सुसंस्कृति परिहार
अभी तक भाजपाई अखाड़े के हीरो मध्यप्रदेश के मामा शिवराज का हाल अब बेहाल है। उनके प्रदेश की जनता से रहे रागात्मक रिश्ते भी अब तेजी से टूटने लगे हैं।क्योंकि पिछले दिनों प्रदेश के बेरोजगार हजारों भान्जों ने जिस तरह एकत्रित होकर अपने मामा को नौकरियां निकालने बावत ज्ञापन देने की पहल की।उन बेरोजगार युवाओं के साथ जिस निमर्मता के साथ मध्यप्रदेश पुलिस ने व्यवहार किया , उन्हें खदेड़ा है उससे मामा के प्रति जो रोष और आक्रोश युवाओं में है वह तो यही संदेश दे रहा है कि मामा की वापसी अब नामुमकिन है।इस घटना का मामा की बहनों और भांजियों पर भी बुरा असर हुआ है। नौकरी की मांग कर रहे बच्चों के साथ ये तालिबाना हरकत निंदनीय है। उनमें वे चयनित शिक्षकों भी थे जिन्हें अब तक नौकरी नहीं दी गई है ।वैसे भी वे मामा से मिलने आए थे सिर्फ ज्ञापन देने ।उस पर ये बर्ताव। इससे पहले पिछड़े वर्ग के युवाओं द्वारा भोपाल में आरक्षण वृद्धि की मांग के वक्त भी यही नज़ारा था ।मामा तब भी मुंह चुरा के भागे थे तथा युवाओं पर लाठी चार्ज हुआ था कईयो को जेल में भी भेजा गया था।
आखिरकार ऐसा क्या हुआ है कि मामा घबराया हुआ आंदोलनकारियों से ज्ञापन लेने में भी संकोच कर रहा है और पुलिस से उन पर इस तरह का क्रूर व्यवहार करते हुए देख रहा है।एक संवेदनशील आत्मविश्वास से लबरेज शिवराज का हाल ये क्यों हो रहा है इसे समझने की ज़रूरत है।
वैसे तो पहिले से मामा अन्तर्विरोध से घिरे हुए हैं आए दिन नये मुख्यमंत्री के नाम आते रहते हैं।चंबल क्षेत्र उन पर हावी होने की जुगत में है। नरोत्तम मिश्रा, नरेंद्र तोमर के साथ ज्योतिरादित्य इस दौड़ में तो हैं ही।सिंधिया ने अब तक जो कुछ किया है उसके एवज में उन्हें केंद्रीय मंत्री तो बना दिया है पर दिली तमन्ना तो प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने की ही है। उन्हें ग़म है कि उनके पिता माधवराव को प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया गया इसके लिए अब वे पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। इसलिए केंद्र में मंत्री बनते ही उन्होंने प्रदेश में जो धमाचौकड़ी शुरू की है वह शिवराज के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है।दूसरी बात ये कि भाजपा के लिए पूरी तरह समर्थक रही पुरानी लाबी भी शिवराज से नाराज़ हैं जिन्होंने सिंधिया के विधायकों को भाजपा से जिताने में अपने पुराने कर्मठ कार्यकर्ताओं की घोर उपेक्षा की है ।भाजपा में आए ये नये मुल्ले प्याज ज्यादा खाने में लगे हैं और वे पुराने लोगों को तरजीह नहीं दे रहे हैं।सुनने में तो यह भी आया है कि सिंधिया गुट के लोग अब जिला पंचायत चुनाव, परिषद पालिका और नगरनिगमों में भी टिकिट चाहते हैं। जिससे भाजपा दो गुटों में बटी नज़र आ रही है। शिवराज पशोपेश में हैं उगलत लीलत पीर घनेरी । किससे क्या कहें समझ से परे है। कांग्रेस सरकार गिराकर लगता है उन्होंने अपने गिरने की तैयारी कर ली है।हम तो डूबेंगे ही सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे। सिंधिया भी सराहा -भाजपा भी सराहा।
आजकल सिंधियाजी के तेवर तो इतने खतरनाक हो चुके हैं कि वे पुराने भाजपाईयों की सरे आम अवमानना भी करने लगे हैं। इंदौर में एक पुराने भाजपाई के साथ उनकी बदसलूकी चर्चाओं में है। हाल ही में उनसे एक महिला पत्रकार ने जब पूछा कि आप जनहित के मुद्दों पर काम करने कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे भोपाल में चयनित शिक्षकों की पिटाई हुई आपने क्या किया । सिंधिया मौन रहे।कुल मिलाकर सिंधिया की फजीहत भी शुरू हो चली है। भाजपा अध्यक्ष बी डी शर्मा मौन है, शिवराज चुप हैं। लेकिन आने वाला वक्त तो यह बताने लगा है कि पुराने भाजपाई विरोध का शिकार सिंधिया पक्के तौर पर हार का वरण करेंगे और उनके भगोड़े साथियों का तो कहीं नामोनिशान नहीं मिलेगा । कहते हैं कि आधी छोड़ पूरी खों भागे ,आधी मिलै नै पूरी पावै।
भाजपा की अंदरूनी लड़ाई जिस कदर बढ़ रही है उससे ये साफ लगता है जनता दोनों को सबक सिखाने का मन बना ली है प्रदेश में होने वाले तमाम चुनावों का उसे इंतजार है, धोखेबाज अब नहीं चलेंगे ।इसका सीधा फायदा दमोह विधानसभा उपचुनाव की तरह ही इस बार कांग्रेस को ही मिलेगा।मामा की नींद उड़ी हुई है।मामा अपने जाल में फंस चुके है।जिसका निवारण अब केंद्र के पास भी नहीं।दादी विजया राजे की राह पर चलने वाले ज्योतिरादित्य भी बुरी तरह पछताऐगा ये तय है।जनता अब सामंती युगीन नहीं समझदार मतदाता बन चुकी है।
मामा का हाल बेहाल :ज्ञापन लेने की दम भी नहीं रही





