डॉ. विकास मानव
जड़ और चेतन कभी अलग नहीं हैं। दोनों मूल तत्व में व्यक्त और अव्यक्त रूप हैं। प्रकृति पर्वतों पर नींद लेती है, वनस्पतियों में स्वप्न देखती है और मानव तन में जागृत होती है। यानी बाह्य जगत ही क्रम-विकास है।
जगत की सृष्टि की आदिकालीन अवस्था में सब कुछ बीजभूत था। इसे हम विकास-क्रम का प्रथम सूत्र कह सकते हैं। फिर धीरे-धीरे विकास-क्रम अपनी विशेष अवस्था में पहुंचा जहां हम हैं, इसे भी चरम अवस्था नहीं कह सकते। जहाँ चरम होगा, पतन वहीं से आरम्भ हो जाएगा।
अगर हम अपने चारों ओर दृष्टि डालें तो कहीं अनन्त पर्वत-श्रृंखलाएं तो कहीं असीम सागर, कहीं घनी हरियाली, पक्षी, प्राणी दिखते हैं। अगर हम एक तिनके के अस्तित्व भी पर विचार करें तो प्रकृति की संयमित व्यवस्था पर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते।
हमारे हृदय में यही भाव उठता है– यह तिनका किस तरह बना होगा ? किन-किन चीजों के मिश्रण से तिनकों को यह आकृति मिली ? किस कृति से इसका नाम-रूप बना ? क्या किसी की ज्ञान-शक्ति इसको व्यक्त कर सकती है ?
इस जगत में जहां लाखों प्राणियों (पशु-पक्षियों) की भरमार है, उनमें सर्वोत्तम प्राणी मनुष्य है और उन हीं में ज्ञानी, विद्वान और वैज्ञानिक भी हैं जो नई-नई जानकारी नित्य दे रहे हैं, विद्वतापूर्ण लेखन और शोध कर रहे हैं और कर रहे हैं नित्य नूतन अविष्कार भी। लेकिन आज की अविष्कारक प्रवृत्ति एक तिनके का भी अविष्कार कर सकती है क्या ? उसको प्राकृतिक रंग-रूप दे सकती है ? नहीं, कदापि नहीं दे सकती ? यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो उस परम नियंता के बनाये हुए एक तृण की रचना भी हम नहीं कर सकते। उसके सामने हमारी शक्ति, हमारा ज्ञान और हमारा सामर्थ्य कितना क्षुद्र है ?–इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक #डारविन ने कहा था कि हमारे पूर्वज वानर थे, लेकिन आज यह मान्यता गलत सिद्ध हो रही है। पशु-पक्षी आदि प्राणी सब चेतन प्राणी हैं। जड़, तृण सब तिनकों से ही निर्मित हैं। इससे पहले सांख्य, वेदान्तियों को छोड़ मानव देह के क्रम-विकास के तत्व का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण किसी के पास नहीं था।
आगे चलकर शरीर विज्ञान, शरीर-रचना शास्त्र, शल्य चिकित्सा शास्त्र द्वारा मानव के क्रम-विकास का कारण ज्ञात हुआ–विशेषकर गर्भतत्व का। उसी क्रम-विकास में मानव की उत्पत्ति हुई। प्रारंभिक काल में मानव-गर्भ जानवरों के गर्भ से मिलता-जुलता था। उसी क्रम-विकास में मानव बना।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक टिण्डाल ने अपने शोध से यह पाया कि जड़ में भी प्रत्येक स्वरूप का जीवन, धर्म और विकास शक्ति बीजरूप में हमें मिलता है। प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक #जगदीश #चंद्र #वसु ने कहा है– पेड़-पौधों में जान और संवेदनशीलता होती है। उनका कहना है–शरीर का बहिरस्पन्दन और तंतुओं का अन्तःस्पन्दन ही चेतना-शक्ति है। आगे चलकर उन्होंने धातुओं पर भी शोध किया।
उन्होंने सिद्ध किया कि धातुओं में भी चेतना और संवेदनशीलता होती है। उनके शोध का जो परिणाम निकला उसके आधार पर उन्होंने बतलाया–धातुओं को बार-बार पीटने और काटने पर उनमें स्पन्दन-क्रिया शिथिल होने लगती है जो अति सूक्ष्म होती है। उन्होंने धातुओं पर विष-प्रयोग भी किया और पाया कि विष के प्रभाव से धातु स्पंदनहीन होने लगी।
जब विष का प्रभाव हटाया तो उसमें स्पन्दन होने लगा और चेतना का अनुभव होने लगा। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि आज से हज़ारों वर्ष पहले #महर्षि #वशिष्ठ ने कहा था–
यन्महाचिन्मयमपि
वृहतपाषाणव्यवस्थितम।
जड़ वा जड़मेवान्तद रूपं परमात्मनः।।
अर्थात–जो चेतनामय होते भी बड़े पत्थर के समान स्थिर है जो जड़ का अन्तःस्वरूप है, वही परमात्मा का स्वरूप है। अर्थात–जड़-चेतन के अन्दर-बाहर जो चैतन्य से भरा हुआ है, वही परमात्मा का रूप है।
साठ के दशक की एक पुस्तक है–Spirit And Matter जिसमें लिखा है–विज्ञान नहीं जान सकता कि घास का तिनका कैसे बनता है और कैसे पैदा हो सकता है ?
