शशिकांत गुप्ते
बाजारवाद के फैलते प्रभाव से राजनीति भी अछूती नहीं रही है।
बाजारवाद वह मत या विचारधारा है,जिसमें जीवन से सम्बंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए किया जाता है। बाजारवाद ,मुनाफा केंद्रित तंत्र है।यह तंत्र,हर वस्तु और विचार को उत्पाद समझकर बकाऊ बनाता है।
बाजारवाद में ब्रांड का महत्व बढ़ जाता है।खेत में पैदा होने वाला अनाज भी विभिन्न नाम के ब्रांड से बिक रहा है।
राजनीति में भी ब्रांडिंग की जा रही है।राजनीति में रीति,नीति,और सिंद्धान्त को दरकिनार कर व्यक्ति को दलबदल करने में कोई संकोच नहीं होता है।यह प्रक्रिया बाजारवादी संस्कृति की तरह अपनाई जाती है।मानो कोई व्यक्ति पूर्व “A” नाम का दुपट्टा गले लटका था।अब वह “B” नाम का दुपट्टा लटका रहा है।यदि पहला दुपट्टा उसने सैद्धांतिक आधार पर पहना होता तो वह जीवन के अंतिम क्षण तक नहीं बदलता।पहनने में और लटकाने में यही फर्क है।
उक्त आचरण करने वाले भूल जातें हैं कि,अपना देश लोकतांत्रिक देश है।
इनदिनों बाजारवाद की तर्ज पर नित नई योजनाओं की घोषणा की जा रही है।योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के बजाए विज्ञापनों के माध्यम से योजनाओं की ब्रांडिंग बहुत होती है।
मानसविज्ञान के अनुसार किसी भी योजना की सफलता के लिए तीन तरह की प्रक्रिया होती है।पहली प्रक्रिया वातावरण बनता है,दूसरी क्रियान्वय होना चाहिए,और तीसरी प्रक्रिया परिणाम होता है।
दुर्भाग्य बाजारवादी मानसिकता वातावरण को ही परिणाम का आवरण पहना देती है।
इसीलिए बाजारवाद में विज्ञापनों का महत्व है।बाजारवादी संकृति के कारण ही आमजन विज्ञापनों के प्रभाव में आगए और परिणाम का इंतजार करने लगे।इतंजार निराशा में बदल गया,जब पता चला कि वादें नहीं वह चुनावी जुमले थे।
वर्तमान में बाजारवादी संकृति का प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिल रहा है।मुफ्त राशन बाकयदा ब्रांडिंग किए हुए थैली में वितरित किया जा रहा है।थैली के ऊपर दो चेहरें भी गरीब जनता को उपकृत करते हुए, दिखाई दे रहे है।
आश्चर्य होता है।लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होने बावजूद भी
जनप्रतिनिधि जनता को उपकृत करतें हैं।
यही बाजारवादी संस्कृति है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





