- डॉ.सुनीलम

आज तक मैंने समाजवादियों के बारे में जितना भी पढ़ा है उसके आधार पर कह सकता हूँ जितना सघन जमीनी कार्य आजीवन एक स्थान पर टिक कर समाजवाद की प्रतिमूर्ति मामा बालेश्वर दयाल जी ने किया है उसकी तुलना किसी दूसरे नेता के साथ नहीं की जा सकती। मामा जी विशुद्ध राजनीतिक व्यक्ति थे। समाजवादी सिद्धांतों में केवल भरोसा ही नहीं करते थे। उन्होंने आजीवन समाजवादी आचरण ही किया। जो उन्हें अन्य नेताओं की तुलना में समाजवादी आंदोलन में विशिष्ट स्थान दिलाता है।
हमने डॉ. राममनोहर लोहिया जी के ‘जेल, वोट, फावड़ा’ के सिद्धांत को पढ़ा लेकिन तीनों क्षेत्रों में योगदान करते मामा जी को जाना। मामाजी अंग्रेजों के जेल में कैद रहे और आजादी के बाद भी जेल गये। उन्होंने पूरे भीलांचल के आदिवासियों को अन्याय, अत्याचार के खिलाफ लाल टोपी पहनाकर, लाल झंडा लेकर संघर्ष करना सिखाया। मामाजी ने पूरे भीलांचल की राजनीति को प्रभावित किया। 25 से अधिक विधायक सांसद तीन राज्यों में बनाए आज भी चुनाव के दौरान विभिन्न पार्टियों के नेतागण मामाजी के नाम का उपयोग करते हुये दिखलाई देते हैं। आज भी मामा जी के अनुयाइयों का राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में वोट बैंक है। मामाजी ने शिक्षा के क्षेत्र में भीलाश्रम चलाकर योगदान किया। वे भीलों के लिये सदा हेडमास्टर के तौर पर कार्य करते रहे। कैसे रहना चाहिये? कैसे कपड़े पहनना चाहिये? क्या खाना-पीना चाहिये सबकुछ उन्होंने सिखाया एक एक मूलवासी को समझाया सिखाया।

इसीलिए भीलांचल में आज भी सभी मानते हैं कि मामाजी के प्रयासों के चलते ही आदिवासियों ने लंगोटी छोड़कर कपड़े पहनना शुरू किया। मामाजी ने दहेज दापा की प्रथा समाप्त करने तथा मांस-मदिरा छोड़ने के लिये आदिवासियों को प्रेरित किया। मामाजी ने न केवल राजनीतिक और प्रशिक्षण दिया बल्कि उन्होंने भीली भाषा मे धर्मग्रंथों के माध्यम से आदिवासियों को तमाम किस्म की सीख देने का काम किया। मामाजी लोक भाषा, लोक भूषा, लोक भोजन और लोक संस्कृति को अपनाने वाले समाजवादी नेता रहे। उन्होंने भील भाषा में तमाम किताबें लिखीं।मामाजी की कहानियां बहुत लोकप्रिय हुईं।
हिन्दी तो मामा जी की मातृ भाषा थी ही लेकिन उन्होंने गांव-गांव में जाकर भीली भाषा में आदिवासियों के साथ संवाद किया। इस तरह जेल, वोट, फावड़ा के सिद्धांत को मूर्त रूप देने का काम मामा जी ने किया।
मामा जी ने कभी परिवार से कोई घनिष्ठ रिश्ता नहीं रखा। एक बार जब निवाड़ी कला यानि अपना पैतृक गांव छोड़ा उसके बाद गांव से बहुत ज्यादा रिश्ता नहीं रखा। यही कारण रहा कि जब मैंने मामा जी के गृह क्षेत्र निवाड़ी कला से कर्म क्षेत्र बामनिया तक की यात्रा की तब उनके खुद के गांव में मामा जी की विद्वता, स्वतंत्रता आंदोलन एवं समाजवादी आंदोलन में बहुमूल्य योगदान को जानने वाले बहुत कम मिले। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मामाजी के अनुयाइयों ने राजस्थान से जाकर उनके अपने गांव में मूर्ति लगाई, शायद इसी को कहते हैं घर की मुर्गी दाल बराबर। मैंने जब निवाड़ी कला में कार्यक्रम किया था तब तमाम नेताओं ने तमाम घोषणायें मामाजी को लेकर की थीं लेकिन उनपर अमल नहीं हुआ।
यानी निवाड़ी कला में भी वही हुआ जैसा बामनिया में होता रहा है। मामाजी के तमाम चेले मंत्री बनकर बामनिया आए, तमाम घोषणायें कीं, लेकिन घोषणाओं पर अमल नहीं हुआ।
इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस व्यक्ति के 150 से ज्यादा मंदिर स्वयं आदिवासियों ने अपने घरों और गांव में बनाए हों, जिसकी पूजा महामानव के तौर पर लाखों आदिवासियों द्वारा की जाती हो, जिसने आजादी के आंदोलन में ही नहीं, आजादी के बाद भी भीलांचल को मुख्य धारा से जोड़ने में अहम योगदान किया , उस व्यक्ति की एक मूर्ति भी झाबुआ जिलाधीश कार्यालय के सामने आज तक नहीं लगाई
जा सकी है।
वैसे मामा जी का सम्मान तो सभी पार्टियों और विचारधाराओं के लोग व्यक्तिगत तौर पर करते हैं लेकिन मामाजी की विचारधारा को खतरनाक मानते हैं तथा उस समाजवादी विचारधारा को खत्म करने का हर संभव प्रयास करते हैं। सरकारों और समाज के बलशाली लोगों को मामाजी के देवता हो जाने से कोई परेशानी नहीं है। लेकिन उन्हें समाजवादी विचार के नेता के तौर पर वे किसी भी हालत में स्थापित नहीं होने देना चाहते। यही कारण है कि मामा जी के समाधि स्थल भीला श्रम को किसी भी सरकार ने विकसित नहीं होने दिया है।

