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*ध्यान और इंसान की समस्याओं का समाधान*

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        ~ डॉ. विकास मानव

   अक्सर पूछा जाता है : “ध्यान मेरी समस्याओं के समाधान के लिये क्या करेगा?”  यही सवाल गत दिवस फोनवार्ता कर के राजस्थान के जयपुर की ज्योति मैडम ने भी पूछा. हलांकि उनकी कोई इंटर्नल जिज्ञासा नहीं थी, व्यंग्य में पूछा उन्होनें. हमपे कई सवाल भी उठाये तर्क नहीं कुतर्क से. मसलन : विना स्वार्थ के कोई कुछ नहीं करता, आप निःशुल्क सेवा क्या देते होंगे. यूपी के लोग तो वैसे भी अच्छे नहीं होते हैं. आप बनारस के हैं, जहाँ बस ठग बसते रहे हैं.

     अब ऐसी अति महान आत्माओं को  यह सच याद दिलाने का कोई अर्थ नहीं की राम, कृष्ण जैसे किरदार यूपी के थे. तुलसी, कबीर वाराणसी के ही थे. रविदास भी यूपी के ही थे, जिनका शिष्यत्व उनके राजस्थान की मीराबाई ने आकर ग्रहण किया और यहीं जन्मे दिवंगत कृष्ण तक को पा ली. 

     धरती के टुकड़े के आधार पर किसी के व्यक्तित्व को आंकना पूर्वाग्रह-ग्रसित अपाहिज मानसिकता या अल्कोहलिक विक्षिप्तता से अधिक कुछ भी नहीं है. ऐसे लोगों का मंज़िल से कोई सरोकार नहीं होता. आज़माने की औकात भी इनमे नहीं होती. ये आम खाने – चूसने के नहीं, बस गुठली गिनने के हकदार होते हैं.

     देश ही नहीं विदेशों तक में हमारे मेडिटेशन और ट्रीटमेंट के शिविर आयोजित होते हैं. आम लोग नहीं, ज्यादातर खास लोग ही प्रतिभागी बनते हैं. आमजन का विषय रोटी है, भगवान नहीं. ऐसे में हम जो कहते हैं, वो नहीं करते तो अब तक कब का जेल में डाल दिए गए होते या मार दिए गए होते. ख़ैर…!

 मुद्दा है ध्यान से समस्या के समाधान का. समस्यायें आपके चारों ओर हैं। यदि किसी तरह एक समस्या से छुटकारा पा भी लो तो दूसरी पैदा हो जाएगी।  समस्याओं को पैदा होने से रोक न सकोगे। समस्याएं पैदा होती ही रहेंगी जब तक आपमें साक्षीत्व की गहन समझ न आ जाये। यही एक सुनहरी कुंजी है जो सदियों से भारत में हुई आंतरिक खोज में पायी गयी है: कि समस्या का समाधान खोजने की कोई आवश्यकता नहीं। बस इसे देखो, और मात्र देखना ही काफी है; समस्या तिरोहित हो जाती है। 

       यदि आप स्पष्ट हो, यदि देख सकते हो, तो जीवन की समस्यायें तिरोहित हो जाती हैं। तिरोहित शब्द का प्रयोग करने के बारे में दोबारा चेतो। यह नहीं कहा जा रहा है कि उत्तर खोज लो, अपनी समस्याओं के समाधान खोज लो, नहीं। यहां केवल जीवन की समस्याओं की बात की जा रही है।

     जीवन की समस्याओं के बारे में समझने के लिये यह अत्यंत महत्वपूर्ण बात है: वे आपकी अस्पष्ट दृष्टि के कारण पैदा होती हैं। तो ऐसा नहीं कि  पहले उन्हें स्पष्ट देखो तब समाधान मिलेगा और फिर उस समाधन का प्रयोग करोगे। नहीं, प्रक्रिया इतनी लंबी नहीं है, प्रक्रिया बहुत साधारण और छोटी है। जिस क्षण अपने जीवन की समस्या को स्पष्ट देखते हो, वह तिरोहित हो जाती है।

     ऐसा नहीं है कि उत्तर पा लिया है और अब इसका प्रयोग करोगे, और किसी दिन इसे मिटाने में सफल हो जाओगे। समस्या आपकी अस्पष्ट दृष्टि के कारण थी। खुद ही इसे पैदा किया था।

    पुन: स्मरण रहे, जीवन की समस्याओं की बात की जा रही है।  यह नहीं कहा जा रहा कि कार खराब हो जाये तो शांत बैठ जाओ और स्पष्ट देखो कि समस्या क्या है: समस्या साफ है, अब कुछ करो! बात यह नहीं है कि बस पेड़ के नीचे बैठ कर ध्यान करो.  कभी-कभी बीच में आँख खोलकर देखो कि समस्या का हल हुआ कि नहीं।

    यह जीवन की समस्या नहीं है, यह मशीन की समस्या है। यदि टायर पंक्चर हुआ है तो पहिया बदलना होगा। ध्यान मे बैठना इसका हल नहीं है; उठो और पहिया बदलो। इसका आपके मस्तिष्क और आपकी स्पष्टता से कुछ लेना-देना नहीं; इसका सड़क से कुछ लेना- देना नहीं। आपकी स्पष्टता सड़क के साथ क्या कर सकती है? अन्यथा साधक एक सड़क ठीक नहीं कर देते। फिर तो बस ध्यान बहुत था!

प्रश्न केवल जीवन की समस्याओं का है। उदाहरण के लिये, आपको ईर्ष्या हो रही है, क्रोध आ रहा है,या फिर अर्थहीनता का आभास हो रहा है। किसी प्रकार अपने को ढो रहे हो।  लगता है कि जीवन में अब कोई रस नहीं रहा। तो ये जीवन की समस्याएं हैं और मन की अस्पष्टता के कारण पैदा हुई हैं। अस्पष्टता उनका स्रोत है, स्पष्टता उन्हें तिरोहित कर देती है। यदि  स्पष्ट हो, यदि साफ देख सकते हो तो समस्या तिरोहित हो जाएगी।

      इसके अतिरिक्त कुछ नहीं करना है। बस देखना, इसकी सारी प्रक्रिया का साक्षी होना: कैसे समस्या पैदा होती है, कैसे यह ग्रसित करती है, कैसे इसके द्वारा दृष्टि पूर्णतया धुंधली हो जाती है, कैसे अंधे हो जाते हो; और कैसे पागलों जैसा व्यवहार करने लगते हो, जिसके लिये बाद में पश्चाताप होता है. बाद में बोध होता है कि यह निपट पागलपन था : ‘मैने यह व्यर्थ ही किया, मैं इसे कभी करना नहीं चाहता था, फिर भी किया। जब मैं कर रहा था तब भी मैं जानता था कि मैं करना नहीं चाहता हूँ।’

  लेकिन यह ऐसा था मानो आप आविष्ट हो गये थे.

Ramswaroop Mantri

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