रामनारायण श्रीवास्तव
पश्चिम बंगाल के भवानीपुर विधानसभा उपचुनाव में भारी जीत से ममता बनर्जी केवल राज्य का मुख्यमंत्री ही नहीं बनी रहेंगी, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनका कद बढ़ेगा। भाजपा विरोधी राजनीति में इस समय ममता बनर्जी सबसे बड़ा नाम है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव और उसके बाद उपचुनाव में सफलता ने उन्हें और मजबूत किया है। इन नतीजों के बाद ममता बनर्जी की सक्रियता बढ़ेगी और वह अगले साल की शुरुआत में होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी प्रमुखता से दिखाई दे सकती हैं।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सफलता अपनी क्षेत्रीय अस्मिता को मजबूत करने के साथ राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी बड़ी दस्तक है। खासकर उस समय, जबकि कांग्रेस को लगातार झटके लग रहे हैं और देश में भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विपक्ष और नेतृत्व की तलाश की जा रही है। वैसे तो विपक्षी दलों में कई बड़े दिग्गज नाम हैं, लेकिन जमीनी सफलता में ममता बनर्जी उन सब पर भारी पड़ रही हैं।
यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के बड़े मोर्चे पर उन्होंने भाजपा की बड़ी चुनौती को तो धराशायी किया ही है, अब असम और गोवा जैसे राज्यों पर भी उनकी नजर है। वहां पर वह ऐसे नेताओं को जोड़ रही हैं, जो कभी कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाते रहे हैं।फिलहाल, ममता बनर्जी की छवि भाजपा विरोधी नेतृत्व के लिए सबसे मजबूत हो रही है। अब जबकि अगले साल की शुरुआत में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं, उस समय ममता बनर्जी की खुद की क्या भूमिका होगी, यह सबसे बड़ा सवाल होगा। क्योंकि जिन राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां पर तृणमूल कांग्रेस कहीं नहीं है। ऐसे में ममता बनर्जी या तो भाजपा विरोधी दलों का समर्थन कर सकती हैं या फिर कुछ राज्यों में अपनी दस्तक भी दे सकती हैं। खासकर, मणिपुर ऐसा राज्य है, जो बंगाल के समीप होने के साथ ही ममता बनर्जी के प्रभाव क्षेत्र में भी आता है। गोवा में भी कांग्रेस के एक धड़े के साथ ममता बनर्जी कुछ सीटों पर उतर सकती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में उनको विपक्षी खेमे के समर्थन में उतरना पड़ेगा।
अगर ममता बनर्जी को राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहुंच बढ़ानी है तो इन पांच राज्यों के चुनावों में भी उनको अपनी भाजपा विरोधी भूमिका को और मजबूती से रखना होगा। भले ही वह चुनाव लड़ने के बजाय प्रचार के स्तर पर ही सीमित क्यों न हों। ममता बनर्जी की इस बढ़ती ताकत से अन्य क्षेत्रीय दलों को दिक्कत हो सकती है। कांग्रेस की भी दिक्कतें बढ़ सकती हैं, क्योंकि ममता बनर्जी ज्यादातर कांग्रेस का हिस्सा अपने साथ खींच रही हैं। भाजपा के लिए वह बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं दे सकतीं, लेकिन कुछ राज्यों में जरूर नुकसान पहुंचा सकती हैं।
भाजपा नेतृत्व के लिए अभी भी सबसे महत्वपूर्ण कांग्रेस को कमजोर करना है, जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहुंच है और वह कभी भी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभर सकती है। इसके अलावा वह क्षेत्रीय दलों की एकता को भी पसंद नहीं करेगी। हाल में हरियाणा में इनेलो के नेता ओमप्रकाश चौटाला ने विपक्षी एकता की पहल की थी, लेकिन वह भी ज्यादा परवान चढ़ती नहीं दिखी।