मामा जी को भारत रत्न देने की मांग उनके अनुयायी कई वर्षों से कर रहे हैं। अभी तक सरकारों के कान पर जूं तक नहीं रेंगा है। मामा जी के नाम से बामनिया रेलवे स्टेशन का नामकरण किया जाये इस मांग को भी किसी सरकार ने तवज्जो नहीं दी है। मामा जी को अमर करने का काम मूल तौर पर भक्ति मार्ग से जुड़े मामाजी के अनुयायी ही कर रहे हैं। मामा जी के जीवन काल में ही राजस्थान के आदिवासियों ने मामा जी के जन्मदिन पर आश्रम में आना शुरू कर दिया था। देहांत के बाद आश्रम आने वाले आदिवासियों की संख्या दिन दुगनी, रात चौगुनी बढ़ती चली गई। लेकिन 25 दिसम्बर की रात और 26 को हर वर्ष पच्चीस हजार से 50 हज़ार अनुयाइयों के लिये कोई इंतजाम शासन और सरकार की ओर से नहीं किया जाता है।
अक्सर यह कहा जाता है कि सभी नेता एक जैसे होते हैं लेकिन मामा जी का पूरा जीवन उन्हें अन्य नेताओं से पूरी तरह अलग करता है। जो लोग सार्वजनिक जीवन में समाज के लिये योगदान करना चाहते हैं उनके लिये मामाजी का संपूर्ण जीवन एक आदर्श मॉडल पेश करता है। एक तरफ जहां मामा जी के व्यक्तित्व में सादगी, सरलता, निर्भीकता, बहादुरी, त्याग, कथनी और करनी का तारतम्यता है वहां उनके सार्वजनिक जीवन में समाजवादी विचार के प्रति अडिग प्रतिबद्धता दिखलाई पड़ती है। शायद यही कारण था कि जे पी और डॉ लोहिया ने मिलकर बामनिया में रहते हुए उन्हें सोशलिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अध्य्क्ष बनाया था।

मामा जी जैसे नेता कई सदियों में एक बार होते हैं इसलिये मामा जी के अनुयायी नारा लगाते हैं “जब तक सूरज चांद रहेगा, मामा जी का नाम रहेगा। नाम तो मामा जी का चल ही रहा है ,जरूरत मामा जी के समाजवादी विचारों को मूर्त रूप देने के लिये सुनियोजित कार्य करने की है। मामा जी के फोटो और कैलेन्डर तो हजारों की संख्या में हर साल मामाजी के अनुयायी बामनिया से घर ले जाते हैं। मामाजी भीलांचल के हर घर में मौजूद हैं । गाँव गाँव में मंडलियां मामाजी के विचारों के गीत गाती हैं । मंदिरों में कहीं रोज कहीं साप्ताहिक कार्यक्रम होते हैं।
यह सभी मानते हैं कि यदि मामाजी ने अपना पूरा जीवन भीलांचल में नहीं लगाया होता तो यह इलाका भी नक्सलवाद और माओवाद से प्रभावित होता । यह मामाजी का अमूल्य योगदान है ।
हमने मामा जी के जीवन पर क्रांति कुमार जी, राजेश बैरागी जी तथा राजस्थान के भगत साथियों के साथ मिलकर दस से अधिक किताबें गत कुछ वर्षों में प्रकाशित की हैं लेकिन बहुत अधिक करने की जरूरत है। मामाजी के समाजवादी साहित्य को भीलांचल में ही नहीं देश के हर घर तक पहुंचाने की जरूरत है ताकि मामाजी के जीवन से अधिक से अधिक देशवासी प्रेरणा ले सकें।
–डॉ.सुनीलम किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष हैं





