अग्नि आलोक
script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

मातृ दिवस : पतित चरित्र, भावशून्य अनुभूतियाँ

Share

जूली सचदेवा __

विकृति है
यह संस्कृति की
सुविधाभोगी जीवन
जीने वाले हम
संवेदनहीन अनुभूतियों
की वैशाखी के सहारे
सूरज और चाँद को
गिरवी रख
तथाकथित सभ्य समाज
की आदमखोर
प्रवृतियों का
मखमली कफन ओढ़े
अपने जीवित होने के
असत्य को
पाल रहे होते हैं

गाँव के टुटहे
मकान में
आठ दशक पार
कोई बुढ़िया
हाँफती, खाँसती
अंधी आँखों से
अंगीठी जलाकर
भात पका रही

थकी अधमरी
सांसों से सन्तानों को
सुखद जीवन
का आशीष देती है
साल में एक दिन
माँ की
बहुत याद आती है
और फेसबुक में
उम्दा शेर, मुक्तक, तस्वीर
के साथ उन्हें याद
करने का मुहुर्त आता है

बहुत संतोष देता है
मित्रों सहकर्मियों का
लाईक•••• कमेंट्स
धन्यवाद!
मेरे पतित चरित्र
भावशून्य अनुभूतियाँ
मदर्स डे
एक रोज में
रिश्तों के समापन
की शुरुआत
और अंत भी
कर्मकांड सम्पूर्ण।।
(चेतना विकास मिशन)

Ramswaroop Mantri

Recent posts

script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-1446391598414083" crossorigin="anonymous">

प्रमुख खबरें

चर्चित खबरें