इन तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध है कि इन्द्रिययुक्त जीवों के समान इन्द्रियरहित जड़ पदार्थ में भी चेतना-शक्ति है और उसमें भी ज्ञानतन्तु विद्यमान होते हैं।
वेद में कहा गया है–‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’। अर्थात निश्चय ही ‘इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी, वह सब कुछ ब्रह्म ही है’। भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र वसु ने अपने अविष्कार में वेदांत मत की सत्यता को सिद्ध किया था।
वहीं पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने वसु की खोज को स्वीकार तो किया परन्तु यह कहकर टाल दिया कि खोज सत्य होने पर भी आध्यात्मिक है। व्यावहारिक दृष्टि से इसका मूल्य कुछ भी नहीं है।
वसु ने एक नई खोज कर उन वैज्ञानिकों के मत का खण्डन भी किया। जिस प्रकार मानव आदि सचेतन प्राणियों में सुख-दुःख आदि भावनाओं का प्रकटीकरण और उनका परिणाम उनकी क्रियाओं द्वारा स्पष्ट दिखता है, उसी प्रकार वनस्पतियों में भी प्रकट होता है।
इस मत को सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक विशेष यन्त्र का आविष्कार किया जिससे यह सिद्ध भी कर दिया कि जड़-वनस्पति एवम प्राणियों में चेतना-शक्ति का प्रभाव समान होता है। बाद में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने वसु के मत को स्वीकार कर लिया कि चेतना-शक्ति का प्रभाव पदार्थो से लेकर अन्य सभी प्राणियों पर है।
मैं अपने चिन्तन के दौरान कभी-कभी यही सोच-सोचकर हतप्रभ होने लगता हूँ कि एक तिनके का भी रहस्य हम नहीं जान पाते।
उसकी उत्पत्ति और विनाश के पीछे ऐसी कौन-सी चेतना-शक्ति है ? वह चेतना-शक्ति हमारे चारों ओर है मगर उसका अहसास हम नहीं कर पाते। जैसे ही हम एक कदम आगे बढ़ाते हैं, वह एक कदम पीछे हट जाती है और हमें देखकर मुस्कराती रहती है।
सारा ज्ञान-विज्ञान उस चेतना-शक्ति की खोज है। उसने कैसे समूचे जगत, ब्रह्माण्ड और उस तिनके से लेकर सभी को अपनी चेतना-शक्ति से बांध रखा है। सचमुच बड़ी ही अद्भुत है वह।
हमारे हर कदम में, हमारी हर खोज में यहां तक कि सुख-दुःख में, ज्ञान-अज्ञान में बस उसी का अव्यक्त प्रभाव दिखता है ? क्या उस परम चेतना के बिना हम पूर्ण हैं ? जो खालीपन, जो सूनापन है या कुछ पाने की लालसा है, क्या उसी परम चेतना की ओर इशारा नहीं करती है ? निश्चित ही करती है।
खैर, एक क्षुद्र तृण को हम जान नहीं सके तो इस जगत को कैसे जान सकते हैं ?
हमें ज्ञात होना चाहिए कि ‘जड़’ चेतना-शक्ति की क्रीड़ा स्थली है। चेतना-शक्ति जड़ का ही आश्रय लेकर अपना प्रभाव जगत में दिखलाती है। वहीं, जड़ के अभाव होने से वह सुप्त रहती है। जड़ पर किस प्रकार चेतना-शक्ति कार्य करती है ?
