बेटे की मौत नागपुर मेडिकल कॉलेज में हुई , लेकिन किसी ने कभी पोस्टमार्टम की बात नहीं की।” संध्या भोसम के घरवालों ने भी यही कहा कोई अधिकारी आया ही नहीं। और दिव्यांश यदुवंशी के पिता ने बताया कि “हमें कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन प्रशासन ने पूछा ही नहीं।” यानि बच्चों की मौतें दर्ज हो गईं, लेकिन जांच का पहला कदम पोस्टमार्टम तक नहीं उठाया गया।
याद कीजिए,यही हाल तो कोरोना काल में हुआ था कोरोना काल में बाबा रामदेव से लेकर तरह तरह की दवाईयां विभिन्न कंपनियां लेकर शासकीय अस्पतालों और अशासकीय अस्पताल और चिकित्सकों के पास लेकर पहुंची थी।उनने भारी कीमत वसूलकर मरीज़ को दोहन किया और प्राण भी ले लिए। पोस्टमार्टम तो दूर की बात मृत शरीर भी देखने नहीं मिला। कई मरीज अपनी जमीन जायदाद बेचकर ऐसी दवाईयां लेकर भी पहुंचे लेकिन बचे नहीं। बाद में पता चला जो अस्पताल गया वो मर गया जो नहीं जा पाया वो बच गया।
चिकित्सकों और दवा कंपनियों ने अस्पतालों से कितनी लूट की इसका प्रमाण इसके बाद उन्होंने जितना विस्तार किया है वह आश्चर्यजनक है।कहना ना होगा कि ये सब कोरोना काल की लूट का परिणाम थीं। आजकल तो हृदयाघात से अचानक हो रही मौतों के लिए भी सरकारी वैक्सीन को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसमें चिकित्सकों की राय अलग अलग है किंतु अधिकांश चिकित्सक इस वैक्सीन को दोषपूर्ण मानते हैं।
ऐसी स्थिति के बाद कफ़ सिरप से होने वाली बच्चों की मौतें आश्चर्यजनक नहीं है।जांच पड़ताल में जो सच सामने आया है उसमें मोटे तौर पर यह पता चला है इसमें 46%जहर की मात्रा थी।पता चला इस कंपनी का मालिक पकड़ लिया गया है।मृतक बच्चों के परिवार को सरकारी मदद का भी ऐलान कर दिया गया है।क्या यह काफी है नन्हें शिशुओं को दी मौत का खामियाजा।
होना यह चाहिए कि जब कोई दवा तैयार होती है तो उसका जो परीक्षण होता है वह विश्वसनीय नहीं होता ।कभी कभी शुरू आती दवाएं जांच प्रक्रिया से गुजरने के बाद उसमे मिलावट कर देती है। इसलिए अचानक बार बार जांच होती रहनी चाहिए।आजकल दवाईयां कोई भी कंपनी लाकर चिकित्सक को उसके फायदे गिनाकर दे जाती है डाक्टर भी उस एजेंट से फायदा लेकर उसे मरीज पर प्रयोग करने लगते हैं।पुरानी दवा की जगह इस तरह वह मार्केट में भी आ जाती है। प्रचार प्रसार भी खूब होता है।ये तरीका ग़लत है।कम से कम चिकित्सकों को जिसे भगवान के समकक्ष लोग मानते हैं दवा के बारे में सारी जानकारी अपने दवा परीक्षण अधिकारी से लेना चाहिए। इसमें वक्त लग सकता है इसलिए इस तरह के दवा परीक्षण केंद्र कम से कम जिले में नहीं तो संभाग में होना चाहिए।उसकी रिपोर्ट मिलने के बाद ही चिकित्सक इसे लिखें तो बेहतर होगा। यहां तक कि सरकार द्वारा बेन दवाएं भी बाजार में धड़ल्ले से मिल रही है।ऐसे मेडीकल स्टोरों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
मासूम बच्चों की मौतों से प्रदेश में हर घर में मातम पसरा हुआ है। सोचिए यदि इस तरह मौत के डर से बच्चे डाक्टर के पास नहीं पहुंच पाते हैं और वे मौत को और बढ़ाते हैं तो चिकित्सा विज्ञान के लिए यह कलंकित करने वाला होगा।
साथियों दवा कोई कपड़े या फैशन सामग्री की दूकान नहीं है जहां मिलावट का ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता किंतु दवा में मिलावट तो मौत और अन्य बीमारियों को जन्म देती है। इसलिए इंसानियत का फ़र्ज़ निभाना बहुत ज़रुरी है।आज यह भी परमावश्यक है कि दवाओं का निरीक्षण भी ईमानदारी से हो और जो मिलावट करते पकड़े जाएं उनके लिए मौत की सज़ा दी जाने का कठोर प्रावधान हो ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति ना हो।
कफ़ सिरप की जांच के बाद सभी दवाईयां का परीक्षण भी ज़रुरी हो गया है।कभी कभी श्रेष्ठ चिकित्सकों की दवाईयां जब काम नहीं करती तो वे फलां फलां स्टोर से दवाएं लेने मना करते हैं। सस्ती दवाओं के नाम पर बड़े स्तर पर ठगी की जाती है।इस कारोबार में कई चिकित्सक भी सहयोग करते हैं इन सबकी जांच भी बड़े पैमाने पर होनी चाहिए।
यह बहुत ज़रुरी काम है इसे नज़र अंदाज़ करना ख़तरे से खाली नहीं है।इस व्यापक जांच में नागरिक समाज भी अहम् भूमिका का निर्वहन कर सकता है।आइए इन प्यारे प्यारे बच्चों की मौत से सबक लें और समाज को सावधान करने सक्रिय हों। क्योंकि चिकित्सक आजकल भगवान कम व्यवसायी ज्यादा बन गए हैं।




