(सावरकर, विपिन चंद्रा, कांशीराम और मोदी)
~ पुष्पा गुप्ता
_तस्वीरों को एक साथ देखकर आप अकचका जाएंगे। पूछेंगे की साम्य क्या है। तो सब्र रखिये। पूरी बात पढ़िए._
ये चारों जीव, डिस्कवरी ऑफ इंडिया के डिस्कवरर हैं, याने इतिहास के खोजक जीव। इन्होंने एक किरदार को फिर जिंदा किया और आधुनिक भारत की ऐतिहासिक राजनैतिक चेतना को वैसा बनाया, जैसी वो आज है। दरअसल, मूर्ति पूजन के अभ्यस्त देश मे कुछ साकार सामने न रखा जाए, तो किसी आइडिया को निर्गुण ब्रह्म की तरह पचाने में कठिनाई होती है। साकार को समझना आसान होता है।

तो पहले सावरकर :
मैं बात 1904 के सावरकर की कर रही हूँ। एक सुशिक्षित, अध्येता, लेखक, औऱ प्रेजेंटर.. एकदम टॉप क्लास।
(कम्युनल हेट से भरे हुए तब भी थे, लेकिन वह उस दौर का नैचुरल टेम्पर था। ठीक वैसे ही जैसे आज के बड़े बड़े शिक्षित और ज्ञानी पुरुष उस हेट से भरे हुए हैं। सो, इस बात को थोड़ी देर किनारे रखिये)
सावरकर ने 1857 की क्रांति पर किताब लिखी। उसे भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा। हालाकिं 1860 में ही मार्क्स ने गदर को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दर्जा दिया था। लेकिन उनका लेखन सावरकर पढ़ते होंगे, मुझे डाउट है।
तो 65 साल पहले हो चुकी, दबाई गयी, और भूली जा चुकी क्रांति की रीडिस्कवरी कर, जनता के सामने लाने वाले, सावरकर थे। इसने भूले बिसरे नायकों की याद कराई। भारतीय चेतना में “स्वतंत्रता संग्राम” शब्द का अर्थ पहली बार लाया।
जनता के हिंदूवादी हिस्से को ही सही, लेकिन पापुलेशन के एक हिस्से को एक सूत्र, एक सोच की तरफ लाया। यह उनका कंट्रीब्यूशन है।

विपिन चंद्रा :
आप ने भगतसिंह की खोज की। एक युवक जो 30 के दशक में अख़बारों में छाया था, अब भूला जा चुका था। उसे चंद्रा ने 60 के दशक में पुनरुज्जीवित कर वहां ला खड़ा किया, जिसे हम आज भगतसिंह कहते हैं।
वामपंथी इतिहासकार के रूप में गरियाये जाने वाले विपिन चंद्रा ने “मैं नास्तिक हूँ” नाम से भगत का लेख बुक शेप में लाया। और भी उनके वर्क कलेक्ट किये। उन्होंने जैसा प्रस्तूत किया, 23 साल का भगत एक मेच्योर्ड, धर्मनिरपेक्ष, वक्त से आगे का विकासोन्मुखी कैरेक्टर दिखता है। वैसा जिसे हम जानते हैं।
चंद्रा ने भगत को “रिवोल्यूशनरी टेरेरिस्ट” लिखा। पर तब उसका मतलब वही था, जो अंग्रेजी से ट्रांसलेट करने पर बनता है। यह अलग बात की 70 के बाद टेररिस्ट एक गन्दा शब्द हो गया। ठीक वैसे, जैसे आजकल 2014 के बाद ‘भक्त” कहना गाली देने के समान हो गया है, जबकि पहले ऐसा नही था।
तो विपिन चंद्रा ने इतिहास की अलमारी से भगतसिंह को निकाल कर हमारे सामने प्रतिष्ठित कर दिया।
कांशीराम :
कांशीराम ने अम्बेडकर की पुनर्खोज की। जीते जी अम्बेडकर बहुत “वाईडली एक्सेप्टेड” फिगर नही थे। एक जमात में ही एक्सेप्टितबिलिटी थी। वो पूरा जीवन गांधी के खिलाफ रहे, मुस्लिम लीग से पींगे बढाई, उसी के समर्थन से संविधान सभा मे निर्दलीय जीतकर आये।
प्रथम “सम्मिलित मन्त्रिमण्डल” में, कानून मंत्रालय मुस्लिम लीग के पास था। लेकिन कुछ माह बाद, भारत विभाजन की मांग पर मुस्लिम अड़ी लीग के सारे मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया। तो खाली जगह, पर गांधी के परामर्श से अम्बेडकर को कैबिनेट में लिया गया, उन्हें कानून मंत्री बनाया गया।
नो ऑफेंस। कानून मंत्री बड़ा पद नहीं होता। आप 5 गृह या विदेश मंत्री के नाम बता सकते हैं, 5 कानून मंत्रियों के नही। लेकिन तब सम्विधान लिखा जाना था। यह काम कानून मंत्रालय को देखना था। ऐतिहासिक अवसर था।
300 लोगो की सम्विधान सभा थी सम्विधान लिखने को। , दर्जनों सब कमेटीज थी। सबका लिखा, अम्बेडकर ने कम्पाइल किया। सम्विधान बना। उसके बाद अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल के मुद्दे पर इस्तीफा दिया। चुनाव हार गए, और धूमिल हो गए।
कांशीराम ने सत्तर अस्सी के दशक में अपने आंदोलन के लिए एक आइकन चाहा। दलित, सम्विधान में सक्रिय, कई बार जाति के लिए अपमान झेला इतिहास में एक ही था, जो कांग्रेसी के रूप में पहचाना नही जाता था।
सो अम्बेडकर एकदम फिट थे। उनकी की मूर्तियां गली कूचों में लग गयी। बसपा के उभार के साथ कांशीराम को सत्ता।मिली, अम्बेडकर जिंदा हो गए। इसलिए अंबडेकर की डिस्कवरी के लिए कांशीराम का योगदान किसी हिस्टोरियन जैसा है।
बड़े से बड़े शख्स या घटना पर समय की धूल चढ़ जाती है। इतिहास के खोजी लोग, महान प्रेरक शख्सियतों को खोजकर उसे समाज के सामने नए सिरे से जिंदा कर देते हैं।
इसलिए 1857, भगतसिंह और अम्बेडकर की पुनर्खोज के लिए मैं सावरकर, बिपिन चंद्रा और कांशीराम को नमन करती हूँ।

मोदी :
मैं नमन करती हूँ मोदी जी को, जिन्होंने बात बात पर नेहरू को गरिया कर, उनके जीवन के हर पहलू को उखाड़कर ऐसा जीवंत कर दिया कि राहुल से ज्यादा नेहरू पर बात होती है।
मोदी न होते तो यह पीढ़ी नेहरू को जानती, खोजती या बात नही करती। जो नही खोजते पढ़ते, वे मोदी टोन में गरिया गरिया कर आसपास वालों को नेहरू पर पढ़ने को मजबूर करते हैं, यह सोचकर कि यह आदमी था क्या आखिर; और जो पढ़ता है, वह नेहरू को नमन करता है। सिर्फ मुझे छोड़कर।
क्योकि…
मोदी नेहरू दोउ खड़े, काके लागूं पाँय!
बलिहारी मोदी आपकी, नेहरू दियो बताय!!
(चेतना विकास मिशन)