उसकी परिधि इतनी सूक्ष्म मगर व्यापक है कि जिसकी सीमा को जानना असम्भव है। किसी भी विषय की प्रबल व्यापकता होने पर ही उसका कार्य दिखलाई देता है। जड़ पदार्थ को चंचल और चलायमान करना ही शक्ति का मुख्य कार्य है।
जड़ के समान ही चेतना-शक्ति का क्षय नहीं होता। यह तथ्य वैज्ञानिक खोज से सत्य सिद्ध हो चुका है। विगत शताब्दी में #रम्फोर्ड #ज्यूल, #हेल्म #होज़ वैज्ञानिकों ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया था कि कोयला प्रज्ज्वलित होकर केवल राख नहीं होता, बल्कि उसका रूपांतरण हो जाता है।
प्रकृति का भण्डार जितना जड़ और चेतन से भरा हुआ है, उसका एक कण के बराबर भी हम क्षय नहीं कर पाते।
इस विशाल और विराट जगत का अस्तित्व और उसकी विचित्र लीला केवल जड़ और चेतन पर ही निर्भर है। इन्हीं दोनों में ज्ञान-विज्ञान का रहस्य छिपा हुआ है और छिपा हुआ है रहस्य अध्यात्म का भी।
इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध इतना रहस्यात्मक है कि एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्व ही नहीं है।
अन्तर्जगत में जिस प्रकार शरीर और प्राण का सम्बन्ध अविच्छेद है, उसी प्रकार बाह्य जगत में जड़ और चेतन का भी सम्बन्ध अविच्छेद है। जड़ चिरकाल से निश्चेष्ट है और चेतन सर्वव्यापी और सर्वदायी प्राणमय है। इन दोनों के योग से ही हम चेतना-शक्ति को जानने और उसका अहसास करने में समर्थ होते हैं।
जगत के विकास-क्रम में मनुष्य एकाएक प्रकट नहीं हुआ. अर्थात–मनुष्य का अस्तित्व अप्रत्यक्ष रीति से सर्वप्रथम वनस्पति के क्षुद्र पौधों और फिर प्राणियों में उसका क्रम-विकास हुआ। मनुष्य की रचना से पहले जीवन-तत्व विविध प्रकार के रूप में प्रवाहित हुआ था।
शरीर विज्ञान के विद्वान कहते हैं–मनुष्य सभी प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति का सार है। प्राणीमात्र की प्रत्येक अवस्था में जो भी आंतरिक रूपांतरण की प्रवृत्ति रहती है, जब तक विज्ञान क्रम-विकास के रहस्य का पता नहीं लगा लेता, तब तक विज्ञान के लिए क्रम-विकास एक पहेली-सी रहेगी और मनुष्य भी रहस्यमय बना रहेगा।
हिरण्यगर्भ संहिता में सहजोत्पत्ति स्वयंभूता सृष्टि से लेकर मानव के अस्तित्व तक सृष्टि का विवरण इस प्रकार आया है–आत्मनः आकाशः संभूतः। अकाशाद्वायु :। वायोरग्नि:। अग्ने: आप:। आपातपृथ्वी। पृथिव्या ओषधय:। औषधीभ्यामन्नम। अन्नात पुरुषः। अर्थात–आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से ओषधि, ओषधि से अन्न और अन्न से मनुष्य। ऐसे ही प्रकृति-क्रम का विकास हुआ।
इसी प्रकार उद्भिज, स्वेदज, अंडज और जरायुज सृष्टि को मूर्तिरूप बनने में अनन्त काल लगा। उपनिषद आदि ग्रंथों में आत्मा महातत्त्व, आकाश, वायु, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी अनुक्रम में सृष्टि की कल्पना की गयी।
भारत के पौराणिक ग्रर्न्थो में सृष्टि का विकास-क्रम नारायण के दशावतार की कथा के साथ-साथ अगर सूक्ष्म विचार किया जाय तो यह बात स्पष्ट प्रतीत होती है कि ईश्वर का प्रथम अवतार मत्स्यावतार जल-सृष्टि के विकास का प्रतीक है यानी जल की सृष्टि हो जाने पर जल-जन्तु मत्स्य आदि बने।
ईश्वर का दूसरा अवतार कच्छप अवतार जल के अलावा भूमि के विकास का प्रतीक है। अर्थात जल-जन्तुओं की सृष्टि हो जाने पर जल और भूमि दोनों पर समान रूप से चलने वाले कच्छप आदि प्राणी बने।
ईश्वर का तीसरा अवतार वाराह अवतार, अवतार-भूमि के पूर्ण विकास-क्रम का प्रतीक है। यानी वन, पर्वत, नदी की सृष्टि हो जाने पर पशु-पक्षी बने।
ईश्वर का चौथा अवतार नृसिंह अवतार है जो जल-थल, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी की सृष्टि के पूर्ण विकास-क्रम का प्रतीक है। अर्थात पृथिवी के सभी भागों की पूर्ण सृष्टि हो जाने पर अर्धपशु की आकृति वाला मनुष्य बना।
