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*ध्यान : शरीर की अनुगामी चेतना को मार्गदर्शक बनाओ*

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        डॉ. विकास मानव

  शरीर जहां चाहता है, आपकी चेतना वहां चली जाती है। आप जहां चाहते हैं, वहां नहीं जाती। क्योंकि आपने उसका कोई अभ्यास नहीं किया। अभी भूख लगती है तो चेतना तत्काल पेट में चली जाती है। वह आपसे आज्ञा नहीं लेती कि मैं पेट की तरफ जाऊं। वह चली जाती है। आप कुछ कर नहीं पाते। क्योंकि आपने कभी यह अब तक सोचा ही नहीं कि चेतना का प्रवाह, मेरी इंटेंशन, मेरी अभीप्सा पर निर्भर है। इसका थोड़ा प्रयोग करें।

रात बिस्तर पर पड़े हैं, सारी चेतना को पैर के अंगूठे में ले जायें। सब तरफ से भूल जायें, सिर्फ अंगूठे रह जायें। ले जायें, भीतर… भीतर… भीतर… अंगूठे में ठहर जायें जाकर। जैसे आपकी आत्मा अंगूठे में ठहर गयी। बहुत लाभ होगा, नींद तत्काल आ जायेगी। क्योंकि मस्तिष्क से अंगूठा बहुत दूर है। जब चेतना सारी वहां पहुंच जाती है, मस्तिष्क खाली हो जाये, तो आप गहरी नींद में गिर जायेंगे।

      चेतना को थोड़ा हटाना सीखें। आंख बंद कर लें। कहीं भी एक बिंदु पर चेतना को स्थिर करने की कोशिश करें, आप पायेंगे, जिस बिंदु पर चेतना को ले जायेंगे, वहीं प्रकाश पैदा हो जायेगा। आंख बंद कर लें, सोचें कि सारी चेतना हृदय पर आ गयी, इंटेंशनल, अभिप्राय से सारी चेतना को हृदय पर ले आये, हृदय की धड़कन ही केंद्र बन गयी। आप अचानक पायेंगे, हृदय के पास धीमा—सा प्रकाश होना शुरू हो गया।

     चेतना को बदलने के ये प्रयोग करते रहें। कभी भी कर सकते हैं, इसमें कोई अड़चन नहीं है। कुर्सी पर खाली बैठे हैं, ट्रेन में, बस में, कार में बिलकुल कर सकते हैं। कहीं कोई अलग समय निकालने की जरूरत नहीं है। धीरे— धीरे आपको लगेगा, आपकी मास्टरी हो गयी। यह मास्टरी वैसी है जैसे कि कोई कार की ड्राइविंग सीखता है। ऐसे ही चेतना की ड्राइविंग सीखनी पड़ती है।

कोई साइकिल चलाना सीखता है। आप साइकिल चलाना जानते होंगे. लेकिन अब तक कोई बता नहीं सका कि साइकिल कैसे चलायी जाती है। अभी तक तो नहीं बता सका कोई। चलाकर बता सकते है आप, लेकिन कैसे चलाई जाती है, क्या है ट्रिक, क्या है सीक्रेट? सीक्रेट सूक्ष्म है। अभ्यास से आ जाता है, लेकिन खयाल में नहीं है।

      साइकिल चलाना एक बड़ी दुर्लभ घटना है, क्योंकि पूरे समय ग्रेविटेशन आपको गिराने की कोशिश कर रहा है। जमीन आपको पटकने की कोशिश कर रही है। दो चके पर सीधे आप खड़े हैं, लेकिन प्रतिपल आप गति इतनी रख रहे हैं कि आपको इसके पहले कि इस जमीन पर ग्रेविटेशन गिराये, आप आगे हट गये। इसके पहले कि वहां का गुरुत्वाकर्षण आपको पटके, आप फिर आगे हट गये। गति और गुरुत्वाकर्षण के बीच में आप एक संतुलन बनाये हुए है। इसके पहले कि बायें तरफ का गुरुत्वाकर्षण आपको गिराये, आप दायें झुक गये। इसके पहले दायें गिरे, बायें झुक गये। एक गहन संतुलन साइकिल पर चल रहा है।

     पहली दफे आप साइकिल क्यों नहीं चला पाते? बिठा दिया आपको, और धक्का दे दिया, चला लें! क्योंकि दुबारा भी कुछ ज्यादा नहीं करेंगे आप, अभी भी कर सकते हैं यही। लेकिन अभी भय है, बस। और पता नहीं कि क्या होगा। वह भय के कारण आप गिर जाते हैं। दो चार दफा गिरकर दो चार दफा धक्के खा कर अक्ल आ जाती है। चलाने लगते हैं।

