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मार्क्स ने कहा था कि, ‘हर चीज पर संशय करो…..!

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अमिता नीरव

मार्क्स को पढ़ने से बहुत सालों पहले से मैं हर चीज पर संशय करने लगी थी। मेरी अब तक की विचार प्रक्रिया के तहत मैं हर स्थापित पर सवाल और हर नए पर विचार करती रही हूँ। उस वक्त में जबकि गाँधी औऱ #नेहरू का विरोध करने वाले सिर्फ और सिर्फ संघी हुआ करते थे, मेरा इन दोनों से विरोध था।

हाल ही में एक दोस्त ने कहा कि तुम विरोधी स्वर हो। मैं विरोध से ही सहमति तक पहुँचती हूँ, यही मेरी विचार प्रक्रिया है। हमारी परंपरा भी तो नेति-नेति की बात करती है न! तो किसी वक्त अपन नेहरू और गाँधी दोनों के कट्टर आलोचक हुआ करते थे। 

बहुत बचपन में ताऊजी ने बताया था कि नेहरू इतने अमीर थे कि उनके कपड़े धुलने पेरिस जाया करते थे। जाहिर है पेरिस जाएँगे तो एयरोप्लेन से ही जाएँगे औऱ आएँगे भी। मैं सोचा करती थी कि जब इतने अमीर हैं तो इन्हें क्या पड़ी है कि ये आजादी की लड़ाई लड़े और जेल जाएँ?

अभी कुछ साल पहले ही पता चला कि दरअसल संघी टोले ने ये दुष्प्रचार किया तो नेहरू को बदनाम करने के लिए था, लेकिन उस वक्त के लोग बहुत प्योर थे, इसलिए उन्होंने इसे नेहरू की तारीफ के तौर पर ग्रहण किया। मतलब ताऊजी ये इसलिए बता रहे थे कि इतने अमीर होने के बाद भी वे जेल में रहे थे। 

दरअसल ये दुष्प्रचार इलाहाबाद की उस लॉन्ड्री को लेकर किया गया, जिसमें नेहरू परिवार के कपड़े धुलने जाया करते थे औऱ उस लॉन्ड्री का नाम पेरिस लॉन्ड्री है। आप इसे समझिए कि संघ किस कदर दुष्प्रचार कर सकता है और ये गोएबल्स के अनुयायी, उसी झूठ को लगातार औऱ जोर-जोर से कह रहे हैं।

इस देश का दुर्भाग्य ये है कि यहाँ की जनता, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है, संघ के दुष्प्रचार का शिकार हो रहे हैं। ये नेहरू को बदनाम करने का इकलौता उदाहरण नहीं है, नेहरू को बदनाम करने की इनकी साजिश दरअसल उस कुंठा का हिस्सा है, जो नेहरू के अंतरराष्ट्रीय कद से पैदा हुई है। 

कुछ वक्त पहले मेरे कजिन ने मुझे मैसेज भेजा कि जो इंसान खुद को ‘एक्सीडेंटल हिंदू’ बताता है, वो क्या देश और हिंदूओं के बारे में सोचेगा, काम करेगा? मैंने इस बात पर इनिशियली यकीन किया, क्योंकि मैं ये समझती हूँ कि सिर्फ नेहरू ही नहीं हम सब एक्सीडेंटली ही (यदि आपत्ति हो तो इंसीडेंटली कह लीजिए) अपने-अपने धर्मों में पैदा हुए हैं।

ये कोई ऐसी बात नहीं है, जिसके लिए आप किसी से नफरत करें, उसे बदनाम करे। मैं खुद भी एक्सीडेंटली हिंदू हूँ, आप भी औऱ जो मुसलमान या ईसाई हैं वे भी एक्सीडेंटली ही मुसलमान या ईसाई हैं। क्योंकि हममें से किसी ने भी अपना धर्म, अपनी जाति, क्षेत्र, भाषा, देश, लिंग, समय, जगह आदि का चुनाव नहीं किया है।

फिर भी मैंने इस विषय पर सर्च किया, पाया कि ये भी संघी टोले का दुष्प्रचार है, हिंदू महासभा के अध्यक्ष एन बी खरे ने अपने लेख, द एंग्री एरिस्टोक्रेट में नेहरू के लिए लिखा था, वे शिक्षा से ईसाई, संस्कृति से मुस्लिम और दुर्भाग्य से हिंदू थे। खरे दरअसल नेहरू के कट्टर आलोचक थे। बाद में वो कोट अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग जगह इस्तेमाल किया।

फिर वह नेहरू के कहे की तरह प्रचारित किया जाने लगा। जब मैंने अपने कजिन को ऑल्ट न्यूज की वो लिंक दी तो उन्होंने उसे मानने से ही इंकार कर दिया। मुझे गोएबल्स याद आए, किसी झूठ को जोर-जोर से और लगातार कहते रहें तो वह सच हो जाता है। संघ गोएबल्स को अक्षरशः फॉलो करता है। 

पिछले दिनों संघ से जुड़े एक मित्र से बात हो रही थी तो मैंने कहा कि, ऐसा नहीं है कि नेहरू में कोई कमी नहीं थी (ऐसा कोई है, जिसमें कोई कमी नहीं है?), ऐसा भी नहीं है कि नेहरू से गलतियाँ नहीं हुई है। उनसे भी कई गलतियाँ हुई है, लेकिन गलतियाँ करने की उनकी नीयत नहीं थी।

मैं अब नेहरू की इसलिए प्रशंसक हूँ कि उन्होंने बिना किसी लीगेसी के अपनी लीगेसी विकसित की। शायद पाकिस्तान के शायर ने कहा था कि ‘हिंदुस्तान औऱ पाकिस्तान में कोई फर्क नहीं है, सिवाय इसके कि हिंदुस्तान के पास नेहरू है। जिस दिन नेहरू चले गए उस दिन हममें (पाकिस्तान में) औऱ उनमें (भारत में) कोई फर्क नहीं बचेगा।’ ये बहुत बड़ा स्टेटमेंट है।

नेहरू ने कई सारी और इतनी बड़ी-बड़ी लकीरें खींची है कि उनकी बराबरी नहीं की जा सकती है और ये तो हम जानते ही हैं कि जब बड़ी लकीर नहीं खींची जा सकती है तो उसे मिटाने के प्रयास किए जाते हैं। इस देश में ऐसे प्रयास नेहरू के रहते हुए ही होते रहे हैं औऱ आज तक हो रहे हैं।

इतिहास बहुत सख्त मूल्यांकन करता है, नेहरू का मूल्यांकन भी इतिहास ही करेगा। फिलहाल इतना ही कि लोकतांत्रिक सोच, वैज्ञानिक एप्रोच, क्लियर विजन और मानवतावाद दृष्टि के साथ उस वक्त में देश को अंतरराष्ट्रीय पहचान देने के लिए हम (मेरे जैसे) नेहरू के ऋणी हैं।

Ramswaroop Mantri

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