शशिकांत गुप्ते
शहादत शब्द का अर्थ होता है, बलिदान, और शहीद होने का भाव। शहादत एक अर्थ गवाही और साक्ष्य या सबूत भी होता है।
देशी फिल्मों में प्रायः एक संवाद सुनाई देता है,कानून सबूत मांगता है।
इनदिनों सियासत में पक्ष और विपक्ष द्वारा दूसरें पर बगैर सबूत के अरोपप्रत्यारोप लगाने की फैशन चल पड़ी है। साथ ही तथ्यहीन आरोप लगाकर समाचार माध्यमों में वाहवाही लूटने की फ़ैशन का प्रचलन शुरू हुआ है।
कोई किसी के टी शर्ट की कीमत को आंकने में अपनी पूरी मानसिक ऊर्जा लगा देता है। दूसरे पर उंगली उठाने के बाद याद आता है कि, जब कोई दूसरे को पर एक उंगली उठाता है,तब उसी की तीन उंगलियां स्वयं पर ही उठती है।
एक टी शर्ट की कीमत के प्रति उत्तर में लाखों रुपयों के सूट, हजारों रुपयों के गॉगल और बीस हजार कम एक लाख रुपये का मफलर स्मृति पटल कर उभर आता है।
विषयांतर को त्याग कर पुनः शहादत शब्द के महत्व को समझतें हैं। अपने देश को स्वतन्त्रता प्राप्त करवाने में असंख्य लोगों ने शहादत दी है। असंख्य लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई है।
देश की स्वतंत्रता में क्रन्तिकारियों का अमूल्य योगदान रहा है।
ऐसे अमूल्य योगदान के बाद प्राप्त स्वतंत्रता लाभ हम सभी उठा रहें हैं।
जिन लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में तनिक भी शिरकत नहीं की, शिरकत दो दूर स्वतंत्रत संग्राम से स्वयं को अछूत रखा। वे भी स्वतंत्रता लाभ उठा ही रहें हैं। स्वतंत्रता आंदोलन में संक्रिय भूमिका अदा करने वाले,और शहादत देने वालों ने किसी धर्म विशेष या किसी विशेष धर्म या किसी समाज या किसी जाति के लिए विदेशी हुक्मरानों से सँघर्ष नहीं किया। शहादत का जज्बा रखने वालों ने सम्पूर्ण देश के लिए अपनी शहादत दी है।
देश मतलब सिर्फ भौगोलिक सीमा नहीं होती है, देश मतलब देश में रहने वाले सभी देशवासी होतें हैं।
आश्चर्य होता है,जिन लोगों को बगैर परिश्रम किए स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। बगैर परिश्रम के मतलब बहुत से कथित वीर जेल में रहते हुए बुलबुल के पंखों पर सवार होकर तफ़री करने निकल पड़ते थे? इसतरह का मनोरंजक इतिहास भी पुस्तकों में सीमित है।
आश्चर्य होता है, यह जानकर कि, शहादत के बगैर प्राप्त स्वतंत्रता का उपभोग करने वालों का स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहने की शहादत (सबूत) भी नहीं है।
बगैर परिश्रम किए प्राप्त स्वतन्त्रता का उपभोग करने वाले जब राष्ट्रीयता की बात करतें है,तब बहुत आश्चर्य होता है।
बगैर श्रम किए प्राप्त उपलब्धियों का उपभोग करने वालों के पास योग्यता का अभाव रहता है। इसीलिए इरतरह की हास्यास्पद बात की जाती है कि, सत्तर वर्षो में देश में कुछ हुआ ही नहीं?
सावधान और खबरदार होने के लिए, सजगता अनिवार्य हो गई है।
अन्यथा सन 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म एक साल का यह गीत गुनगुनाना पड़ सकता है।
न पूछो प्यार की हमने जो हक़ीक़त देखी
वफ़ा के नाम पे बिकते हुयी उल्फ़त देखी
किसी ने लूट लिया और हमें खबर न हुई
खुली जो आँख तो बर्बाद मुहब्बत देखी
सब कुछ लुटा के होशमें आये तो क्या किया
यह भी उतना ही स्पष्ट है कि भारत की माटी में प्राकृतिक रूप से लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता मजबूती से रचिबसी है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





