मुगल-ए- आजम… यह एक फिल्म होने से ज्यादा जुनून था… जिद थी इसके डायरेक्टर के. आसिफ की। जो इस फिल्म के बनने की कहानी को जानते हैं वे तो इस फिल्म को के. आसिफ की सनक कहते हैं। यह मुगल बादशाह मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर के बेटे सलीम और शाही दरबार की एक कनीज़ अनारकली की मोहब्बत की दास्तां है। 5 अगस्त 1960 को रिलीज़ हुई इस फिल्म ने 2022 में सफलता के 62 साल पूरे कर लिए। साथ ही यह डायरेक्टर के. आसिफ का जन्म शताब्दी वर्ष भी है, इसलिए इस अवसर इंदौर की संस्था सूत्रधार ने एक कार्यक्रम ऐसा कराया जिसमें इंदौर के फिल्म अध्येता दिलीप गुप्ते ने राजकुमार केसवानी की किताबों से चुन कर फिल्म के बारे में कुछ ऐसे तथ्य बताए जो कई लोगों के लिए नए और चौंकाने वाले हैं। प्रीतमलाल दुआ सभागार में कराए गए इस कार्यक्रम में फिल्म के कुछ अहम क्लिप और यादगार संवादों वाले दृश्य भी दिखाए गए।

फिल्म अध्येता दिलीप गुप्ते ने मुगल-ए-आजम से जुड़े दिलचस्प किस्से सुनाए।

कार्यक्रम में उपस्थित श्रोता।
1914 में जन्मे करीम आसिफ लेडीज टेलर थे
के आसिफ ने बचपन से सुई धागा थाम लिया था। वे महिलाओं के कपड़े सीते थे और अच्छा नाम भी हो गया था। उनके मामू फिल्म प्रोड्यूसर थे। आसिफ कहते थे हमेशा कि एक फिल्म ऐसी बनाऊंगा कि दुनिया याद करेगी। आसिफ ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे पर फिल्म सेंस गॉड गिफ्टेड था।
पहले नरगिस और चंद्रमोहन को लेकर बनाई गई थी मुगल-ए-आजम
यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि के आसिफ ने इस फिल्म में पहले नरगिस को अनारकली के किरदार में कास्ट किया था। चंद्रमोहन सप्रू भी फिल्म में थे। फिर देश का विभाजन हो गया और फिल्म के इन्वेस्टर पाक में रह गए। कुछ समय बाद एक और इन्वेस्टर ढूंढ कर के आसिफ ने फिर से इस फिल्म को शुरू किया पर बहुत शराब पीने की आदत के चलते एक्टर चंद्रमोहन चल बसे। के असिफ का सपना थी यह फिल्म और यह ख्वाब उन्हें सोने नहीं दे रहा था। उन्होंने एक बार फिर फिल्म बनाने की कोशिश की। इस बार नरगिस इनकार कर गईं। के आसिफ नूतन के पास पहुंचे। उन्होंने भी मना कर दिया। फिर मीना कुमारी से बात की गई पर एक दुर्घटना में उनकी अंगुली कट गई और साथ ही फिल्म से नाम भी।
जब कोई अभिनेत्री तैयार नहीं हो रही थी तो अखबार में विज्ञापन दिया
के आसिफ हर हाल में यह फिल्म बनाना चाहते थे। किसी ने उन्हें कहा कि अखबार में विज्ञापन दे दीजिए। फिर भी कोई अभिनेत्री नहीं मिली। तब किसी ने मधुबाला का नाम सुझाया और वे राजी भी हो गईं। 1940 में रिलीज़ होने वाली यह फिल्म 1960 में आई।
डेढ़ करोड़ था फिल्म का बजट, पर 10 करोड़ खर्च हुए, 17 साल लगे बनने में
फिल्म कई बार बनते बनते रह गई। जब बनी तो रिलीज होने में सालों लग गए। कुल 17 साल लगे इस फिल्म को बनकर तैयार होने में। यह ब्लैक एंड व्हाइट बनाई गई थी लेकिन प्यार किया तो डरना क्या गीत कलर में शूट किया गया था। वैसे तो इसका बजट डेढ़ करोड़ रखा गया था लेकिन के आसिफ ने इसमें पैसा पानी की तरह बहाया था।
सलीम के जूते असली सोने के, फर्श पर बिखेरे गए मोती भी असली

