अखिलेश अखिल
ओडिशा के बालासोर और झारखंड के गोड्डा में सामने आई दो अलग-अलग घटनाएं केवल आपराधिक वारदातें नहीं हैं, बल्कि देश की कानून-व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा ढांचे पर गहरे सवाल खड़े करती हैं। दोनों मामलों में मुस्लिम पुरुषों की मौत, आरोपियों द्वारा मवेशी चोरी या तस्करी के संदेह में हिंसा और जांच से पहले ही “दोष तय” कर लेने की प्रवृत्ति- एक बड़े पैटर्न की ओर इशारा करती है।
गृह मंत्रालय के लिए यह चुनौती नई नहीं है, लेकिन ताज़ा घटनाएं बताती हैं कि भीड़ द्वारा न्याय को रोकने के लिए बनाए गए कानूनी और प्रशासनिक तंत्र अब भी ज़मीनी स्तर पर प्रभावी नहीं हो पाए हैं। कह सकते हैं कि सरकार के लिए अब यह कोई मुद्दा ही नहीं रहा।
ओडिशा के बालासोर ज़िले में 35 वर्षीय शख्स मकंदर मोहम्मद की मौत ने पुलिसिया कार्रवाई की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। पहले दर्ज एफआईआर में घटना को सड़क दुर्घटना बताया गया, जबकि दूसरी एफआईआर जो मृतक के भाई की शिकायत पर दर्ज हुई है, में पांच लोगों द्वारा जानलेवा हमला और भीड़ द्वारा हत्या का आरोप है।
गृह मंत्रालय के दृष्टिकोण से यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि दो FIR में घटना की प्रकृति अलग-अलग है। शुरुआती पुलिस प्रतिक्रिया में लिंचिंग का उल्लेख नहीं है और कथित वीडियो सामने आने के बावजूद आधिकारिक पुष्टि में देरी। यह स्थिति सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2018 में तेहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ मामले में दिए गए निर्देशों के सीधे खिलाफ जाती है, जिसमें कहा गया था कि मॉब लिंचिंग की हर सूचना को अलग श्रेणी के अपराध के रूप में देखा जाए। लेकिन यह सब होता नहीं दिखता।
उधर, झारखंड के गोड्डा ज़िले में 45 वर्षीय पप्पू अंसारी की मौत ने वही पुरानी कहानी दोहराई। मवेशी चोरी का संदेह, रात में हमला, और मौत के बाद “आपराधिक रिकॉर्ड” का हवाला। गृह मंत्रालय के लिए यह पैटर्न संवेदनशील इसलिए है क्योंकि मृतक का पिछला रिकॉर्ड हत्या ठहराने का आधार नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार भीड़ द्वारा हिंसा शून्य सहनशीलता की श्रेणी में आती है। इसके बावजूद, ऐसे मामलों में प्रशासनिक बयान अक्सर “जांच जारी है” तक सीमित रह जाते हैं। जब मामला तूल पकड़ता है तो थोड़ी जांच शुरू होती है और बाद में सब कुछ सामान्य हो जाता है। और यह सब वर्षों से चल रहा है।
सरकारी एजेंसियों के पास मॉब लिंचिंग का कोई अलग राष्ट्रीय डेटाबेस नहीं है, लेकिन एनसीआरबी और स्वतंत्र ट्रैकर्स कुछ संकेत देते हैं-गृह मंत्रालय ने संसद में कई बार स्वीकार किया है कि मॉब लिंचिंग को अलग अपराध श्रेणी के रूप में दर्ज नहीं किया जाता। ऐसे मामले आईपीसी /बीएनएस की हत्या, दंगा या गैरकानूनी जमाव की धाराओं में दर्ज होते हैं।
उधर इंडिया स्पेंड और फैक्ट चेकर के संकलन के अनुसार मवेशी-संबंधित हिंसा में मारे गए लोगों में 60% से अधिक अल्पसंख्यक शामिल हैं। लगभग 50% घटनाएं मवेशी ढुलाई या संदेह से जुड़ी हुई पायी जाती हैं। ऐसी कहानी ज्यादातर झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे शीर्ष राज्यों में देखे जाते हैं। इन आंकड़ों का सीधा असर गृह मंत्रालय की आंतरिक सुरक्षा नीति पर पड़ता है।
भारत में मॉब लिंचिंग रोकने के लिए BNS की धारा 103(2) (भीड़ द्वारा हत्या),सुप्रीम कोर्ट के 2018 और 2023 के निर्देश और राज्यों के लिए नोडल अधिकारी और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की सिफारिशें, मौजूद हैं। फिर भी, ज़मीनी सच्चाई यह है कि कई राज्यों में नोडल अधिकारी नाममात्र के हैं, पीड़ित परिवारों को तत्काल मुआवज़ा नहीं मिलता और आरोपियों पर एनएसए या संगठित अपराध कानून का सीमित उपयोग होता है।
गृह मंत्रालय अक्सर कानून-व्यवस्था को राज्य का विषय बताकर पीछे हट जाता है। लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, सुप्रीम कोर्ट और संसद की स्थायी समितियां बार-बार कह चुकी हैं कि मॉब लिंचिंग आंतरिक सुरक्षा का प्रश्न है।
बालासोर और गोड्डा जैसे मामलों में क्या MHA ने राज्य सरकारों से स्थिति रिपोर्ट मांगी? क्या केंद्रीय एजेंसियों द्वारा निगरानी या एडवाइजरी जारी की गई? इन सवालों पर अब तक कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है। ऐसे मामलों में केंद्रीय नेतृत्व की चुप्पी भी एक संदेश देती है। अपराध विशेषज्ञों का मानना है कि स्पष्ट राजनीतिक निंदा न होने से भीड़ को अप्रत्यक्ष वैधता मिलती है, और स्थानीय प्रशासन “संतुलन” के नाम पर सख्ती से बचता है।
गृह मंत्रालय के सामने विकल्प स्पष्ट हैं कि राष्ट्रीय मॉब लिंचिंग रजिस्टर बनाए और सभी राज्यों के लिए अनिवार्य एसओपी तैयार करे और एफआईआर दर्ज करने में लिंचिंग टैग अनिवार्य करे, पीड़ित परिवारों के लिए 48 घंटे में मुआवजे का भुगतान करे और सोशल मीडिया वीडियो की तेज़ फॉरेंसिक पुष्टि हो। जब तक ये कदम कागज से जमीन तक नहीं उतरते, तब तक बालासोर और गोड्डा जैसे नाम केवल सूची में जुड़ते रहेंगे।
बालासोर और गोड्डा की घटनाएं अलग-अलग राज्यों की हैं, लेकिन समस्या एक है—भीड़ का कानून। यह केवल अल्पसंख्यकों का सवाल नहीं, बल्कि राज्य की संप्रभुता और कानून के राज का प्रश्न है। गृह मंत्रालय के लिए असली चुनौती अब यह नहीं कि कानून मौजूद है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या राज्य भीड़ से ज़्यादा ताक़तवर दिखेगा—या पीछे हटता रहेगा?

आधिकारिक रूप से “मॉब लिंचिंग” श्रेणी नहीं है, इसलिए ये आंकड़े हत्या/दंगा/गैरकानूनी जमाव की एफआईआर से संकलित हैं।





