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*ध्यान~तंत्र : बल, शक्ति और क्रिया*

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       डॉ. विकास मानव

इन तीनों को ध्यान-तंत्र में अति सूक्ष्मता से लिया गया है। इन तीनों को ही एक ही मूलतत्व-रूप परब्रह्म का रूप बतलाया गया है-

   ‘परास्य शक्तिर्विविधेव श्रूयते 

   स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च्।’

अर्थात्- 

पराशक्ति विविध प्रकार की बलशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति आदि के रूप में जानी जाती है जो अपने स्वाभाविक गुण-धर्म में विद्यमान रहती है।

   शक्ति जब सुप्त स्थिति में रहे तो वह ‘बल’ कहलाती है और बल जब कोई कार्य करने को तत्पर होता है तो वही ‘शक्ति’ बन जाती है। अन्त में वह क्रिया-रूप में बदल कर शान्त हो जाती है। 

शक्ति की ये तीन अवस्थाएं हैं। फिर नया बल जागृत होता है। लेकिन, याद रखना चाहिए कि बल, शक्ति और क्रिया अपने आश्रय-स्थल से अलग होकर प्रत्यक्ष नहीं हो सकती। बल और शक्ति अर्थात् स्थिर और अस्थिर शक्ति का संघर्ष तीसरे रूप ‘क्रिया’  का जनक है। ऋण की ओर धन का प्रवाह स्वाभाविक है। 

      इसी प्रकार पौरुष पर आक्रमण करना शक्ति का सहज रूप है, सहज भाव है। अपने इसी भाव के फलस्वरूप पौरुष को हमेशा पराजित करना शक्ति का सहज धर्म माना गया है। शंकर पर आरूढ़ महाकाली की छवि कुछ इसी रहस्य की ओर संकेत करती है।

     जब तक यह क्रिया के रूप में शान्त होती रहती है, तब तक पौरुष जागृत रहता है और जहाँ उपशान्ति का क्रम बन्द हुआ कि शक्ति तुरन्त पौरुष को पराजित कर उसे बलहीन बना देती है।

   प्रायः देखा गया है कि अत्यन्त बलवान मनुष्य की अजेयता को पराजित करने के लिए नारी-शक्ति का आश्रय लिया जाता है। नारी में शक्ति है और पुरुष में बल। पहली चंचला है और दूसरा है स्थिर। नारी से साक्षात्कार होते ही पुरुष में विक्षोभ होता है। यह विक्षोभ ही उसके निर्माण और नाश का कारण बनता है। 

     महान् पुरुषों के जीवन के उत्थान में यदि नारी का सहयोग है तो दूसरी ओर उसके पतन का भी वही मुख्य कारण है। इसीलिये नारी को ‘माया’ कहा गया है। 

     युद्ध और शान्ति दोनों में नारी का हाथ है। युद्ध के बिगुल में यदि नारी का अट्टहास मिलेगा तो काव्य के शान्त छन्द में नारी के आंसू मिलेंगे। मतलब यह है कि शक्ति अपराजिता है, अजेया है और पौरुष के प्रति उसकी हर क्षण ललकार है– 

      गर्ज गर्ज क्षणं मूढ़ मधु यावत्पिवाम्यहम्।

     मया त्वयि हतेsत्रैव गर्जिष्यंत्याशु देवता।।

   –दुर्गा सप्तशती

अर्थात्, 

रणांगण में रक्त की नदियां बहाती हुई महाकाली ‘मधु’ दानव पर हुंकार भरती हुई ललकारती हैं और कहती हैं :

     ‘हे मूर्ख मधु ! अभी गरज ले जितना गरजना हो, फिर अवसर नहीं मिलेगा। तब तक मैं मधु-पान करती हूँ। अभी इसी रणांगण में शीघ्र ही सभी देवता तेरी मृत्यु पर अपनी विजय-गर्जना करेंगे, अपना विजयोल्लास मनाएंगे।

Ramswaroop Mantri

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