चेतना एक भीतरी नियंत्रण है, एक संतुलन है। अपने शरीर में चेतना को गतिमान करना सीखें। एक तीन महीने निरंतर अभ्यास से आप समर्थ हो जायेंगे, जहां चेतना को ले जाना चाहें। अगर फिर आपके बायें हाथ में दर्द हो रहा है, आप चेतना को दायें हाथ में ले जायें, दर्द विलीन हो जायेगा।

     आपके पैर में कांटा गड़ गया है, आप चेतना को पैर से हटा लें, सोख लें भीतर, कांटा विलीन हो जायेगा। जिस दिन आपको यह समझ आ जाये उसी दिन अनशन उपवास बन सकता है, उसके पहले नहीं। उसके पहले भूखे मरते रहें, उससे कुछ होनेवाला नहीं है। कुछ होनेवाला नहीं है खुद को सताने में कुछ मजा आये तो आये, कोई जुलूस यात्रा वगैरह आपकी निकाल दे तो बात अलग।

    नासमझ मिल जाते हैं, यात्रा निकालने वाले भी। उसका कारण है, ये सब म्युचुअल मामले हैं। कल वे ही नासमझी करेंगे तब आप उनकी यात्रा में सम्मिलित हो जाना।

   आदमी इसीलिए यात्राओं में सम्मिलित हो जाता है कि कल अपनी निकली तो कोई सम्मिलित न होगा।

*चेतना ही मार्गदर्शक सत्ता है : यहीं स्थिर रहो*

    जब भी किसी परिस्थिति में बहुत परेशान होओ और पता न चले कि उसमें से कैसे निकलना है तो सोचो मत , बस गहरे निर्विचार में चले जाओ और अपने अंतर्विवेक को अपना मार्गदर्शन करने दो.

    शुरू-शुरू में तो  भय लगेगा , असुरक्षा महसूस होगी , पर जल्दी ही जब हर बार ठीक निष्कर्ष पर पहुंचोगे , जब हर बार ठीक द्वार पर पहुँच जाओगे ,  साहस आ जाएगा भरोसा करने लगोगे.

     यदि यह भरोसा आता है तो उसे ही मैं श्रद्धा कहता हूं . यह वास्तव में आध्यात्मिक श्रद्धा है , अंतर्विवेक में श्रद्धा . बुद्धि अहंकार का हिस्सा है .  जिस क्षण अपने में गहरे उतरते हो ,  ब्रह्मांड की आत्मा में पहुँच जाते हो.  अन्तःप्रज्ञा परम विवेक का अंश है.

   जब अपना ही अनुसरण करते हो तो सब कुछ उलझा देते हो और कुछ पता नहीं चलता कि क्या कर रहे हो.  अपने को बहुत ज्ञानी समझ सकते हो , पर हो नहीं . ज्ञान तो हृदय से आता है , बुद्धि से नहीं . ज्ञान आत्मा के अंतरतम से उठता है , मष्तिष्क से नहीं . अपनी खोपड़ी को अलग हटा कर रख दो और आत्मा का स्मरण करो , चाहे वह जहां भी ले जाए . अगर वह खतरे में भी ले जाए क्योंकि वही आपके लिए और आपके विकास के लिए मार्ग होगा.

    खतरे से विकसित होओगे और पकोगे . यदि अंतर्विवेक मृत्यु की ओर ले जाए तो भी उसके पीछे जाओ , क्योंकि वही मार्ग होगा . उसका अनुसरण करो , उसमें  श्रद्धा करो और उस पर चल पडो.

*स्वयं को ब्रह्मांडीय सार से भरा हुआ अनुभव करो :*

     सात दिन तक भाव करते रहो कि मृत्यु पूरे शरीर में हड्डी-मांस-मज्जा तक प्रवेश कर गई है . बिना इस भाव को तोड़े , इसी तरह सोचते चले जाओ . फिर सात दिन के बाद देखो कि कैसा अनुभव करते हो.

   केवल एक मृत बोझ रह आओगे . सब संवेदनाएं समाप्त हो जायेंगी , शरीर में कोई जीवन अनुभव नहीं होगा. किया क्या है ?  खाना भी खाया और वह सब भी किया जो हमेशा से करते रहे हो , एकमात्र अंतर वह  कल्पना ही थी– चारों ओर कल्पना की एक नयी शैली खड़ी हो गई.