फिल्म के डायरेक्टर के. आसिफ
1. कलर वर्जन देख नहीं सके के. आसिफ : फिल्म के डायरेक्टर के. आसिफ ने अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ तीन फिल्में बनाई थीं। फूल, हलचल और मुगल-ए-आजम। ब्लैक एंड व्हाइट में बनी यह फिल्म के आसिफ कलर में बनाना चाहते थे। 2004 में जब फिल्म का कलर वर्जन आया तब तक के आसिफ दुनिया से रुखसत हो चुके थे।

कार्यक्रम में फिल्म की क्लिपिंग्स भी दिखाई गई।

युद्ध के दृश्यों में ग्राफिक नहीं थे। असल में हजारों घोड़े हाथी ऊंट लाए गए थे।
2. फौजियों ने दौड़ाए थे घोड़े : 17 साल में पूरी होने वाली इस फिल्म के युद्ध दृश्यों में तकरीबन 2000 ऊंट और 4000 घोड़ों का इस्तेमाल किया गया था। इन युद्धों में शामिल सैनिकों में अधिकांश भारतीय सेना के सिपाही थे।

इस गीत के लिए सचमुच बनाया गया था शीशमहल।
3. करोड़ों का एक गीत : फिल्म के गीत ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ की शूटिंग में ही करोड़ों रुपए लग गए थे। इस गाने को मशहूर संगीतकार नौशाद ने संगीतबद्ध किया था और लता मंगेशकर ने इसे आवाज दी थी। इस गाने के बोल नौशाद ने 105 री-राइट्स के बाद फाइनल किए थे। इस गीत की शूटिंग शीश महल में हुई थी और यह शीश महल सच में बनाया गया था। कांच का रीफ्लैक्शन इतना आ रहा था कि उन पर मोम लगाकर शूटिंग करना पड़ी थी।
4. दो मंजिला स्टूडियो में रिकॉर्डिंग : फिल्म के गीत ‘ऐ मोहब्बत जिंदाबाद’ के कोरस में तकरीबन 100 सिंगर्स ने हिस्सा लिया था। इस गाने को मोहम्मद रफी ने आवाज दी थी। दो मंजिला स्टूडियो बनाया गया था इस गीत की रिकॉर्डिंग के लिए। एक मंजिल पर रफी और दूसरी पर कोरस सिंगर्स थे।
5. 25 हज़ार रु. लिए गायक ने : फिल्म में उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब को तानसेन की आवाज के लिए बड़ी मुश्किल से मनाया गया था। इसके लिए उन्हें उस समय 25000 रुपए का मेहनताना दिया गया था जबकि मोहम्मद रफी का मेहनताना उस समय 300 रुपए था।
6. पैरों में बरसाए असली मोती : के.आसिफ ने फिल्म में जोधाबाई के लिए नकली मोतियों का इस्तेमाल करने से सिर्फ इसलिए इuकार कर दिया था क्योंकि कांच के मोती जब जमीन पर गिरते हैं तो आवाज नहीं होती है। एक दृश्य में जब सलीम आता है और उसके जूते दिखाए जाते हैं तब उसके पैरों में जो हीरे मोती जोधाबाई बिछाती है, वह सब असली थे। मोहे पनघट ने नंदलाल छेड़ गयो रे गीत में कृष्ण जी की मूर्ति भी ठोस सोने की थी।
7. सोने चांदी के तारों से बने थे कपड़े : के आसिफ ने अपनी ड्रीम फिल्म में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अनारकली और सलीम सहित मेन स्टार कास्ट के सारे कपड़े यूपी से बुलवाए गए कारीगरों से बनवाए गए थे और इनमें असली सोने चांदी की जरी लगी थी। सेट और ये कपड़े बाद में लोगों के देखने के लिए प्रदर्शित भी किए गए थे। लोग सेट पर जूते बाहर निकालकर देखने जाते थे।