ईश्वर का पांचवां अवतार वामन अवतार मानव आकृति के विकास-क्रम का प्रतीक है। अर्थात सर्वत्र पूर्ण विकास-क्रम यानी पूर्ण सृष्टि हो जाने पर लघु आकृति वामनरूप मनुष्य बने और उन्होंने जंगली राक्षस आदि को पृथ्वी के पाताल लोक में यानी निचले भाग में भेजा ताकि जगत के विकास-क्रम आगे और कोई बाधा न आये।
ईश्वर का छठा अवतार परशुराम अवतार चारों वर्णों के विकास का प्रतीक है अर्थात चारों दिशाओं में यज्ञ, देवोपासना, राजा, प्रजा, कृषि, नीति आदि का विकास और मूर्ख प्रमाद क्षत्रियों को हटाकर एक अनुकूल वातावरण का विकास किया गया। यह प्रयास नियति और प्रकृति के संकेत पर परशुराम अवतार के द्वारा सम्पन्न हुआ।
ईश्वर का सातवां अवतार राम अवतार विद्या, शास्त्र, कला, नीति, नियम, धर्म, मर्यादा के पूर्ण विकास का प्रतीक है। यानी राजनीति, धर्मनीति, प्रजा-पालन, नियम, न्याय, धनोपार्जन, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानवप्रस्थ, सन्यास आदि आश्रम बने। पशु-पक्षी, राक्षसगणों से मुक्ति, वानर आदि जीव-जन्तुओं के साथ मैत्री और उनका संरक्षण दया आदि के गुणों के विकास का प्रतीक है।
ईश्वर का आठवां अवतार कृष्णावतार जगत के ऐश्वर्य आदि के पूर्ण विकास का प्रतीक है। जन्म के आरम्भ से ही मनुष्य की अद्भुत शक्ति, योग की अपूर्व चमत्कृति, चरित्र-प्रभाव आदि अनेक मनोधर्म बने। मनुष्यों ने सर्वत्र विजय संपादन करके सर्वोच्च भावना द्वारा आध्यात्मिक, सामाजिक और ऐश्वर्य की उच्चावस्था को प्राप्त किया। चारों ओर धर्म-ध्वजा फहराने लगी। दुष्टों का विनाश हुआ। मानवता की प्रगति हुई।
ईश्वर का नवम अवतार बुद्धावतार हुआ जब अहिंसा के प्रचार ने मनुष्यों में सद्भाव उत्पन्न किया।
ईश्वर का दशम अवतार कल्कि अवतार होगा। वर्णसंकरता, पाप, अधर्म, दुराचार, भ्रष्टाचार्य, बलात्कार, नरसंहार, रोग-उत्पत्ति, विश्वयुद्ध के फलस्वरूप जन-धन-हानि होगी। विज्ञान की जितनी प्रगति हुई है, उससे उन्मादित होकर विश्व-विनाश की आधारशिला रखी जायेगी और विज्ञान और मानवता की अवनति होकर प्रलय की अवस्था को प्राप्त करेगी। दूसरे ग्रहों के निवासियों (एलियंस) द्वारा पहले कुछ भूभागों से संपर्क होगा, फिर उन्हीं की सहायता और मार्गदर्शन में महाविनाश होगा। यह सृष्टि विकास की परिणिति होगी। यही विकास-विनाश का चक्र चलता रहेगा।
चेतना का विकास सर्वत्र व्याप्त है। जो एक तिनके में है, वह हमारे अन्दर भी है। जिस प्रकार प्रकृति के विकास-क्रम में मनुष्य का योगदान है, लेकिन उस तिनके का योगदान भी कम नहीं है। मनुष्य से कम महत्वपूर्ण नहीं है तिनका। वह भी उत्पन्न होता है, पनपता है, यौवन को प्राप्त होता है और फिर उसी मिट्टी में मिल जाता है।
तिनके के महत्व को भगवती सीता ने समझा था। उनके सामने महाज्ञानी, महापराक्रमी रावण खड़ा था तो उन्होंने उसे चेतावनी देते हुए तिनके को हाथ में लेकर कहा था–रावण !
अगर इस तिनके की सीमा को पार करने का दुस्साहस करोगे तो तुम्हारा समूल विनाश हो जाएगा एक ही पल में।
उस तिनके में ऐसी क्या शक्ति थी कि उसने रावण को भी विवश कर दिया था अपने पग पीछे हटाने के लिए। क्योंकि जो सार्वजनिक चेतना रावण के भीतर थी, वही उस तुच्छ कहे जाने वाले तिनके में थी। तिनके की वही चेतना शक्ति रावण को समूल नष्ट कर सकती थी।
हमारी साधना-उपासना, ज्ञान-विज्ञान सब चेतना के अंतर्गत ही है। जब तक हम उस सूक्ष्म चेतना को अपने आसपास महसूस नहीं करेंगे, तब तक हमारी साधना पूर्ण नहीं हो सकती।
हर कण, हर तिनका, हर पत्थर, नदी, पर्वत, वृक्ष एक दूसरे को आत्मसात नहीं करेगा तो वह चेतना के उस स्तर से वंचित ही रहेगा। हम चाहे जितना ध्यान करें, चाहे जितना जाप करें, सब अधूरा ही रहेगा। हमारा तन-मन चेतना के अहसास के अभाव में खाली-का-खाली ही रहेगा।