        यदि इसमें सफल हो जाओ… और सफल हो जाओगे. असल में  इसमें सफल हो ही चुके हो ,  ऐसा कर ही रहे हो , अनजाने ही इसे करने में निष्णात हो. इसीलिए मैं कहता हूँ कि निराशा से शुरू करो . यदि मैं कहूँ कि आनन्द से भर जाओ तो वह बहुत कठिन हो जाएगा.

    ऐसा सोच भी नहीं सकते . लेकिन यदि निराशा के साथ यह प्रयोग करते हो तो पता लगने लगेगा  कि इस तरह यदि निराशा आ सकती है तो सुख क्यों नहीं आ सकता?

   यदि अपने चारों ओर एक निराशापूर्ण मंडल तैयार करके एक मृत वस्तु बन सकते हो तो एक जीवन मंडल तैयार करके जीवंत और नृत्यपूर्ण क्यों नहीं हो सकते.

    इस बात का पता चलेगा कि जो दुःख भोग रह थे वह वास्तविक नहीं था .  उसे पैदा किया था , रचा था ; अनजाने ही उसे पैदा कर रहे थे. इस पर विश्वास करना बड़ा कठिन लगता है कि दुःख आपकी ही कल्पना है, क्योंकि उससे सारा उत्तरदायित्व आप पर ही आ जाता है, तब दूसरा कोई उत्तरदायी नहीं रह जाता.

     कोई उत्तरदायित्व किसी परमात्मा पर , भाग्य पर , लोगों पर , समाज पर , पत्नी पर या पति पर नहीं फेंक सकते ; किसी अन्य पर उत्तरदायित्व नहीं लाद सकते. आप ही निर्माता हो, जो कुछ भी आपके साथ हो रहा है वह आपका ही निर्माण है.

    तो सात दिन के लिए सजगता से इसका प्रयोग करो . और मैं कहता हूं , उसके बाद कभी भी दुखी नहीं होओगे, क्योंकि तरकीब का पता लग जाएगा.

       फिर सात दिन के लिए आनंद की धारा में होने का प्रयास करो , उसमें बहो , अनुभव करो कि हर सांस आनंद-विभोर कर रही है.

    सात दिन के लिए दुःख से शुरू करो और फिर सात दिन के लिए उसके विपरीत चले जाओ. जब बिलकुल विपरीत ध्रुव पर प्रयोग करोगे तो  उसे बेहतर अनुभव करोगे, क्योंकि उसमें स्पष्ट अंतर नज़र आएगा.

*सबकुछ संभव करता है ध्यान :*

    _बेहतर होगा की आप मेरा एक ध्यान शिविर लो. आप शरीर नहीं, शरीर में हो. आप क्या हो? अध्ययन-श्रवण या गूगल बाबा आदि नहीं, ‘अनुभव’ दिखाता है. यह अनुभव देता है परमानन्द._

     मैं आस्था- विश्वास- श्रद्धा या तन- मन- धन का समर्पण नहीं मांगता। अन्यों की तरह मैं चल-प्रपंचपूर्वक या बलात आपके घर की फ़ीमेल को नहीं भोगता। मैं कोई शुल्क भी नहीं लेता।

    मेरा प्रयोग देता है दैहिक- मानसिक- आत्मिक स्वास्थ्य और परमानंद का शिखर : लेकिन जो लोग ध्यान को कुछ पल का काम, मनोरंजन, पाखण्ड-प्रदर्शन, फॉरमैलिटी, दुकान का सामान समझते हैं- उनके वश का नहीं।

  मेरे शिविर में सिंगल पर्शन को एंट्री नहीं मिलती. कपल्स को ही एंट्री इसलिए कि आपका ध्यान अन्य नरनारी पर जाने से वह रोके. आप सिंगल हैं तो मातापिता में से किसी को साथ लाएं या अन्यत्र हमारी सेवा लें, शिविर में नहीं.

     आप ‘स्व’ से मिलने आएंगे : परिवार, बाजार, संसार के झमेले साथ रखेंगे तो निराश होंगे. यह हमारी हार होगी. इसलिए शिविर में नोटबुक, पेन, पैसे ही साथ रख सकेंगे. बाकी सब जमा करा लिया जायेगा. मौन रहना होगा। प्रश्नोत्तर सत्र 2 घण्टे का होता है। इसमें मुझसे बोलकर बात कर सकेंगे. बाकी समय में बहुत जरूरी होने पर, लिख कर हमें अपनी बात बता सकेंगे.

Ramswaroop Mantri

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