नाटक गोधडी – वर्ण मुक्त, समता मूलक और संविधान सम्मत भारत के विवेक की आवाज़ ! 11 अप्रैल महात्मा फुले के जन्म दिवस से शुरू होगा जनसामान्य की सांस्कृतिक मुक्ति का जागर ! थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाटक गोधडी की प्रस्तुतियां पूरे महाराष्ट्र और भारत में करने के लिए सज्ज है !
जनसामान्य की सांस्कृतिक मुक्ति की मशाल है नाटक गोधडी !
वर्णवाद सभ्यता और मनुष्यता पर कलंक है. वर्चस्ववाद के आत्मकेंद्रित श्रेष्ठता के विकार से पनपा यह शोषणकारी तंत्र भारत की संस्कृति नहीं विकृति है. मनुष्य को पशु से हीन,तुच्छ,अछूत बनाने वाला वर्णवाद आज भी भारत को जातियों के दमनकारी समूहों में कैद कर संविधान को लहूलुहान कर रहा है.
समता, धर्मान्धता का शत्रु वर्णवाद भारत की आत्मा में लगा हुआ दीमक है. भारत की आत्मा है गाँव और गाँव वर्णवाद को पालने-पोषने के केंद्र हैं. आज़ादी के 75 साल, संविधान के 72 साल बाद भी गाँव वर्णवाद के शोषण में जकड़ा हुआ है.
नाटक गोधडी भारत के गाँव को वर्ण मुक्त करने का सांस्कृतिक शोध है. क्योंकि संस्कृति जब अपनी खोज में निकलती है तब मनुष्य और समाज विकार मुक्त हो विचार युक्त होते हैं.
वर्णवादी सत्ता जनता को ‘भगवान’ के खूंटे पर बांध अनंतकाल तक उसका दोहन करती है. नाटक गोधडी जनता को भगवान के खूंटे से मुक्त करने का मार्ग है. जनसामान्य की सांस्कृतिक मुक्ति की मशाल है नाटक गोधडी !
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