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आंदोलन भी संवैधानिक अधिकार है

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शशिकांत गुप्ते

26 जनवरी को हमने गणतंत्र दिवस मनाया। हर वर्ष मनाते हैं।
26 जनवरी को हमें अपना संविधान मिला था। हमें अपने संविधान ने मौलिक अधिकार दिए हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के 75वे वर्ष में हम प्रवेश कर चूके हैं।हमने इस वर्ष गणतंत्र दिवस की 73 वी वर्षगांठ मनाई।
विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नागरिक होने का हमे गौरव प्राप्त है।
लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। दुर्भाग्य से आज जनता मतलब लोक पर तंत्र हावी है।
लोकतंत्र में अपना हक़ प्राप्त करने के लिए आंदोलन करना भी एक बुनियादी अधिकार है।
आंदोलन अहिंसक होना चाहिए।
आज जो शक्तियां आंदोलन का विरोध करती है,उन्हें यह समझना जरूरी है,हमें स्वतंत्रता भी आंदोलन से प्राप्त हुई है।
अहम सवाल तो यह है कि,स्वतंत्रता के बाद आन्दोलन क्यों करना पड़ता है?
इसका मुख्य कारण है सत्ता,और व्यक्ति केंद्रित राजनीति का प्रचलन।
केंद्रीकरण का अर्थ है,
आधिकारिक शक्तियों को संगठन के उच्च स्तर पर केंद्रित करना । इस प्रवृत्ति का लक्ष्य है केंद्रीकृत कार्य । इसलिए यह सत्ता के विकेंद्रीकरण के सिद्धांत के ठीक विपरीत है। नीति निर्धारण तथा निर्णय लेने की प्रक्रियाओं पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
सत्ता केंद्रित राजनीति के प्रचलन के कारण राजनैतिक दलों का लक्ष्य सिर्फ सत्ता प्राप्त करना ही हो जाता है। सिर्फ सत्ता प्राप्त करने के लिए,प्रलोभन युक्त वादें झूठे दावें किए जातें हैं।
सत्तापक्ष को उसके द्वार किए गए वादों को स्मरण करवाने का माध्यम ही है आंदोलन।
जो भी राजनैतिक दल आंदोलन का विरोध करता है,तो यह समझना चाहिए कि वह दल लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखता है?
आंदोलन अहिंसक होना चाहिए। अहिंसक आंदोलन के प्रेरित करने के लिए योग्य मार्गदर्शन चाहिए। योग्य मार्गदर्शन के लिए परिपक्व नेतृत्व चाहिए।
सन 1974 में गुजरात में युवाओं ने आंदोलन की शुरुआत की, जब यह आंदोलन पूरे देश में फैलने लगा तब सौभग्य से स्वतंत्रता सैनानी,गांधीजी के अनुयायी जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व किया था।
आज छात्र आन्दोलन कर रहें हैं।आंदोलन हिंसक हो जाता है। इसका कारण योग्य,एवं परिपक्व नेतृत्व का अभाव।
इन मुद्दे पर एक हक़ीक़त का स्मरण होता है। सन 1978 में युवावस्था में, मै स्वयं अपने हमउम्र युवा साथियों के साथ इंदौर में स्थित विसर्जन आश्रम में श्रध्येय दादाभाई नाइक जी से मिलने गया था। दादाभाई नाइक मतलब इंदौर के विनोबा भावे जी ही थे।
दादाभाई नाइक से चर्चा के दौरान हम युवकों ने दादाभाई के समक्ष एक प्रश्न उपस्थित किया कि, मौजूद स्थिति में जयप्रकाशजी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व करने वाला कोई भी नेता नहीं है?
हम युवाओं के समक्ष यह बहुत ही गम्भीर प्रश्न है?
हमारे प्रश्न जवाब दादाभाई ने इसतरह दिया। उन्होंने अपना स्वयं का संस्मरण सुनाया।
सन 1935 में दादाभाई नागपुर के पास वर्धा स्थित आश्रम में विनोबाभावे जी के सानिध्य में रहतें थे।उस वक्त विनोबाजी गिरफ्तार हो गए। दादाभाई, विनोबाजी से मिलने जेल में गए।दादाभाई ने विनोबाजी से कहा कि आप जो जेल में हैं,अब आंदोलन का क्या होगा? मतलब अब हमार नेतृत्व कौन करेगा?
विनोबा जी कहा आज तो सिर्फ मै जेल में हूँ,यदि कल मुझे हृदयघात हो गया और मै जीवित ही नहीं रहा तब क्या होगा? यदि मुझे( विनोबा) अपना नेता समझते हो तो अपने अंदर विनोबा तैयार करों।
आज हमें नेतृत्व का अभाव है, तब हमें गांधीजी,जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, विनोबा भावे,और अन्य सभी क्रान्तिकासरियो के आदर्शों को ही अपना नेता मानना चाहिए। तमाम महापुरुषों के आदर्श ही हमारे प्रेणास्रोत बन सकतें है।
तात्पर्य हमें स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को निरंतर पढ़ना चाहिए,और उसपर व्यापक चर्चा और विमर्श करना चाहिए।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

Ramswaroop Mantri

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