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अध्यात्मविज्ञान : अवतार का निहितार्थ

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 नीलम ज्योति

     _विष्णु ने समय- समय पर धर्म, संस्कृति, सत्य, सदाचार और सज्जनों के परित्राण के लिए अवतार ग्रहण किया। अधर्म, कुसंस्कार, असत्य, कदाचार और पापियों का विनाश किया। वैष्णव तंत्र में भगवान विष्णु को शक्ति (ईश्वर) का अवतार मान कर उनकी पूजा-आराधना-साधना आदि की जाती है।_

    विष्णु की साधना को शक्ति-साधना के प्रमाण के रूप में माना गया है। भगवान जब भी अवतार लेते हैं तो शक्ति का आविर्भाव स्वयं हो जाता हैं। 

    *अवतार का रहस्य है क्या ?*

     अवतार एक ईश्वरीय आयोजन है–एक विशेष आयोजन। यह जगत में शुभ, शान्ति और प्रकृति-विरुद्ध कार्य करने वाले का नाश करता है। नारायण (विष्णु) की आराधना ज्यादातर सात्विक पूजा के अंतर्गत आती है।

      _उनके दस अवतारों में राम, कृष्ण और बुद्ध की पूजा पर ज्यादा प्रभाव देखने को मिलता है। लेकिन कृष्ण तंत्र में और वैष्णव तंत्र में कहीं-कहीं तांत्रिक पूजा का भी उल्लेख मिलता है।_

        ध्यान-तंत्र-ग्रंथों के अनुसार अवतार को शक्ति के अवतार के रूप में भाव मिलता है। जैसे–काली कृष्णरूपा, तारिणी अर्थात् तारा रामरूपा, छिन्नमस्ता नृसिंहरूपा, भुवनेश्वरी वामनरूपा, सुन्दरी अर्थात् भैरवी परशुराम रूपा, धूमावती मायारूपा, बगलामुखी कूर्मरूपा, कमला बुद्धरूपा है।

       _दुर्गा की साधना सात्विक साधना के अंतर्गत भी आती है। कलियुग में अगर तंत्र की कठोर साधना को छोड़कर साधक या गृहस्थ दुर्गा की आराधना करता है तो उसे सभी प्रकार के दुःखों से त्राण मिलता है। इसलिए तंत्र में अन्य शक्तियों की साधना वर्णन के साथ दुर्गा की आराधना पर विशेष बल दिया गया है।_

         वैसे सभी देवी-देवता ऊर्जा रूप हैं और हैं समयातीत। लेकिन वर्तमान समय (कलियुग) में गणेश, हनुमान और दुर्गा की आराधना विशेषकर जन साधारण को करना चाहिए। पार्वती की ऊर्जा से गणपति का आविर्भाव हुआ, इसलिये वह विघ्नहर्ता कहे गए हैं। हनुमान भगवान शिव के ऊर्जा रूप हैं, इसलिए वह भयहर्ता कहे गए हैं। सभी देवताओं की समस्त संयुक्त ऊर्जा से दुर्गा का प्राकट्य हुआ। इसलिए उन्हें सभी कष्टों-दु:खों की तारिणी कहा गया है।

      अध्यात्म के भी रंग होते हैं। ऊर्जा का जो आध्यात्मिक रंग है, वह है–सिंदूरी। वह ज्ञान, वैराग्य और ऊर्जा का भी प्रतीक है। इसलिए सन्यासी गैरिक वस्त्र धारण करते हैं। यहां तक कि दुर्गा, गणपति और हनुमान की प्रतिमा भी सिंदूरी रंग की आभा लिए हुए होती है। सूर्य की सिंदूरी आभा प्रकट होते ही जगत के सभी पशु-पक्षी और मानव सक्रिय हो उठते हैं। उनके भीतर असीम ऊर्जा का होने लगता है संचार। सूर्य का मूल रंग भी यही है जो अग्नि का है।

      _उक्त तीनों शक्तियां ( गणेश, हनुमान और दुर्गा) भी मानव और प्रकृति जगत के निकट हैं। इनकी आराधना से फल तत्काल मिलने लगते हैं और उसका आभास भी होने लगता है।_

      [चेतना विकास मिशन]

Ramswaroop Mantri

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